Tuesday, August 4, 2015

योग दर्शन

योग दर्शनकार पतंजलि ने आत्मा और जगत् के संबंध में सांख्य दर्शन के सिद्धांतों का ही प्रतिपादन और समर्थन किया है । उन्होंने भी वही पचीस तत्व मने हैं, जो सांख्यकार ने माने हैं । इनमें विशेषता यही है कि इन्होंने कपिल की अपेक्षा एक और छब्बीसवाँ तत्व 'पुरुषविशेष' या ईश्वर भी माना है, जिससे सांख्य के अनीश्वरवाद से ये बच गए हैं । पतंजलि का योगदर्शन, समाधि, साधन, विभूति और कैवल्य इन चार पारदों या भागों में विभक्त है । समाधिपाद में यह बतलाया गया है कि योग के उद्देश्य और लक्षण क्या हैं और उसका साधन किस प्रकार होता है । साधनपाद में क्लेश, कर्मविपाक और कर्मफल आदि का विवेचन है । विभूतिपाद में यह बतलाया गया है कि योग के अंग क्या हैं, उसका परिणाम क्या होता है और उसके द्वारा अणिमा, महिमा आगदि सिद्धियों की किस प्रकार प्राप्ति होती है । कैवल्यपाद में कैवल्य या मोक्ष का विवेचन किया गया है । संक्षेप में योग दर्शन का मत यह है कि मनुष्य को अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच प्रकार के क्लेश होते हैं; और उसे कर्म के फलों के अनुसार जन्म लेकर आयु व्यतीत करनी पड़ती है तथा भोग भोगना पड़ता है । पतंजलि ने इन सवसे बचने और मोक्ष प्राप्त करने का उपाय योग बतलाया है; और कहा है कि क्रमशः योग के अंगों का साधन करते हुए मनुष्य सिद्ध हो जाता है और अंत में मोक्ष प्राप्त कर लेता है । ईश्वर के संबंध में पतंजलि का मत है कि वह नित्यमुक्त, एक, अद्वितीय और तीनों कालों से अतीत है और देवताओं तथा ऋषियों आदि को उसी से ज्ञान प्राप्त होता है । योगवाले संसार को दुःखमय और हेय मानते हैं । पुरुष या जीवात्मा के मोक्ष के लिये वे योग को ही एकमात्र उपाय मानेत हैं । पतंजलि ने चित्त की क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, निरुद्ध और एकाग्र ये पाँच प्रकार की वृत्तियाँ मानी है, जिनका नाम उन्होंने चित्तभूमि रखा है; और कहा है कि आरंभ की तीन चित्तभूमियों में योग नहीं हो सकता, केवल अंतिम दो में हो सकता है । इन दो भूमियों में संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात ये दो प्रकार के योग हो सकते हैं । जिस अवस्था में ध्येय का रूप
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प्रत्यक्ष रहता हो, उसे संप्रज्ञात कहते हैं । यह योग पाँच प्रकार के क्लेशों का नाश करनेवाला है । असंप्रज्ञात उस अवस्था को कहते हैं, जिसमें किसी प्रकार की वृत्ति का उदय नहीं होता; अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय का भेद नहीं रह जाता, संस्कारमात्र बच रहता है । यही योग की चरम भूमि मानी जाती है और इसकी सिद्धि हो जाने पर मोक्ष प्राप्त होता है । योगसाधन का उपाय यह बतलाया गया है कि पहले किसी स्थूल विषय का आधार लेकर, उसके उपरांत किसी सूक्ष्म वस्तु को लेकर और अंत में सब विषयों का परित्याग करके चलना चाहिए और अपना चित्त स्थिर करना चाहिए । चित्त की वृत्तियों को रोकने के जो उपाय बतलाए गए हैं, वे इस प्रकार हैं— अभ्यास और वैराग्य, ईश्वर का प्रणिधान, प्राणायाम और समाधि, विषयों से विरक्ति आदि । यह भी कहा गया है कि जो लोग योग का अभ्याम करते हैं, उनमें अनेक प्रकार को विलक्षण शक्तियाँ आ जाती है जिन्हें विभूति या सिद्धि कहते हैं । विशेष दे० 'सिद्धि' । यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये आठों योग के अंग कहे गए हैं, और योगसिद्धि के लिये इन आठों अंगों के अंग कहे गए हैं, और योगसिद्धि के लिये इन आठों अंगों का साधन आवश्यक और अनिवार्य कहा गया है । इनमें से प्रत्येक के अंतर्गत कई बातें हैं । कहा गया है जो व्यक्ति योग के ये आठो अंग सिद्ध कर लेता है, वह सब प्रकार के क्लेशों से छूट जाता है, अनेक प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त कर लेता है और अंत में कैवल्य (मुक्ति) का भागी होता है । ऊपर कहा जा चुका है कि सृष्टितत्व आदि के संबंध में योग का भी प्रायः वही मत है जो सांख्य का है, इससे सांख्य को ज्ञान- योग और योग को कर्मयोग भी कहते हैं । पतंजलि के सूत्रों पर सबसे प्राचीन भाष्य वेदव्यास जी का है । उसपर वाचस्पति का वार्तिक है । विज्ञानभिक्षु का 'योगसारसंग्रह' भी योग का एक प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है । सूत्रों पर भोजराज की भी एक वृत्ति है । पीछे से योगशास्त्र में तंत्र का बहुत सा मेल मिला और 'कायव्यूह' का बहुत विस्तार किया गया, जिसके अनुसार शरीर के अंदर अनेक प्रकार के चक्र आदि कल्पित किए गए । क्रियाओँ का भी अधिक विस्तार हुआ और हठयोग की एक अलग शाखा निकली; जिसमें नेती, धोती, वस्ती आदि षट्कर्म तथा नाड़ीशोधन आदि का वर्णन किया गया । शिवसंहिता, हठयोगप्रदीपिका, घेरंडसंहिता आदि हठयोग के ग्रंथ है । हठयोग के बड़े भारी आचार्य मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) और उनके शिष्य गोरखनाथ हुए हैं

सुन्दरता के लिए योग

सुन्दरता के लिए योग

दुनिया की हर औरत अपने आपको हमेशा सुंदर दिखाना चाहती है। इसी कोशिश में वह कृत्रिम उपाय भी अपनाती है। इसमें मेकअप करने से लेकर बाल रंगने तक कई उपाय शामिल हैं। इन सब उपायों का असर लंबे समय तक नहीं टिक पाता है। योगासन और प्राकृतिक चिकित्सा दो ऐसे साधन हैं जिनके जरिए महिलाएँ उम्रदराज होने पर भी सुंदर लग सकती हैं।
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क्या करें : योगासन के लिए रोज 20-25 मिनट जरूर निकालें। इससे त्वचा की झुर्रियों के साथ पेट की थुलथुल चर्बी से भी मुक्ति मिल सकेगी। मुलायम और चमकदार त्वचा पाने के लिए सीधे खड़े हो कर दोनों हथेलियों से चेहरे को ढँक लीजिए। गहरी साँसें लीजिए। चंद मिनटों के बाद उँगलियों की पोरों से ठोड़ी से लेकर माथे तक मालिश करिए। यह कसरत कम से कम तीन बार कीजिए। इसी के साथ कपालभाति एवं अनुलोम विलोम भी कर लें।
सुडौल गरदन : पैरों को पास में रखकर खड़े हो जाइए। चेहरे को पीछे की ओर मोड़कर जितना पीछे जा सकते हों जाएँ। थोड़ी देर इसी अवस्था में रुकें। अब ठोड़ी को छाती की हड्डी पर गले के नीचे चिपका दें। यदि चिपकाना संभव न हो तब भी कोशिश करते रहें। सीधे खड़े रहें और कंधों को बिना हिलाए सिर को दोनों साइड में झुकाएँ। कोशिश करें कि सिर को कंधे पर टिका सकें। ऐसा दोनों ओर करें। इस आसन को कम से कम 20 बार करें। इस आसन के बाद गरदन को दोनों तरफ तेजी से 10 बार झटकें।
अपने पैरों को थोड़ा फैलाकर खड़े हो जाएँ। हाथों को कमर पर रखें। गहरी साँस लेते हुए जोर से छोड़ें। यह कसरत बारी-बारी से 40-40 के सेट में करें। इसे बढ़ाते हुए 100 तक ले जा सकते हैं। पैरों को सामने की ओर फैलाकर बैठ जाएँ। हाथों को बारी-बारी से उपर उठाएँ और नीचे ले जाएँ। इसे इस तरह करें मानो कोई रस्सी खींच रहे हों। यह कसरत 50 से शुरू करके धीरे-धीरे बढ़ाते रहें।
अब पैरों पर बैठ जाएँ और दोनों घुटनों में अंतर रखते हुए हाथों की उँगलियों को आपस में फँसाते हुए सामने की ओर फैला लें। हाथों को इस तरह ऊपर-नीचे करें मानों कोई लकड़ी काट रहे हों। ऐसा 20 बार करें।
पेट की थुलथुल चर्बी : अपने पैरों को फैलाकर खड़े हो जाएँ। आगे की ओर बिना घुटना मोड़े पैरों की उँगलियों को हाथ की उँगलियों की पोरों से पकड़ने की कोशिश करें। संभव है कि पहली बार आप ऐसा नहीं कर पाएँ लेकिन रोज कोशिश करेंगे तो शायद एक दिन कर पाएँ। रोजाना 10-10 के सेट में दो बार करें।
पैरों को दो फुट की दूरी तक फैला लें और शरीर को आगे की ओर 90 डिग्री के कोण बनाते हुए झुका लें। अब सीधे हाथ की उँगलियों से बाएँ पैर की उँगलियों को स्पर्श करने का प्रयत्न करें। दोनों ओर इसे कम से कम 20 बार करें।
जमीन पर सीधे लेट जाएँ। पैरों को पास में रखें। अब पैरों को बिना घुटने मोड़े ऊपर उठाने का प्रयत्न करें। इसी तरह सिर को धड़ सहित ऊपर उठाने की कोशिश करें। इस तरह शरीर की आकृति एक नाव की तरह हो जाएगी। नौका जैसी आकृति बनाते हुए एक मिनट तक रुकें। इसके अलावा पेट की चर्बी गलाने के लिए आप पश्चिमोत्तान आसन कर सकते हैं। पवनमुक्तासन, भुजंगासन, धनुर्रासन आसानी से कर सकते हैं।
सुडौल कमर : नाजुक या सुडौल कमर पाना हर महिला का ऐसा सपना है जो कम ही पूरा होता है। कमर का घेरा कम तब ही लगता है जब पेट की अनावश्यक चर्बी खत्म हो जाती है। आप चाहें तो इन आसनों को आजमा सकती हैं।
पैरों को एक फुट की दूरी बनाते हुए खड़ी हो जाएँ। हाथों को साइड में जमीन के समानांतर कंधों की ऊँचाई तक फैला लें। अब शरीर के उपरी हिस्से को बाईं ओर जितना मोड़ सकते हों मोड़ लें तथा पीछे की ओर देखें। ध्यान रखें कि पैर जमीन पर टिके रहें। ऐसा ही दूसरी तरफ भी करें। दस से बीस बार ऐसा करें।
दोनों पैरों को फैलाकर खड़े रहें। कमर पर हाथ रख लें। आगे की ओर झुकते हुए जंघाओं को स्पर्श करने की कोशिश करें। तीन बार से शुरू करके आगे बढ़ा सकती हैं।
जरूरी है मन की सुंदरता : मन की सुंदरता तभी प्राप्त होती है जब मन शांत हो। मस्तिष्क प्रिय विचारों से गदगद हो। तनाव जितना कम होगा उतना चेहरे पर खिंचाव नहीं दिखाई देगा। अनुलोम विलोम, कपालभाती तथा श्वास की कसरतें दम-खम तो देंगी ही साथ ही सुंदर भी बना देंगी।
लेखिका पाँच वर्षों से नैचुरोपैथी से मरीजों का इलाज कर रही हैं।

योग दर्शन

योग दर्शन

दर्शनशास्त्र में योगदर्शन का विशेष महत्व है। इसीलिए भारतीय या वैदेशिक अथवा आस्तिक या नास्तिक समस्त दार्शनिक संप्रदाय किसी न किसी रूप में योग साधना करते हैं। इसका कारण है कि योगसाधना समस्त दर्शनों और विशेषकर सांख्यदर्शन का व्यवहारिक पक्ष है। योग दर्शन और साधना उतनी ही पुरानी है जितनी पुरानी मानव सृष्टि। भारतीय कालगणना के अनुसार वर्तमान मानव सृष्टि का आरंभ एक अरब, सतानवे करोड़, उन्तीस लाख, सैतालीस हजार एक सौ एक ईसा पूर्व हुआ। आधुनिक भौतिकी, खगोल, भूगोल, नृवैज्ञानिक भी मानते हैं कि पृथ्वी पर जीव की उत्पत्ति दो से तीन अरब वर्ष पूर्व हुई। भारतीय वांङमय के अनुसार सृष्टि के आरंभ में सर्वप्रथम योगसिद्ध ॠषियों को गहन ध्यानावस्था में वैदिक ॠचाओं के दर्शन हुए। अतः योग का इतिहास सृष्टि के आरंभकाल से वैदिक ॠषियों से प्रारंभ होता है। वेद और वेदांग साहित्य में योग के अनेकों संदर्भ मिलते हैं। वेदांत अर्थात् वेदों के अंतिम भाग ब्राह्मण, उपनिषद, आरण्यक तो साधना को लक्ष्य क रके ही लिखे गए ग्रंथ हैं। कठोपनिषद, श्वेताश्वर और मैत्रायणी उपनिषदों तथा छह वैदिक शास्त्रों में योग और साधना से संबंधित संदर्भ प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।
हिरण्यगर्भ भगवान ब्रह्मा को योगशास्त्र का आदि प्रवक्ता कहा गया है। योगशास्त्र को प्राचीनकाल में ‘हैरण्यगर्भशास्त्र’ कहा जाता था। प्राचीन भारतीय इतिहास की आधारशिला पुराणों के अनुसार सृष्टि के आदि में सनकादि ॠषियों, मरीच्यादि प्रजापतियों ने योगसिध्दि प्राप्त की। स्वयंभू मंवंतर में महर्षि कपिल महायोगी थे। उन्होंने अपनी माता देवहूति को ज्ञानप्राप्ति के लिए भक्तियोग तथा अपने शिष्य आसुरि को सांख्यदर्शन का उपदेश दिया। इसी काल में स्वयंभू मनु की पांचवी पीढ़ी में भगवान शिव महायोगी हैं और वे ही तंत्रशास्त्र के प्रथम आचार्य माने जाते हैं। उनकी पत्नि दक्षपुत्री सती एवं उमा (पावर्ती) भी योगविद्या निष्णात थीं। इस प्रकार सृष्टि के आदिकाल में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, शिव, ॠषभदेव, सनत्कुमार, नारद, कर्दम, कपिल तथा वेद ॠचाओं के दृष्टा अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप आदि अनेकों योगसिद्ध साधकों आदि महर्षियों के योगशास्त्र का विस्तार किया।
वैवस्वत मन्वंतर में योगदर्शन के आदि प्रवक्ता भगवान विवस्वान् अर्थात् सूर्य कश्यप थे। उन्होंने अपने पुत्र वैवस्वत मनु को, मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु को योगशास्त्र का उपदेश दिया। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं-
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययं, विवस्वान्मनवे प्राह, मनुरिक्ष्वाकवे ब्रवीत्। एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः, स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप॥
अर्थात् हे अर्जुन! आदि में इस योग को विस्वान् सूर्य से कहा, सूर्य ने इसे मनु को कहा, मनु ने इक्ष्वाकु को कहा और इस प्रकार परंपरा से प्राप्त योग को राजर्षि ने जाना जो कि बहुत काल तक नष्ट हो गया था उसे मैं तुझे कह रहा हूं।
इस प्रकार योगशास्त्र के अध्ययन एवं प्रयोग शिष्य परंपरा के द्वारा सूर्यवंश में हजारों वर्षों तक चला। वैवस्वत मन्वतंर के 24 वें त्रेतायुगांत में महर्षि बाल्मिकी ने भगवान् राम को योगशास्त्र की शिक्षा दी। उस काल में विश्व के आदिकाल महर्षि बाल्मिकी ने भी योगसाधना के ग्रंथ योग-वशिष्ठ और इतिहास ग्रंथ रामायण की रचना की। इसी प्रकार सहस्रबाहू के गुरु भगवान दत्तात्रेय भी योगसिद्ध महात्मा थे जो कि आज भी समस्त वानप्रस्थ-संयासी समुदाय के गुरु माने जाते हैं। छठे अवतार भगवान परशुराम ने योग साधना कर अनेकों सिध्दियां प्राप्त की थी जिनमें मन की गति से यात्रा करना भी शामिल है। इस काल में शेषावतार महर्षि पतंजलि ने हिरण्यगर्भशास्त्र को क्रमबद्ध कर योगसूत्र की रचना की जो कि योगदर्शन के इतिहास में युगांतकारी उपलब्धि थी।
इस काल में मैत्रावारूणि वशिष्ठ कराल जनक, असुरि शिष्य पंचशिख, उनके शिष्य धर्मध्वज जनक, याज्ञवलक्य, उनके शिष्य दैवराजि जनक, विभिन्न ऐक्ष्वाकु जैन तीर्थंकर, कॉम्पिल्यनरेश ब्रह्मदत्त, पतंजलि आदि अनेकों ज्ञात-अज्ञात ॠषियों ने योगदर्शन का विकास किया।
महाभारत काल में गृहस्थ आश्रम के पश्चात् वानप्रस्थ में योगसाधना करके संन्यास आश्रम में प्रवेश करना सामान्य नियम था। महर्षि वेदव्यास प्रणीत श्रीमद्भगवदगीता में ज्ञानयोग, कर्मयोग, जपयोग आदि का विस्तार से वर्णन है। पातंजलि योगसूत्र पर उनका ‘व्यासभाष्य’ योगशास्त्र के इतिहास की सार्वकालिक रचना है, जिस पर आगामी पांच हजार वर्षों तक अनेकानेक योगियों, विद्वानों ने टीका, वृत्ति, विवरण आदि अनेकों ग्रंथों की रचना की जिनके माध्यम से आज तक हमें योगशास्त्र का क्रमबद्ध ज्ञान प्राप्त होता है।
अष्टम् अवतार भगवान कृष्ण को योगिराज कहा जाता है जो कि प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों विषयों के जगद्गुरू माने जाते हैं। इस काल में महाभारत युद्ध के समय उपदिष्ट उनकी भगवदगीता योग ही नहीं बल्कि मानवता के इतिहास में अद्वितीय उपदेश है जिसका संकलन कर वेदव्यास भी अमर हो गए। श्रीमदभगवदगीता के ज्ञानयोग, भक्तियोग, निष्काम कर्मयोग आदि विभिन्न योगसाधनाएं पांच हजार वर्षों से ज्ञानियों, गृहस्थों, संयासियों, साधकों के लिए मार्गदर्शन हेतु दीपस्तंभ के रूप में स्थापित है। श्री कृष्ण के ही कुलबंध 22वें जैन तीर्थंकर अरिष्टनेमी या नेमिनाथ ने इसी काल में सौराष्ट्र स्थित गिरनार पर्वत पर योग साधना कर मोक्ष प्राप्त किया। 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ इस काल में विख्यात योगी हुए। वेदव्यास से लेकर महात्मा बुद्ध के 1500 वर्षों के अंतराल में योगशास्त्र पर अनेकों प्रयोग, शोध हुए तथा अनेकानेक प्रकार की योगपद्धतियों का विकास किया गया। ‘ब्रह्मपुराण’, ‘शिवपुराण’, ‘अग्निपुराण’, ‘विष्णुपुराण’ आदि पुराण एवं ‘पंचरात्र’ आदि तांत्रिक ग्रंथ तथा इनके अनुशांगिक साहित्य में योगसाधना की अनेकों पद्धतियों का वर्णन प्राप्त होता है।
1922 ईस्वी में अविभाजित भारत में मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा की खुदाई की गई जिसमें सिंधुघाटी की अति-प्राचीन सभ्यता का उद्धाटन हुआ। बाद में भारतीय पुरातत्वशास्त्रियों ने उत्तर प्रदेश के आलमगीरपुर, पंजाब के रोपड़, हरियाणा के कुणाल, बनावाली, शीशवाल, राखी गढ़ी, राजस्थान के कालीबंगन, गुजरात के धौलावीर, सुरकोटड़ा, लोथल, भेट, द्वारका, रंगपुर, राजड़ी आदि स्थानों पर उत्खनन कर सिंधु घाटी की समकालीन सभ्यता का अन्वेषण किया। 1985 ई. में भारतीय भूगर्भ-वैज्ञानिकों, पुरातत्वविदों ने नासा के एक उपग्रह से प्राप्त भूगर्भीय मानचित्र के आधार पर आदि बद्री, हिमाचल प्रदेश से लेकर कच्छ के रण तक 4500 किमी क्षेत्र का सर्वेक्षण कर विलुप्त सरस्वती नदी का उद्धाटन किया। इस सिंधु-सरस्वती सभ्यता के उत्खनन में विलुप्त पुरातात्विक सामग्री प्राप्त हुई जिसमें पशुपति शिव, कार्योत्सर्ग मुद्रा में खड़े साधक आदि अनेकों योगमुद्राओं में साधकों की प्रतिमाएं प्राप्त हुई। यह सिंधु-सरस्वती सभ्यता भी योगशास्त्र को लगभग 3000 ईसापूर्व प्राचीन सिद्ध करती है। अतः महाभारतकालीन साहित्यिक स्रोत एवं सिंधु-सरस्वती सभ्यता के पुरातात्विक प्रमाण योगशास्त्र की प्राचीनता को समान रूप से प्रमाणित करते हैं।
भारतीय ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार भगवान बुद्ध एवं स्वामी महावीर का काल लगभग कलि संवत् 1500 अर्थात् 1600 ईसा पूर्व है। बौद्ध और जैन दर्शन संयास और मोक्षोपाय के दर्शन हैं। अतः इस काल में चार आश्रमों की जीवनशैली के स्थान पर संन्यास और मोक्ष का महत्व बढ़ गया और इस काल में मंत्रयोग, यंत्रयोग की योगसाधना का बहुत विकास हुआ। इस क ाल में शाक्तमुनि सिध्दार्थ, मेघंकल, शरणंकर, दीपंकर, कौडिन्य, मंगल, सुमन, रैवत, शोभित, अनामदर्शी, पद्म, नारद, सुमेध, सुजात, प्रियदर्शी, अर्थदर्शी, पुष्य, विपश्यिन, विश्वभू, कुसंधि, कनकमुनि, काश्यप और गौतम चौबीस बुध्दों ने योग साधनाओं के द्वारा निर्वाण प्राप्त किया। हीनयानी बौद्ध ध्यानमार्ग और महायानी बौद्ध अष्टांग योग की साधना करते थे। बोधिसत्व मैत्रेय का ‘सूत्रालंकार’, असंग का ‘योगाचार भूमिशास्त्र’, और वसुबंधु का ‘विज्ञप्तिमात्रतासिध्दि’ आदि इस काल में उल्लेखनीय साधना ग्रंथ है। इन्होंने एक अलग बौद्ध संप्रदाय योगाचार की स्थापना की।
24 वें जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी उनके शिष्य आर्य सुधर्मा, स्थविर संभूति विजय, भद्रबाहू आदि जैन मुनि योगसाधक इसी काल में हुए। गणधर गौतम इंद्रभूति ने जैनसाधना के बारह अंगों और 14 पूर्वों को उपनिबद्ध किया। इस काल में श्वेतांबर और दिगंबर जैन साधकों ने योग विद्या में अनेकों प्रयोग किए और तांत्रिक और शुद्ध यौगिक साधनाओं का विकास किया। बौद्धसंघ की विपश्यना और जैनसंघ की प्रेक्षाध्यान पद्धति का प्रादुर्भाव इसी काल में हुआ। योग-तंत्र मार्ग के अनेकों बौद्ध, जैन साधु इस काल में हुए।
आस्तिक दर्शन के ईश्वर कृष्ण, उद्योतकर आदि सांख्य एवं योग के आचार्य इसी काल की विभूतियां थे। इसी काल में महर्षि गौड़पाद, भाष्यकार पतंजलि एवं गोविंद भागवतपाद ने साधना मार्ग की अनेकों सिध्दियां प्राप्त कीं। ‘जाबालोपनिषद’, ‘योगशिखोपनिषद’, ‘अद्वयतारकोउपनिषद’, ‘तेजबिन्दु उपनिषद’, ‘योगतत्वोपनिषद’, ‘अमृतबिन्दोपनिषद’ आदि योगशास्त्र के ग्रंथों का प्रणयन इस काल में किया गया।
आद्य शंकराचार्य भगवत्पाद का प्रादुर्भाव कलिसंवत् 2593, युधिष्ठिर संवत् 2629 अर्थात् 374 विक्रमपूर्व तदनुसार 509 ईसापूर्व में हुआ। उन्होंने न केवल तत्कालीन भारत में प्रचलित अनेकों दर्शनिक मतों, संप्रदायों, पाखंडों को शास्त्रार्थ से पराजित किया तथा भारत में प्रचलित अनेकों प्रकार की साधना पद्धतियों का समन्वय कर आधुनिक सर्वपंथ-समभाव की आधारशिला रखी। आदिशंकर ने आस्तिक और नास्तिक दर्शनों में प्रचलित, निराकार एवं साकार साधना, ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, बुद्धयोग, जैनयोग आदि को समन्वित कर भविष्य के भारतीय दार्शनिक चिंतन, समन्वित कर्मकांड, मोक्ष साधना, संन्यास की मार्गदर्शिका का निर्माण कर मानवता अभियान का सूत्रपात किया। उन्होंने वेदांत, सांख्य तंत्रशास्त्र, स्त्रोत तथा अनेकों साधना ग्रंथों के साथ-साथ योगसूत्र के वेदव्यास पर लिखकर योगशास्त्र की महत्ता को प्रमाणित किया। उन्होंने दशनामी संप्रदाय तथा चार शंकरमठों की स्थापना कर योग साधना परंपरा को स्थायी कर दिया जो कि पूज्य शंकराचार्यों द्वारा आज तक प्रचलित है।
इसी काल में आगे चलकर गुरू मत्स्येन्द्रनाथ आदि तांत्रिक, गुरू गोरखनाथ आदि योगी, भर्तृहरि आदि नाथपंथी, बौद्ध योगी, व्रजयानी तांत्रिक, सिद्ध सरहपाद आदि नवनाथ-चौरासी सिध्दों की परंपरा, जैनमुनि कुंदकुंदाचार्य, उमास्वाति, हरिभद्रसूरि में अनेकों योगियों ने योगशास्त्र का विस्तार किया। सातवीं शताब्दी ईस्वी में दक्षिण भारत के वैष्णव आळवार एवं शैव नयन्नार संतो ने भक्तियोग की स्थापना की। इसी काल में वाचस्पति मिश्र ने योगशास्त्र के व्यासभाष्य पर ‘तत्ववैशारदी टीका’ लिखकर विद्वत् समाज में योगदर्शन को प्रतिष्ठापित किया। इस कालखंड की सबसे बड़ी विशेषता हठयोग का प्रचलन थी। ‘शिवसंहिता’, ‘घेरंडसंहिता’, ‘सिद्ध-सिध्दांत-पद्धति’, ‘योगसिध्दांत पद्धति’, ‘अवधूतगीता’, ‘हठसंहिता’, ‘हठदीपिका’, ‘कौलज्ञान निर्णय’, ‘कुलार्णव-तंत्र’, ‘विद्यार्णव-तंत्र’ आदि योग-तंत्र के अनेकों ग्रंथ इस काल में रचे गए।
आदि शंकराचार्य के समन्वित दर्शन की आधारशिला पर ही मध्यकालीन निर्गुण और सगुण भक्ति आंदोलन रूपी मानवता से प्रेम की विश्व की अद्वितीय अट्टालिका निर्मित की जा सकी। सातवीं शताब्दी ईस्वी में 12 वैष्णव अलवार संत और 63 शैव नयनार संत भक्तियोग के प्रवर्तक थे। इसी परंपरा में कलियुग की पंचम सहस्राब्दि के आरंभ में रामानुज के सभी जातियों के लिए भक्तियोग की दीक्षा के द्वार खोल दिए। उत्तर भारत में उनके शिष्य स्वामी रामानंद ने भक्ति मार्ग का प्रचार किया। रामानंद के दो शिष्य ज्ञानयोगी संत कबीर और भक्ति मार्गी संत तुलसीदास विश्व प्रसिद्ध संत हुए। इसके साथ ही यमुनाचार्य, मध्वाचार्य, विष्णुस्वामी, निंबार्काचार्य, बल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, गरू नानकदेव, गुरू रामदास, समर्थ श्री रामदास, गुरू अर्जुनदेव, दशमेश गरू गोविन्द सिंह, संत रविदास, गरीबदास, दादु दयाल, नरसी मेहता, संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत नामदेव, संत सुरदास, मीराबाई, रहीम आदि अनेक भक्तों ने भक्तियोग का प्रचार किया। यहां तक कि भारतीय भक्तियोग ने इस्लाम को भी आकर्षित किया और सूफीमत का प्रादुर्भाव हुआ जो कि विपरित मतों के समन्वय का प्रतीक बन गया। शेख मोइनुद्दीन चिश्ती, शेख निजामुदीन औलिया आदि सूफी संत इसकी काल में हुए। मलिक मुहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’ अर्थात् रानी पद्मावती तथा ‘कान्हावत्’ अर्थात् भगवान कृष्ण का चरित्र इस काल की उच्चतम योग-दार्शनिक रचनाएं हैं।
इस कालखंड में योगसाधना में ज्ञानयोग और भक्तियोग अपने चरमोत्कर्ष पर था। एेंद्रीय शक्ति को सिद्धकर भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गुप्त साधनाएं और घोर तपस्याओं को छोड़कर भारतीय समाज शुद्ध आचरण और प्रेम साधना की ओर अग्रसर हुआ। इसके साथ ही योगसाधना केवल संयासियों तक सीमित न रहकर समाज में गृहस्थ जीवन में ही निष्काम भाव से मोक्ष की प्राप्ति के लिए सहज साधना का काल आरंभ हुआ। इस काल की सबसे बड़ी विशेषता मानव-मानव में समानता का उद्धोष था।
भक्तियोग के अतिरिक्त हिरण्यगर्भ की पातंजल योग परंपरा में भी इसी काल में योगशास्त्र का विस्तार होता रहा। योगसूत्र पर राजा भोज प्रणीत ‘राजमार्तण्ड’, हेमचंद्राचार्य के ‘योगशास्त्र’, विज्ञानभिक्षु प्रणीत ‘योगभाष्य’ और ‘योगस्तर संग्रह’, श्रीनिवास भट्ट की ‘हठसंकेत चंद्रिका’, सुंदरदेव की ‘हठतत्वकौमुदी’, हर्षकीर्ति की ‘हठयोग प्रणाली’, आत्माराम की ‘हठयोग प्रदीपिका’, भोगेश्वरमुनि की ‘योगरत्न’ प्रदीपिका आदि योग साहित्य इसी काल के ग्रंथरत्न हैं।
पुनर्जागरण काल में अनेकों युगपुरूषों ने जन्म लिया। स्वामी दयानंद जैसे उद्भट वैदिक विद्वान, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि अरविंद, महर्षि रमण, स्वामी विशुध्दानंद, तैलंग स्वामी, योगीराज श्यामाचरण लाहिड़ी, गोपीनाथ कविराज, आदि अनेकों योगसाधक इस काल में हुए। ईसा की 20वीं सदी के द्वितीय विभूति महात्मा गांधी ने तो निष्काम कर्मयोग और अहिंसा का प्रयोग न केवल सक्रिय राजनीति में किया बल्कि उनके सत्याग्रह ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष योगदान दिया। ईसा की 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में श्रीपद प्रभुपाद, आचार्य रजनीश, महर्षि महेश योगी, श्री सांई बाबा, जैन आचार्य श्री महाप्रज्ञ, बाबा रामदेव आदि महान विभूतियों ने भारतीय योगसाधना और दर्शन का जोर-शोर से प्रचार किया है। परिणामस्वरूप योगदर्शन और साधना ने भारत से बाहर निकलकर विश्वव्यापी साधना का रूप ले लिया। आज विश्व के सभी मतों, संप्रदायों, पूजा पद्धतियों के मानने वालों आस्तिकों, नास्तिकों ने योगसाधना की ओर आकर्षित होकर मोक्ष प्राप्ति या शारीरिक-मानसिक शांति-संतोष की प्राप्ति के लिए प्रयासरत हैं। इस प्रकार सृष्टि के आरंभ से उदय हुए योग-साधना रूपी दीपक अब सभी मतों के समन्वय रूपी सूर्य बनकर अपनी आभा से विश्व को आलोकित कर रहा है।

योग क्या है?

योग क्या है
चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग है।
(मृत्यु) दु:ख से छूटने और (अमृत) आनन्द प्राप्त करने का साधन (योग) ईश्वर उपासना करना है।
योग शब्दों के बारे में भाष्यकारों के अपने-अपने मत हैं। कुछ भाष्यकारों ने योग शब्द को ‘वियोग’, ‘उद्योग’ और ‘संयोग’ के अर्थों में लिया है, तो कुछ लोगों का कहना है कि योग आत्मा और प्रकृति के वियोग का नाम है। कुछ कहते हैं कि यह एक विशेष उद्योग अथवा यत्न का नाम है,
जिसकी सहायता से आत्मा स्वयं को उन्नति के शिखर पर ले जाती है। इसी संबंध में कुछ लोगों का विचार है कि योग ईश्वर और प्राणी के संयोग का नाम है। सच तो यह है कि योग में ये तीनों अंग सम्मलित हैं। अन्तिम उद्देश्य संयोग है, जिसके लिए उद्योग की आवश्यकता होती है और इसी उद्योग का स्वरूप ही यह है कि प्रकृति से वियोग किया जाए।
योग के अंग- यो के आठ अंग होते हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
यम पांच होते हैं, जिनको हम समाज से संबंधित होने के कारण ‘सामाजिक धर्म’ कहेंगे।
नियम भी पांच हैं। चूंकि यह व्यक्ति से संबंध रखते है, अत: इन्हें हम ‘वैयक्तिक धर्म’ कहेंगे। यम और नियम योग में प्रवेश करने वालों के लिए ऐसे आवश्यक अंग हैं, जैसे किसी मकान के लिए उसकी नींव होती है।
वास्तव में योगाभ्यास का आरम्भ ‘आसन’ से होता है, जो योग का तीसरा अंग हैं। आसन का अन्नमय-कोश से संबंध है। आसन करने से अन्नमय-कोश सुन्दर और स्वस्थ बनता है। शरीर निरोगी और तेजस्वी बनता है।
प्राणायाम का प्राणमय-कोश से संबंध है। प्राणायाम करने से प्राणमय कोश की वृद्धि होती है और प्राण शुद्धि होती है।
प्रत्याहार और धारणा का मनोमय कोश (कर्मेन्द्रियों) से संबंध होता है। इससे इन्द्रियों का निग्रह होता है। मन निर्विकारी और स्वच्छ बनता है और उसका विकास होता है।
धारणा का विज्ञानमय कोश (ज्ञानेन्द्रियों) से संबंध है। इससे बुद्धि का शुद्धिकरण और विकास होता है।
समाधि का आनन्दमय कोश (प्रसन्नता, प्रेम, अधिक तथा कम आनन्द) से संबंध है। इससे आनन्द की प्राप्ति होती है।
योगासनों के गुण और लाभ
(1) योगासनों का सबसे बड़ा गुण यह हैं कि वे सहज साध्य और सर्वसुलभ हैं। योगासन ऐसी व्यायाम पद्धति है जिसमें न तो कुछ विशेष व्यय होता है और न इतनी साधन-सामग्री की आवश्यकता होती है।
(2) योगासन अमीर-गरीब, बूढ़े-जवान, सबल-निर्बल सभी स्त्री-पुरुष कर सकते हैं।
(3) आसनों में जहां मांसपेशियों को तानने, सिकोड़ने और ऐंठने वाली क्रियायें करनी पड़ती हैं, वहीं दूसरी ओर साथ-साथ तनाव-खिंचाव दूर करनेवाली क्रियायें भी होती रहती हैं, जिससे शरीर की थकान मिट जाती है और आसनों से व्यय शक्ति वापिस मिल जाती है। शरीर और मन को तरोताजा करने, उनकी खोई हुई शक्ति की पूर्ति कर देने और आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से भी योगासनों का अपना अलग महत्त्व है।
(4) योगासनों से भीतरी ग्रंथियां अपना काम अच्छी तरह कर सकती हैं और युवावस्था बनाए रखने एवं वीर्य रक्षा में सहायक होती है।
(5) योगासनों द्वारा पेट की भली-भांति सुचारु रूप से सफाई होती है और पाचन अंग पुष्ट होते हैं। पाचन-संस्थान में गड़बड़ियां उत्पन्न नहीं होतीं।
(6) योगासन मेरुदण्ड-रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं और व्यय हुई नाड़ी शक्ति की पूर्ति करते हैं।
(7) योगासन पेशियों को शक्ति प्रदान करते हैं। इससे मोटापा घटता है और दुर्बल-पतला व्यक्ति तंदरुस्त होता है।
(8) योगासन स्त्रियों की शरीर रचना के लिए विशेष अनुकूल हैं। वे उनमें सुन्दरता, सम्यक-विकास, सुघड़ता और गति, सौन्दर्य आदि के गुण उत्पन्न करते हैं।
(9) योगासनों से बुद्धि की वृद्धि होती है और धारणा शक्ति को नई स्फूर्ति एवं ताजगी मिलती है। ऊपर उठने वाली प्रवृत्तियां जागृत होती हैं और आत्मा-सुधार के प्रयत्न बढ़ जाते हैं।
(10) योगासन स्त्रियों और पुरुषों को संयमी एवं आहार-विहार में मध्यम मार्ग का अनुकरण करने वाला बनाते हैं, अत: मन और शरीर को स्थाई तथा सम्पूर्ण स्वास्थ्य, मिलता है।
(11) योगासन श्वास- क्रिया का नियमन करते हैं, हृदय और फेफड़ों को बल देते हैं, रक्त को शुद्ध करते हैं और मन में स्थिरता पैदा कर संकल्प शक्ति को बढ़ाते हैं।
(12) योगासन शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वरदान स्वरूप हैं क्योंकि इनमें शरीर के समस्त भागों पर प्रभाव पड़ता है, और वह अपने कार्य सुचारु रूप से करते हैं।
(13) आसन रोग विकारों को नष्ट करते हैं, रोगों से रक्षा करते हैं, शरीर को निरोग, स्वस्थ एवं बलिष्ठ बनाए रखते हैं।
(14) आसनों से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। आसनों का निरन्तर अभ्यास करने वाले को चश्में की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
(15) योगासन से शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम होता है, जिससे शरीर पुष्ट, स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनता है। आसन शरीर के पांच मुख्यांगों, स्नायु तंत्र, रक्ताभिगमन तंत्र, श्वासोच्छवास तंत्र की क्रियाओं का व्यवस्थित रूप से संचालन करते हैं जिससे शरीर पूर्णत: स्वस्थ बना रहता है और कोई रोग नहीं होने पाता। शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक सभी क्षेत्रों के विकास में आसनों का अधिकार है। अन्य व्यायाम पद्धतियां केवल वाह्य शरीर को ही प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं, जब कि योगसन मानव का चहुँमुखी विकास करते हैं।
योगाभ्यास के लिए आवश्यक बातें :
आत्मा से साक्षात्कार के लिए योग एक वैज्ञानिक कला है। योग द्वारा मानसिक शक्तियों का विकास होता है और देह में निहित आत्मा-तत्त्व साथ ही प्रकाशित होता है। प्रत्येक जीवन का क्रियात्मक ज्ञान उससे संबंधित प्रयोगशाला से प्राप्त होता है, जहां उसके अनुकूल सब द्रव्य और उपकरण उपस्थित होते हैं तथा उन द्रव्यों के संश्लेषण-विश्वलेषण से भी हम परिचित होते हैं।
हमारा शरीर ही योग की प्रयोगशाला है। शरीर में मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ये साधन यन्त्ररूप हैं, अभ्यास और वैराग्य, एकाग्रता यन्त्रों के प्रयोग में मुख्य सहायक हैं। योग विज्ञान की प्राप्ति के लिए इसलिए आवश्यक है कि निज देह की प्रयोगशाला को सुव्यवस्थित रखा जाए और यंत्रों का कुशलतापूर्वक प्रयोग किया जाए।
योगाचरण का अधिकार बिना किसी भेद-भाव के हर नर-नारी मात्र को है। योग, मात्र साधु-संन्यासियों और वैरागियों के लिए हैं, यह धारणा गलत है। हां, जिस व्यक्ति के हृदय में पिपासा, अभीप्सा, श्रद्धा और विश्वास है, वही इसका अधिकारी है, फिर वह चाहे कोई भी हो।
योग प्रक्रिया एक साधन है, जिससे पूर्ण लाभान्वित होने के लिए इसके महत्व को ध्यान में रखते हुए यह विश्वास करना चाहिए कि जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए योगाभ्यास किया जा रहा है, उसमें निश्चित रूप से सफलता मिलेगी। योग पद्धति अपने आप में पूर्ण एवं समर्थ हैं।

योग परिचय

योग परिचय
योग मुख्यतः एक जीवन पद्धति है, जिसे पतंजलि ने क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया था। इसमें यम, नियम, आसन,प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि आठ अंग है। योग के इन अंगों के अभ्यास से सामाजिक तथा व्यक्तिगत आचरण में सुधार आता है, शरीर में ऑक्सीजन युक्त रक्त के भली-भॉति संचार होने से शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है, इंद्रियां संयमित होती है तथा मन को शांति एवं पवित्रता मिलती है। योग के अभ्यास से मनोदैहिक विकारों/व्याधियों की रोकथाम, शरीर में प्रतिरोधक शक्ति की बढोतरी तथा तनावपूर्ण परिस्थितियों में सहनश्‍ाक्ति की क्षमता आती है। ध्यान का, जो आठ अंगो में से एक है, यदि नियमित अभ्यास किया जाए तो शारीरिक अहितकर प्रतिक्रियाओं को घटाने की क्षमता बढती है, जिससे मन को सीधे ही अधिक फलदायक कार्यो में संलग्न किया जा सकता है।
यद्यपि योग मुख्यतः एक जीवन पद्धति है, तथापि, इसके प्रोत्साहक, निवारक और रोगनाश्‍ाक अन्तःक्षेप प्रभावोत्पादक है। योग के ग्रंथो में स्वास्थ्य के सुधार, रोगों की रोकथाम तथा रोगों के उपचार के लिए कई आसानों का वर्णन किया गया है । शारीरिक आसनों का चुनाव विवेकपूर्ण ढंग से करना चाहिए। रोगों की रोकथाम, स्वास्थ्य की उन्नति तथा चिकित्सा के उद्देश्‍यों की दृष्टि से उनका सही चयन कर सही विधि से अभ्यास करना चाहिए ।
अध्ययनों से यह प्रदर्शि‍त होता है कि योगिक अभ्यास से बुद्धि तथा स्मरण शक्ति बढती है तथा इससे थकान एवं तनावो को सहन करने, सहने की शक्ति को बढाने मे तथा एकीकृत मनोदेहिक व्यक्तित्व के विकास में भी मदद मिलती है। ध्यान एक दूसरा व्यायाम है, जो मानसिक संवेगों मे स्थिरता लाता है तथा शरीर के मर्मस्थलों के कार्यो को असामान्य करने से रोकता है । अध्ययन से देखा गया है कि ध्यान न केवल इन्द्रियों को संयमित करता है, बल्कि तंत्रिका तंत्र को भी नियंमित करता है।
योग के वास्तविक प्राचीन स्वरूप की उत्पत्ति औपनिषदिक परम्परा का अंग है। तत्व ज्ञान एवं तत्वानुभूति के साधन के रूप में योग का विकास किया गया।
''योगश्‍िचत्तवृत्ति निरोधः''
शरीर एवं मन को स्वस्थ रखने के लिए अष्टाडंग योग की व्याख्या की गई जो निम्न प्रकार है।
1. यम- ''अंहिसासत्यास्तेयब्रहचर्यापरिग्रहा यमाः''
अहिंसा, सत्य, अस्तेय,ब्रहचर्य और अपरिग्रह को यम कहा गया है।
2. नियम- '' शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्‍वरप्रणिधानानि नियमाः''
शौच, संतोष, तप स्वाध्याय और ईश्‍वर प्रणिधान ये पांच नियम कहे है।
3. आसन- '' स्थिर सुखमासनम्‌''
जो स्थिर एवं सुखदायक हो वह आसन कहा है।
मोटे तौर पर योगासनों को तीन वर्गो में बांटा जा सकता है।
ध्यानात्मक आसन- यथा सिद्धासन, पद्मासन भद्रासन स्वस्तिकासन आदि।
विश्रांतिकर आसन- यथा शवासन, दण्डासन, मकरासन आदि।
शरीर संवर्धनात्मक आसन- सिंहासन, गोमुकासन धनुरासन आदि
प्राणायाम- ''तस्मिन्‌ सति श्वासप्रश्‍वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः''
आसन के स्थिर हो जाने पर श्वास प्रश्‍वास की गति को रोकना प्राणायाम कहा गया है।
यह बाह्‌यवृति, आभ्यान्तरवृति और स्तम्भवृति तीन प्रकार का कहा गया है।
प्रत्याहार-'' स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः''
अपने विषयो के साथ सम्बन्ध न होने पर चित्त के स्वरूप का अनुसरण करना इन्द्रियों का प्रत्याहार कहलाता है।
धारणा-'' देश्‍ाबन्धश्‍िचत्तस्य धारणा''
चित्त (मन) का वृत्ति मात्र से किसी स्थान विश्‍ोष में बांधना धारणा कहलाता है।
ध्यान- ''तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्‌''
उस (धारणा) में वृत्ति का एक सा बना रहना ध्यान कहलाता है।
समाधि- '' तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः''
जब केवल ध्येय ही अर्थ मात्र से भासता है और उसका स्वरूप शून्य हो जाता है वह ध्यान ही समाधि कहलाता है।

उपरोक्त प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि उत्तरोत्तर श्रेष्ठतर अवस्थाएं है।

ॐ के उच्चारण के शारीरिक लाभ क्या हैं?

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ॐ के उच्चारण के शारीरिक लाभ क्या हैं?

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१. अनेक बार ओ३म् का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनावरहित हो जाता है|कुछ ही महीनो में पुरे शरीर में चमत्कारिक बदलाव होने लगते है हर पेशी /सेल नयी तरीके से जाग उठते है|
२. अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ओ३म् के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं!
३. यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है.
४. यह हृदय और खून के प्रवाह को संतुलित रखता है.
५. इससे पाचन शक्ति तेज होती है.
६. इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है.
७. थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं.
८. नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है. रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी.
९. जखम/घाव जल्दी भरते है तथा कैंसर,डाईबीटीस,ब्लड प्रेशर जैसे अनेको रोगो में आश्चर्यकारक बदलाव पाए गए है|
१० कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मजबूती आती है.
ओ३म् के उच्चारण का अभ्यास जीवन बदल डालता है|
१. जीवन जीने की शक्ति और दुनिया की चुनौतियों का सामना करने का अपूर्व साहस मिलता है.
२. इसे करने वाले निराशा और गुस्से को जानते ही नहीं!
३. प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल और नियंत्रण होता है. परिस्थितियों को पहले ही भांपने की शक्ति उत्पन्न होती है.
४. आपके उत्तम व्यवहार से दूसरों के साथ सम्बन्ध उत्तम होते हैं. शत्रु भी मित्र हो जाते हैं.
५. जीवन जीने का उद्देश्य पता चलता है जो कि अधिकाँश लोगों से ओझल रहता है.
६. इसे करने वाला व्यक्ति जोश के साथ जीवन बिताता है और मृत्यु को भी ईश्वर की व्यवस्था समझ कर हँस कर स्वीकार करता है.
७. जीवन में फिर किसी बात का डर ही नहीं रहता.
८. आत्महत्या जैसे कायरता के विचार आस पास भी नहीं फटकते. बल्कि जो आत्महत्या करना चाहते हैं, वे एक बार ओ३म् के उच्चारण का अभ्यास ४ दिन तक कर लें. उसके बाद खुद निर्णय कर लें कि जीवन जीने के लिए है कि छोड़ने के लिए!
ओ३म् के उच्चारण के आध्यात्मिक (रूहानी) लाभ क्या हैं?
ओ३म् के स्वरुप में ध्यान लगाना सबसे बड़ा काम है. इससे अधिक लाभ करने वाला काम तो संसार में दूसरा है ही नहीं!
१. इसे करने से ईश्वर/अल्लाह से सम्बन्ध जुड़ता है और लम्बे समय तक अभ्यास करने से ईश्वर/अल्लाह को अनुभव (महसूस) करने की ताकत पैदा होती है.
२. इससे जीवन के उद्देश्य स्पष्ट होते हैं और यह पता चलता है कि कैसे ईश्वर सदा हमारे साथ बैठा हमें प्रेरित कर रहा है.
३. इस दुनिया की अंधी दौड़ में खो चुके खुद को फिर से पहचान मिलती है. इसे जानने के बाद आदमी दुनिया में दौड़ने के लिए नहीं दौड़ता किन्तु अपने लक्ष्य के पाने के लिए दौड़ता है.
४. इसके अभ्यास से दुनिया का कोई डर आसपास भी नहीं फटक सकता. मृत्यु का डर भी ऐसे व्यक्ति से डरता है क्योंकि काल का भी काल जो ईश्वर है, वो सब कालों में मेरी रक्षा मेरे कर्मानुसार कर रहा है, ऐसा सोच कर व्यक्ति डर से सदा के लिए दूर हो जाता है. जैसे महायोगी श्रीकृष्ण महाभारत के युद्ध के वातावरण में भी नियमपूर्वक ईश्वर का ध्यान किया करते थे. यह बल व निडरता ईश्वर से उनकी निकटता का ही प्रमाण है.
५. इसके अभ्यास से वह कर्म फल व्यवस्था स्पष्ट हो जाती है कि जिसको ईश्वर ने हमारे भले के लिए ही धारण कर रखा है. जब पवित्र ओ३म् के उच्चारण से हृदय निर्मल होता है तब यह पता चलता है कि हमें मिलने वाला सुख अगर हमारे लिए भोजन के समान सुखदायी है तो दुःख कड़वा होते हुए भी औषधि के समान सुखदायी है जो आत्मा के रोगों को नष्ट कर दोबारा इसे स्वस्थ कर देता है. इस तरह ईश्वर के दंड में भी उसकी दया का जब बोध जब होता है तो उस परम दयालु जगत माता को देखने और पाने की इच्छा प्रबल हो जाती है और फिर आदमी उसे पाए बिना चैन से नहीं बैठ सकता. इस तरह व्यक्ति मुक्ति के रास्तों पर पहला कदम धरता है

रिफ्रेश योगा

रिफ्रेश योगा
कुछ लोगों का कहना है कि रोजमर्रा की इस भागमभाग जिंदगी में जहाँ साँस लेने की भी फुरसत नहीं है, वहाँ योग और ध्यान कैसे किया जाए। यह रिफ्रेश योगा उन्हीं लोगों के लिए है, जो तीन घंटे की फिल्म देख लेते हैं, सिगरेट या चाय पीने के लिए 10 मिनट निकाल लेते हैं, गपशप करने के लिए 1 घंटे का समय भी जिनको कम पड़ता है। निश्चत ही वे एक मिनट तो निकाल ही लेंगे। दूसरों के लिए नहीं, खुद के लिए।
क्या है रिफ्रेश योगा : रिफ्रेश योगा अंग संचालन और प्राणायाम का हिस्सा मात्र है, लेकिन आप इसे करेंगे तो धीरे-धीरे मानसिक शांति और अच्छे स्वास्थ्य का अनुभव करेंगे। आप इस रिफ्रेश योगा को ऑफिस में, घर पर या बस-ट्रेन-प्लेन के सफर में भी कर सकते हैं। यह तरोताजा होने की कारगर विधि है। दरअसल यह योग की उन छोटी-छोटी बातों का संक्षिप्त कलेक्शन है, जिसे हम जाने-अनजाने करते रहते हैं, बस जरूरत है तो उसे सही तरीके से करने की।
रिफ्रेश योगा से पूर्व : जानें कुछ खास योगिक नियम, जिनका पालन करना या न करना आपके ऊपर निर्भर है। फिर भी यह जानने में क्या बुराई है कि भोजन, पानी और हवा यही हैं जिंदगी का आधार। इसी से शरीर और मन संचालित होता है। तो जानें इनके बारे में भी।
भोजन : जितनी भूख है उससे दो रोटी कम खाएँ। भोजन में सलाद का ज्यादा प्रयोग करें। भोजन बैठकर (पालथी मारकर) ही करें। भोजन करते वक्त मन प्रसन्नचित्त रखें। ऐसा भोजन न करें, जिससे दाँतों और आँतों को अतिरिक्त श्रम करना पड़े। भोजन करने के एक घंटे बाद ही पानी पीएँ। यह भी ध्यान रखें क‍ि थाली में हाथ न धोएँ। कहते हैं कि खान-पान में मात्रा जानने वाले, संभोग में नियम पालने वाले और अन्य बातों और इंद्रियों में संयम और सम्यकता समझने वाले को जब आँधी आती है तो सिर्फ छूकर चली जाती है, इससे विपरीत उक्त बातों का पालन न करने वाले को जड़ सहित उखाड़कर फेंक देती है।
पानी : पानी पीएँ छानकर। ध्यान रहे पानी हलका और मीठा पीएँ। जब प्यास लगे तब पानी पीएँ। पानी बैठकर ही पीएँ। पानी गिलास से पीएँ या फिर हाथों की अंजुली बनाकर ही पीएँ। ऊपर से मुँह में पानी डालकर पीने के अपने नुकसान हैं। जिस पात्र में पानी भरा जाता है व पात्र ईशान कोण में रखा हो, उसके आसपास की जगह साफ हो।
हवा : भोजन कुछ दिन न मिले तो जीवन चल जाएगा। पानी कुछ घंटे न मिले तो भी चल जाएगा, लेकिन हवा हमें हर पल चाहिए। जिस तरह दूषित भोजन और पानी स्वत: ही निकल जाते हैं या कभी-कभार निकालने का प्रयास करते हैं, उसी तरह शरीर के फेफड़ों और पेट में एकत्रित दूषित वायु को निकालने का प्रयास ‍करें। हलके प्रेशर से साँस बाहर फेंक दें, फिर पूरी गहराई से साँस भीतर खींचें, भ्रस्त्रिका और कपालभाति के इस हिस्से को जब भी समय मिले करते रहें। छींक आए तो पूरी ताकत से छींकें।
नींद : नींद एक डॉक्टर है और दवा भी। आपकी नींद कैसी होगी, यह निर्भर करता है इस पर क‍ि आप दिनभर किस तरह से जीएँ। जरूरी है कार्य, विचार, आहार और व्यवहार पर गंभीर मंथन करना। यदि यह संतुलित और सम्यक रहेगा तो भरपूर ‍नींद से स्वास्थ्‍य में लाभ मिलेगा। यह भी ध्यान रखें क‍ि ज्यादा या कम नींद से सेहत और मन पर विपरीत असर पड़ता है। अच्छे स्वप्नों के लिए अच्छी दिनचर्या को मैनेज करें। इससे स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।
कैसे करें रिफ्रेश योगा :
योगा एक्सरसाइज : आँखों को, जीभ को, हाथ-पैर की कलाइयों को, कमर को, गर्दन को दाएँ-बाएँ और ऊपर-नीचे करते हुए गोल-गोल घुमाएँ। हाथों की मुट्ठी को खोलें और बंद करें। इसी तरह पैरों की अँगुलियों की योगा एक्सरसाइज करें। कानों को मरोड़ें, पूरा मुँह खोलकर बंद करें। बदन में किसी देवता के आने जैसा हिलें या धूजें। गादी पर लोट लगाएँ। गुलाटी लगाने का प्रयास न करें। बदन में लचक हो तो ही गुलाटी लगाएँ। अंगड़ाई आए तो उसको अच्छे से मजा लेते हुए करें। यह सब कुछ अंग संचालन का हिस्सा मात्र है।
मन और मस्तिष्क : मानसिक द्वंद्व, चिंता, दुख: या दिमागी बहस हमारी साँसों की गति को अनियंत्रित करते हैं, जिससे खून की गति भी असंतुलित हो जाती है। इसका सीधा असर हृदय, फेफड़े और पेट पर होता है और यह गंभीर रोग का कारण भी बन सकता है। इसका सीधा-सा समाधान है कि जब भी तनावग्रस्त्र या ज्यादा सोचग्रस्त्र रहें तो पेट और फेफड़ों की हवा पूरी तरह से बाहर निकाल दें और नए सिरे से ताजी हवा भरें। ऐसा पाँच से छह बार करें। हँसने का मौका हो तो खिलखिलाकर हँसें।
झपकी ध्यान : सिर्फ एक मिनट का झपकी ध्यान करें। ऑफिस या घर में जब भी लगे तो 60 सेकंड की झपकी मार ही लें। इसमें साँसों के आवागमन को तल्लीनता से महसूस करें। गहरी-गहरी साँस लें। यह न सोचें क‍ि कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा। हाँ आफिस में इसे सतर्कता से करें, वरना बॉस गलत समझ बैठेंगे। इस ध्यान से आप स्वयं को हर वक्त तरोताजा महसूस करेंगे।
मौन : मौन से मन की आंतरिक्त शक्ति और रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। कुछ क्षण ऐसे होते हैं जबकि हम खुद-ब-खुद मौन हो जाते हैं। ऐसा कुछ विशेष परिस्थिति में होता है, लेकिन मौन रहने का प्रयास करना और यह सोचते हुए क‍ि मौन में कम से कम सोचने का प्रयास करूँगा, ज्यादा से ज्यादा देखने और साँसों के आवागमन को महसूस करने का प्रयास करूँगा, एक बेहतर शुरुआत होगी। दो घंटे की व्यर्थ की बहस से 10 मिनट का मौन रिफ्रेश कर विजन पावर बढ़ाएँगा।
अंतत: : यदि कर सकें तो कभी-कभार भ्रस्त्रिका, कपालभाति और अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें। आसनों में सुप्त वज्रासन, पश्चिमोत्तनासन पादहस्तासन, भुजंगासन, हलासन, वकरासन और अर्धमत्स्येंद्रासन करें। जरूरी नहीं कि सभी आसन या प्राणायम एक साथ करें या इनके लिए अलग से समय निकालें। कोई भी एक आसन का चयन कर लें और सुबह टॉइलेट के बाद नहाने के पहले या बाद में कर डालें।

लंबे समय तक युवा दिखना है तो करें ये आसन

लंबे समय तक युवा दिखना है तो करें ये आसन
उम्र को रोकना तो हमारे हाथ में नहीं है लेकिन बढ़ती उम्र में होने वाली समस्याओं से खुदको दूर रखना जरूर हमारे बस में है। बढ़ती उम्र के प्रभावों को रोकने और लंबे समय तक युवा दिखने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। बाजार से तरह-तरह के एंटी एजिंग उत्पाद खरीदकर लाते हैं, तरह-तरह के ट्रीटमेंट करवाते हैं और अपना बजट बिगाड़ते हैं।
अगर हम यह कहें कि बढ़ती उम्र के प्रभावों को कुछ हद तक कम करने और स्वस्थ व तरोताजा रहने के लिए हम आपको कुछ ऐसे योगासनों की जानकारी दे रहे हैं जो बेहद आसान भी हैं और कारगर भी हैं। साथ ही, ये लंबे समय तक आपको युवा बनाए रखने के सबसे किफायती उपाय हैं। ऐसे ही कारगर एंटी-एजिंग योगासनों की जानकारी कुछ इसप्रकार है।
शीर्षासन
वैसे तो शीर्षासन एक कठिन योगासन है जिसे हर कोई नहीं कर सकता लेकिन एंटी एजिंग योगासन के रूप में यह बहुत प्रभावी है। इस आसन के दौरान मस्तिष्क और चेहरे में रक्तप्रवाह तेज होता है। इसके अलावा इससे चेहरे पर झुर्रिया कम हो जाती हैं। �
शीर्षासन करने के लिए के सबसे पहले समतल स्थान पर चटाई बिछाकर वज्रासन में बैठ जाएं। अब आगे की ओर झुककर दोनों हाथों की कोहनियों को जमीन पर टिका दें। दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में जोड़ लें। अब सिर को दोनों हथेलियों के मध्य धीरे-धीरे रखें। सांस सामान्य रखें। सिर को जमीन पर टिकाने के बाद धीरे-धीरे शरीर का पूरा वजन सिर छोड़ते हुए शरीर को ऊपर की उठाना शुरू करें। शरीर का भार सिर पर लें। शरीर को सीधा कर लें।
इस आसन को करते वक्त ध्यान रखें कि आप इसे किसी योग प्रशिक्षक के निरीक्षण में ही करें जिससे इसमें किसी प्रकार की चूक न हो। साथ ही, इसे तभी करें जब आप पूरी तरह स्वस्थ महसूस कर रहे हों।
धनुरासन
इस आसन में शरीर धनुष के आकार में होता है। इसे करने से पाचनतंत्र मजबूत होता है और फेफड़ों में ऑक्सीजन का प्रवाह ठीक तरह से होता है। इससे रक्त से टॉक्सिन्स दूर होते हैं जिससे त्वचा साफ होती है और स्वस्थ रहती है।
इसे करने के लिए सबसे पहले चटाई पर पेट के बल लेट जाएं। ठुड्डी ज़मीन पर रखें। पैरों को घुटनों से मोड़ें और दोनों हाथों से पैरों के पंजे पकड़ें। फिर सांस भर लीजिए और बाजू सीधे रखते हुए सिर, कंधे, छाती को जमीन से ऊपर उठाएं। इस स्थिति में सांस सामान्य रखें और चार-पाँच सेकेंड के बाद सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे पहले छाती, कंधे और ठुड्डी को जमीन की ओर लाएं। पंजों को छोड़ दें और कुछ देर विश्राम करें। इस प्रक्रिया को कम से कम तीन बार दोहराएं।
सिंहासन
सिंहासन एक बेहतरीन एंटी एजिंग आसन है। इसे करने से फेफड़ों में ऑक्सीजन पहुंचता है, त्वचा ढीली नहीं पड़ती, आंखों की रोशनी बरकरार रहती है और झुर्रियां दूर होती हैं।
इसके करने के लिए पंजों को मिलाकर उनके बल बैठ जाएं। फिर दाएं हाथ को दाएं घुटने और बाएं हाथ को बाएं घुटने पर रखें। अब लंबी सांस लें और मुंह को जितना खोल सकते हैं उतना खोलकर सांस छोड़ें। इस क्रिया को दो से पांच बार करें। इसके बाद इसी क्रिया को ऐसे करें जिसमें सांस छोड़ते वक्त आपकी जीभ बाहर निकली हो। ‌फिर सामान्य मुद्रा में आ जाएं।

कुंडलीनी के चक्र :

कुंडलीनी के चक्र :

कुंडलिनी शक्ति समस्त ब्रह्मांड में परिव्याप्त सार्वभौमिक शक्ति है जो प्रसुप्तावस्था में प्रत्येक जीव में विद्यमान रहती है। इसको प्रतीक रूप से साढ़े तीन कुंडल लगाए सर्प जो मूलाधार चक्र में सो रहा है के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है।
तीन कुंडल प्रकृति के तीन गुणों के परिचायक हैं। ये हैं सत्व (परिशुद्धता), रजस (क्रियाशीतता और वासना) तथा तमस (जड़ता और अंधकार)। अर्द्ध कुंडल इन गुणों के प्रभाव (विकृति) का परिचायक है।
कुंडलिनी योग के अभ्यास से सुप्त कुंडलिनी को जाग्रत कर इसे सुषम्ना में स्थित चक्रों का भेंदन कराते हुए सहस्रार तक ले जाया जाता है।
नाड़ी : नाड़ी सूक्ष्म शरीर की वाहिकाएँ हैं जिनसे होकर प्राणों का प्रवाह होता है। इन्हें खुली आँखों से नहीं देखा जा सकता। परंतु ये अंत:प्राज्ञिक दृष्टि से देखी जा सकती हैं। कुल मिलाकर बहत्तर हजार नाड़ियाँ हैं जिनमें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना सबसे महत्वपूर्ण हैं।
इड़ा और पिंगला नाड़ी मेरुदंड के दोनों ओर स्थित sympathetic और para sympathetic system के तद्नुरूप हैं। इड़ा का प्रवाह बाई नासिका से होता है तथा इसकी प्रकृति शीतल है। पिंगला दाहिनी नासिका से प्रवाहित होती है तथा इसकी प्रकृति गरम है। इड़ा में तमस की प्रबलता होती है, जबकि पिंगला में रजस प्रभावशाली होता है। इड़ा का अधिष्ठाता देवता चंद्रमा और पिंगला का सूर्य है।
यदि आप ध्यान से अपनी श्वांस का अवलोकन करेंगे तो पाएँगे कि कभी बाई नासिका से श्वांस चलता है तो कभी दाहिनी नासिका से और कभी-कभी दोनों नासिकाओं से श्वांस का प्रावाह चलता रहता है। इंड़ा नाड़ी जब क्रियाशील रहती है तो श्‍वांस बाई नासिका से प्रवाहित होता है। उस समय व्यक्ति को साधारण कार्य करना चाहिए। शांत चित्त से जो सहज कार्य किए किए जा सकते हैं उन्हीं में उस समय व्यक्ति को लगना चाहिए।
दाहिनीं नासिका से जब श्वांस चलती है तो उस समय पिंगला नाड़ी क्रियाशील रहती है। उस समय व्यक्ति को कठिन कार्य- जैसे व्यायाम, खाना, स्नान और परिश्रम वाले कार्य करना चाहिए। इसी समय सोना भी चाहिए। क्योंकि पिंगला की क्रियाशीलता में भोजन शीघ्र पचता है और गहरी नींद आती है।
स्वरयोग इड़ा और पिंगला के विषय में विस्तृत जानकारी देते हुए स्वरों को परिवर्तित करने, रोग दूर करने, सिद्धि प्राप्त करने और भविष्यवाणी करने जैसी शक्तियाँ प्राप्त करने के विषय में गहन मार्गदर्शन होता है। दोनों नासिका से साँस चलने का अर्थ है कि उस समय सुषुम्ना क्रियाशील है। ध्यान, प्रार्थना, जप, चिंतन और उत्कृष्ट कार्य करने के लिए यही समय सर्वश्रेष्ठ होता है।
सुषुम्ना नाड़ी : सभी नाड़ियों में श्रेष्ठ सुषुम्ना नाड़ी है। मूलाधार (Basal plexus) से आरंभ होकर यह सिर के सर्वोच्च स्थान पर अवस्थित सहस्रार तक आती है। सभी चक्र सुषुम्ना में ही विद्यमान हैं। इड़ा को गंगा, पिंगला को यमुना और सुषुम्ना को सरस्वती कहा गया है।
इन तीन ना‍ड़ियों का पहला मिलन केंद्र मूलाधार कहलाता है। इसलिए मूलाधार को मुक्तत्रिवेणी (जहाँ से तीनों अलग-अलग होती हैं) और आज्ञाचक्र को युक्त त्रिवेणी (जहाँ तीनों आपस में मिल जाती हैं) कहते हैं।
चक्र : मेरुरज्जु (spinal card) में प्राणों के प्रवाह के लिए सूक्ष्म नाड़ी है जिसे सुषुम्ना कहा गया है। इसमें अनेक केंद्र हैं। जिसे चक्र अथवा पदम कहा जाता है। कई ना‍ड़ियों के एक स्थान पर मिलने से इन चक्रों अथवा केंद्रों का निर्माण होता है। गुह्य रूप से इसे कमल के रूप में चित्रित किया गया है जिसमें अनेक दल हैं। ये दल एक नाड़ी विशेष के परिचायक हैं तथा इनका अपना एक विशिष्ट स्पंदन होता है जिसे एक विशेष बीजाक्षर के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है।
इस प्रकार प्रत्येक चक्र में दलों की एक निश्चित संख्‍या, विशिष्ट रंग, इष्ट देवता, तन्मात्रा (सूक्ष्मतत्व) और स्पंदन का प्रतिनिधित्व करने वाला एक बीजाक्षर हुआ करता है। कुंडलिनी जब चक्रों का भेदन करती है तो उस में शक्ति का संचार हो उठता है, मानों कमल पुष्प प्रस्फुटित हो गया और उस चक्र की गुप्त शक्तियाँ प्रकट हो जाती हैं।
(नोट :- मूलत: सात चक्र होते हैं:- मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार)
कुंडलिनी योग का अभ्यास :
सेवा और भक्ति के द्वारा साधक को सर्वप्रथम अपनी चित्तशुद्धि करनी चाहिए। आसन, प्राणायाम, बंध, मुद्रा और हठयोग की क्रियाओं के अभ्यास से नाड़ी शुद्धि करना भी आवश्यक है। साधक को श्रद्धा, भक्ति, गुरुसेवा, विनम्रता, शुद्धता, अनासक्ति, करुणा, प्रेरणा, विवेक, मानसिक ‍शांति, आत्मसंयम, निर्भरता, धैर्य और संलग्नता जैसे सद्गुणों का विकास करना चाहिए।
उसे एक के बाद दूसरे चक्र पर ध्यान करना आवश्यक है। जैसा कि पूर्व पृष्ठों में बताया गया है उसे एक सप्ताह तक मूलाधारचक्र और फिर एक सप्ताह तक क्रमश: स्वाधिष्ठान इत्यादि चक्रों पर ध्यान करना चाहिए।
विभिन्न विधियाँ : कुंडलिनी जागरण की विभिन्न विधियाँ हैं। राजयोग में ध्यान-धारणा के द्वारा कुंडलिनी जाग्रत होती है, जब कि भक्त से, ज्ञानी, चिंतन, मनन और ज्ञान से तथा कर्मयोगी मानवता की नि:स्वार्थ सेवा से कुंडलिनी जागरण करता है।
कुंडलिनी अध्यात्मिक प्रगति मापने का बैरोमीटर है। साधना का चाहे कोई मार्ग क्यों न हो, कुंडलिनी अवश्य जाग्रत होती है। साधना में प्रगति के साध कुंडलिनी सुषम्ना नाड़ी में अवश्य चढ़ती है।
कुंडलिनी का सुषुम्ना में ऊपर चढ़ने का अर्थ है चेतना में अधिकाधिक विस्तार। प्रत्येक केंद्र प्रयोगी को प्रकृति के किसी न किसी पक्ष पर नियंत्रण प्रदान करता है। उसे शक्ति और आनंद की प्राप्ति होती है।
कुंडलिनी जागरण के लिए कुंडलिनी प्राणायाम, अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। कुंडलिनी जब मूलाधार का भेदन करती है तो व्यक्ति अपने निम्नस्वरूप से ऊपर उठ जाता है। अनाहत चक्र के भेदन से योगी वासनाओं (सूक्ष्म कामना) से मुक्त हो जाता है और जब कुंडलिनी आज्ञाचक्र का भेदन कर लेती है तो योगी को आत्मज्ञान हो जाता है। उसे परमानंद अनुभव होता है।

Saturday, July 18, 2015

ध्यान

ध्यान
शुरुआत के लिये 11 सरल सुझाव
प्रीतिका नायर
1 आँखे बंद करके शांत बैठना कठिन लगता है ? इसके लिये चिंता न करें आप ऐसें अकेले नहीं है | ये कुछ सरल उपाय हैं, उस व्यक्ति के लिये जो ध्यान करना शुरू करना चाहता है | इस अभ्यास में जैसे आप नियमित होंगे, आप निश्चित ही इसके और गहन में जायेंगे |इसकी शुरुआत इन 11 सरल सुझावों के साथ करें |...
2सुविधाजनक समय को चुने : ध्यान वास्तव में विश्राम का समय है, इसलिये इसे अपनी सुविधा के अनुसार करें | ऐसा समय चुने जिसमे आप को कोई परेशान न कर सके और आप विश्राम और आनंद लेने के लिये स्वतंत्र हो | सूर्योदय और सूर्यास्त का समय जब प्रकृति दिन और रात में परिवर्तित होती है, यह समय इसका अभ्यास करने लिये सबसे आदर्श है |
3शांत स्थान चुने :सुविधाजनक समय के जैसे सुविधाजनक स्थान को चुने जहां आप को कोई परेशान न कर सके | शांत और शान्तिप्पूर्ण वातावरण ध्यान के अनुभव को और अधिक आनंदमय और विश्रामदायक बनाता है |
4आराम से बैठें : आप की मुद्रा से बहुत फर्क पड़ता है | यह निश्चित कर ले कि आप आराम से, सुखद और स्थिर है | सीधे बैठें और रीड की हड्डी सीधी रखे, अपने कंधे और गर्दन को विश्रामदेह रखे और पूरी प्रक्रिया के दौरान आँखे बंद ही रखें | आप को पद्मासन (कमल मुद्रा ) में बैठना होगा, यह ध्यान के बारे में आम कल्पना है |
5पेट को खाली रखे : भोजन से पहले ध्यान का अच्छा समय होता है | भोजन के बाद में आप को नींद लग सकती है | जब आप को काफी भूख लगी हो तो ध्यान करने का अधिक प्रयास न करें | भूख की ऐंठन के कारण आपको इसे करने में कठिनाई होगी और हो सकता है कि पूरे वक्त आप सिर्फ खाने के बारे में सोचे | ऐसें में आप भोजन के दो घंटे उपरांत ध्यान कर सकते हैं |
6इसे वार्मअप से शुरू करें : थोड़ी देर का वार्मअप या सूक्ष्म योग ध्यान के पहले करने से आपका रक्त के परिसंचरण में सुधार होता है, शरीर की जड़ता और बैचेनी दूर होती है और शरीर हल्का महसूस होता है | आप स्थिरता के साथ अधिक समय बैठ सकेंगे |
7कुछ लंबी गहरी सांसे लीजिये | यह आसानी से ध्यान करने की तैयारी है | ध्यान के पहले गहरी सांस लेना और छोड़ना और नाड़ी शोधन प्राणायाम करना अच्छा होता है | इससे सांस की लय स्थिर हो जाती है और मन शांतिपूर्ण ध्यान अवस्था में चला जाता है |
8अपने चेहरे पर सौम्य मुस्कान बना कर रखें:आप फर्क महसूस करेंगे | एक निरंतर सौम्य मुस्कान से आप आराम औए शांति महसूस करेंगे और यह आपके ध्यान के अनुभव को बढ़ाता है |
9निर्देशित ध्यान से शरू करें : नये लोगों के लिये ध्यान का अभ्यास करने के लिये निर्देशित ध्यान का सहारा लेना अच्छा होगा | इससे आप की ध्यान के अभ्यास की शुरुआत हो जायेगी | आप को सिर्फ आँखों को बंद करके आराम करना है और निर्देशों को सुनकर उसका पालन करते हुये अनुभव का आनंद लेना है |
10 अपनी आँखों को धीरे धीरे सौम्यता से खोले: जैसे आप ध्यान के अंत में पहुंचे तो अपनी आँखों को खोलने में जल्दी न करें और चलने न लग जायें | अपनी आँखे धीरे धीरे खोले और अपने प्रति और वातावरण के प्रति सजग होने के लिये समय लें |
11 ताज़गी का अनुभव करें और दिन का आनंद लें : ध्यान तत्काल ऊर्जा बूस्टर के जैसे है | अपने दिनचर्या में कुछ मिनटों का ध्यान आपको में दिन भर उर्जावान रखेगा | उतना समय निकाले और अपने लिये ध्यान के आश्चर्यों का अनुभव करें |
"ध्यान लग जाता है और इसे आप कर सकते हैं | ध्यान लगाने के लिये सिर्फ आप ही सहज और सुखद वातावरण निर्मित कर सकते हैं |

Saturday, June 6, 2015

ध्यान का अर्थ होता है


एक तो ध्यान और एक ज्ञान। ध्यानी नहीं शिव सारसा! शिव जैसा ध्यानी नहीं है। ध्यानी हो तो शिव जैसा हो। क्या अर्थ है? ध्यान का अर्थ होता है : न विचार, वासना, न स्मृति, न कल्पना। ध्यान का अर्थ होता है : भीतर सिर्फ होना मात्र। इसीलिए शिव को मृत्यु का, विध्वंस का, विनाश का देवता कहा है। क्योंकि ध्यान विध्वंस है-विध्वंस है मन का। मन ही संसार है। मन ही सृजन है। मन ही सृष्टि है। मन गया कि प्रलय हो गयी। ऐसा मत सोचो कि किसी दिन प्रलय होती है। ऐसा मत सोचो कि एक दिन आयेगा जब प्रलय हो जायेगी और सब विध्वंस हो जायेगा। नहीं, जो भी ध्यान में उतरता है, उसकी प्रलय हो जाती है। जो भी ध्यान में उतरता है, उसके भीतर शिव का पदार्पण हो जाता है।
ध्यान है मृत्यु- मन की मृत्यु, ‘मैं’ की मृत्यु, विचार का अंत। शुद्ध चैतन्य रह जाये-दर्पण जैसा खाली! कोई प्रतिबिम्ब न बने।
तो एक तो यात्रा है ध्यान की। और फिर ध्यान से ही ज्ञान का जन्म होता है। जो ज्ञान ध्यान के बिना तुम इकट्ठा करते हो, वह ज्ञान नहीं है, ज्ञान का धोखा है। मिथ्या ज्ञान है। ज्ञान तो ध्यान में जन्मता है। ध्यान है शुद्ध बोध। उस बोध में तुम्हें दिखाई पड़ना शुरू होता है। जीवन का अर्थ, जीवन का रहस्य। ध्यान तो है कुंजी, खोल देती है अनंत के द्वार।
ध्यानी नहीं शिव सारसा ग्लानी सा गोरख।
न तो आज दिखाई पड़ते हैं ध्यानी, जिन्होंने शिव को निमंत्रण किया हो, जो शिव जैसे हो गये हों। है।, शिव की प्रतिमाएं पूजी जा रही हैं। गांव गांव घर -घर शिव के आराधन, पूजन के आयोजन चल रहे हैं। जितनी शिव की प्रतिमाएं हैं, उतनी तो किसी और की नही है.
शिवलिंग ध्यान का प्रतीक है। वह ध्यान की आखिरी गहरी अवस्था का प्रतीक है।
शिव की जगह-जगह पूजा हो रही है, लेकिन पूजा की वात नहीं है। शिवत्व उपलब्धि की बात है। वह जो शिवलिंग तुमने देखा है बाहर मंदिरों में, वृक्षों के नीचे, तुमने कभी ख्याल नहीं किया, उसका आकार ज्योति का आकार है। जैसे दीये की ज्योति का आकार होता है। शिवलिंग अंतर्ज्योति का प्रतीक है। जब तुम्हारे भीतर का दीया जलेगा तो ऐसी ही ज्योति प्रगट होती है, ऐसी ही शुभ्र! यही रूप होता है उसका। और ज्योति बढ़ती जाती है, बढ़ती जाती है। और धीरे – धीरे ज्योतिर्मय व्यक्ति के चारों तरफ एक आभामंडल होता है; उस आभामंडल की आकृति भी अंडाकार होती है।
और जिसने ध्यान जाना हो, उसके ही भीतर गोरख जैसा ज्ञान पैदा होता है। संतों की परंपरा में गोरख का बड़ा मूल्य है। क्योंकि गोरख ने जितनी ध्यान को पाने की विधिया हद हैं, उतनी किसी ने नहीं दी हैं। गोरख ने जितने द्वार ध्यान के खोले, किसी ने नहीं खोले। गोरख ने इतने द्वार खोले ध्यान के कि गोरख के नाम से एक शब्द भीतर चल पड़ा है-गोरखधंधा! गोरख ने इतने द्वार खोले कि लोगों को लगा कि यह तो उलझन की बात हो गयी। गोरख ने एक- आध द्वार नहीं खोला, अनंत द्वार खोल दिये! गोरख ने इतनी बातें कह दीं, जितनी किसी ने कभी नहीं कही थीं।
बुद्ध ने ध्यान की एक प्रक्रिया दी है, विपस्सना; बस पर्याप्त। महावीर ने ध्यान की एक प्रक्रिया दी है, शुक्ल ध्यान; बस पर्याप्त। पतंजलि ने ध्यान की एक प्रक्रिया दी है, निर्विकल्प समाधि। बस पर्याप्त। गोरख ने परमात्मा के मंदिर के जितने संभव द्वार हो सकते हैं, सब द्वारों की चाबिया दी हैं।
गोरख मरे। ध्यान में डूबे। गोरख ने पहले शिव को निमंत्रित कर लिया-विध्वंस के देवता को। ध्यान में जाना अर्थात शिव को निमंत्रण देना है कि आओ और मुझे मिटाओ। और जो मिट गया उसके भीतर ज्ञान को जन्म होता है। जो मिट गया, उसके भीतर ज्ञान की धारा उठती है। मुहम्मद मिटे तो कुरान जन्मा। वेद के ऋषि मिटे तो वेद जन्मे। उपनिषद किनसे गाये गये? उनसे गाये गये जो मिट गये थे। ऐसे ही गीता, ऐसे ही बाइबिल, ऐसे ही धम्मपद।
इस जगत में जो भी अनूठे गीत उतरे हैं, वे उनसे उतरे हैं जो बांस की पोली पोंगरी हो गये थे। जिन्होंने अपने को बीच से बिलकुल हटा लिया था। और जिन्होंने कहा परमात्मा को कि तुझे जो गाना होगा, हम बाधा न देंगे। अगर कुछ भूल-चूक होगी तो हमारी होगी, अगर कुछ ठीक होगा तो बस तेरा। सब ठीक तेरा, सब भूलें हमारी।
जो बिलकुल हट गये, उनसे ज्ञान जन्मा। ज्ञान किताबों से नहीं मिलता। ज्ञान अध्ययन से नहीं मिलता। मनन से नहीं मिलता, चिंतन से नहीं मिलता। पाडित्य मिलता है अध्ययन, मनन, चिंतन से। ज्ञान तो ध्यान से मिलता है। इसलिए मौलिक अर्थों में तो ध्यान ही ज्ञान है।
ररे रमे सूं निसितिरया! राम में जो रम जाये, पूरा- का-पूरा,
ऐसा रम जाये कि अलग बचे ही नहीं, न दिन न रात को भेद रह जाये, चौबीस घंटे रमा रहे राम में, क्षण भर की दरी न हो, कण- भर की दूरी न हो- वही साधु है।
। मूल्य है जो ध्यान में उतर जाये और ज्ञान के मोतियों को ले आये। मूल्य उसका है, जो डुबकी मारे ध्यान के सागर में और ले आये मोतियों को भरके। जो शिव में डूबे और गोरख बनकर निकले, मूल्य उसका है।
ररे रमे सूं निसतिरया! राम ही राम रह जाये जिसके जीवन में, दिन और रात एक ही धुन बजे, एक ही गीत उठे-वही साधु है। कोड अठासी रिख…। ऐसे वो फिर करोड़ों साधु हैं। हंसा तो मोती चुगैं, बगुला गार तलाई। और अगर तुम हंस हो तो ऐसे साधु को खोज ही लोगे।
हंसा तो मोती चुगैं!
हंसा तो मोती चुगैं, बगुला गार तलाई। बगुले तो कीचड़ में बैठे रहते हैं। कहीं भी गंदे तालाबों की कीचड़ के पास बैठे रहते हैं। लगते है हंसों जैसे ही हैं। और बड़े भगत भी मालूम होते हैं।
हंस की खूबी क्या है? हंस मानसरोवर की खाज करता है। देखते हो, हमने हंसों की उस नरम झील को, जो दूर हिमालय के पवित्र शांत, अक्षइषत वातावरण में है – ‘मानसरोवर’ कहा है। सोचकर कहा है, क्योंकि ऐसे ही जो हंस हैं, वे भीतर के मानसरोवर को खोजते हैं – जहां मन समाप्त हो जाता है और चेतना का सागर ही लहराता हर जाता है। जहां मन के सारे दूषण, गंदी हवाएं विदा हो गयी हों और जहां अछूती क्यारी झील रह जाये -मानसरोवर उसी का नाक है। वह तुम्हारे भीतर है।
हिमालय के पहाड़ तुम्हें भी अपने भीतर चढ़ने होंगे, तो ही तुम उस मानसरोवर को खोज पाओगे। और वहां मोतियों से ही, मोतियों से भरी है झील। मोती ही हंस के योग्य हैं। इस संसार से जो तृप्त हो जाता है, समझ लेना कि बगुला है। कीचड़ से तृप्त हो गया, कमल से पहचान ही न हुई।
हंसा तो मोती चुगैं बगुला गार तलाई।
हरिजन हरिसू यूं मिल्या, व्यू जल में रस भाई।।
और जैसे जल में जाता है, ऐसे ही हरिजन वही है जो हरि से मिल गया।
हरिजन हरिसू यूं मिल्या…। हरिजन तो वह है, जो हरि से इस भांति मिल गया, जैसे जल में जल को डाल दो और दानों जल एक हो जायें; जैसे नदी सागर में उतरे और एक हो जाये। जो राम से ऐसा मिल गया। जो हरि के साथ एक हो गया। सिर्फ बुद्ध पुरुषों को ही हरिजन कहा जा सकता है। ब्राह्मण भी हरिजन नहीं हैं, शूद्र तो होते। ब्रह्म को जानते तो हरिजन होते। ब्राह्मण भी ब्राह्मण नहीं है, न हरिजन है। क्या हरिजन होंगे! कभी- कभी कोई विरला व्यक्ति हरिजन हो पाता है।
रा मरण जग जलभ पूनि, अएए जग द्य घणाई।
चरण सरेवा राजस, राख लेव शरणाई।।
अपने गुरु से, जब गुरु ने पुकार दी- ‘और है कोई लेनेहारा? ‘-तो लाल कहते हैं कि जुलू मरण… दिखाई पड़ गया मुझे कि बुढ़ापा है, फिर मौत है, फिर – फिर आना है। यही चक्कर है जन्म का और मरण का। और यह जीवन सिवाय दुख के और कुछ भी नहीं है। उसे एक पुकार में दिख गया! यह देख कर ही कि गुरु अपने हाथ से कब्र में उतर रहा है-बुद्धि जिसके पास भी होती, उसको भी दिखाई पड़ जाता कि इस जगत में पाने योग्य कुछ भी नहीं है। इस जगत में अगर मरने की कला आ
गयी तो सब आ गया।
जुरा मरण जग जलभ पुनि! यहां है ही क्या? बुढ़ापा है, बीमारी है, दुख हैं, चिंताएं हैं, संताप हैं। फिर मौत है, फिर जन्म; और फिर वही सिलसिला है। बड़ा दुख है इस जीवन में। चरण सरेवा राजस! कहते हैं गुरु को : मुझे चरण छू लेने दो! इसके पहले कि तुम विदा हो जाओ, मुझे चरण छू लेने दो। चरण सरेवा राजस, राख लेव शरणाई।
जाने के पहले मुझे शरण दे दो। मिटने के पहले मुझे भी मिटा दो। तुम्हारी समाधि मेरी समाधि भी बन जाये। तुम्हारी मौत मेरी मौत भी बन जाये। बस एक ही आकांक्षा तुमने जगा दी कि तुम्हारे चरण छू लूं।
सदगुरु के चरण छूना ही पर्याप्त है। मगर हमारे मुल्क में तो चरण छूना औपचारिकता हो गयी है। तुम तो जहां जाओ वहीं हर किसी के चरण छूते हो। चरण छूना एक शिष्टाचार हो गया है। शिष्टाचार के कारण चरण छूने का जो राज था वह खो गया। चरण छूने का जो अपूर्व अर्थ था, वह खो गया। जैसे हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हैं, ऐसे ही बड़ा बुजुर्ग कोई मिला, उसके चरण छूकर नमस्कार कर लेते हो : चरण छू लेते हो, मगर सिर झुकता नहीं। चरण छू लेते हो, मगर अहंकार झुकता नहीं। इसलिए कहते हैं कि मुझे अपने पर भरोसा नहीं है। तुम्हारी ही कृपा हो तो मैं तुम्हारे चरण छू पाऊं। मैं तो छू रहा हूं मगर दो आशीर्वाद कि यह छूना सार्थक जो पाये। दो आशीर्वाद कि सच में छू पाऊं। कहीं हाथ ही चरण न छुए, मेरे प्राण भी छू लें।
चरण सरेवां राजस राख लेव शरणाई।
शैष कल ....
औम तत्सत

साफी कर गुरु -ज्ञान की

साफी कर गुरु -ज्ञान की..
चिलम को लपेटने का जो कपड़ा होता है उसको कहते हैं साफी। साफी कर गुरु- ज्ञान की…। और ऐसा क्या कभी एकाध दम मारी, आठों पहर पी! दिल खोलकर पी! पीता ही रह, अहर्निश पी!
इस बात को अंततः फिर दोहरा दूं कि जीवन में जिन्होंने भी सत्य जाना है उन्होंने सदा कहा है : परमात्मा को पाओ, फिर व्यर्थ तो अपने – आप छूट जाता है। और जिन्होंने सत्य नहीं जाना, वे कहते हैं : पहले व्यर्थ को छोड़ो, फिर परमात्मा मिलेगा।
और दूसरी कोटि की जो बात है, मूलत: गलत है। ऐसी ही गलत है जैसे कोई तुमसे कहे : पहले अंधेरे को हटाओ फिर दीया जलेगा। अगर तुम अंधेरे को हटाने में लग गये तो अंधेरा तो हटेगा ही नहीं, दीया तो जलेगा ही क्यों! अंधेरा कोई हटा सकता है?
नहीं; दीया जलाओ, अंधेरा अपने से चला जाता है। ठीक तो नहीं है कहना कि चला जाता है; भाषा की भूल है। क्योंकि अंधेरा था ही नहीं, कहीं जाता – आता नहीं। अंधेरा तो सिर्फ प्रकाश का अभाव है। जैसे ही प्रकाश का भाव होता है, अंधेरा नहीं पाया जाता। कोई अंधेरे को नहीं हटा सकता। कोई पाप को नहीं मिटा सकता। कोई अज्ञान को नहीं जला सकता।
ज्ञान की ज्योति जलाओ! ज्ञान का दिया जलाओ। और ज्ञान के दीये को जलाने का जो उपाय है, वह ध्यान का तुम्हारे भीतर अंतस्तल हो तो उसमें अपने- अपन ज्ञान का दीया जलता है। वह दीया परमात्मा तक पहुंचा देगा।
वह दीया तत्क्षण परमात्मा को प्रगट करवा देगा। वह दीया पर्याप्त है-
औम तत्सत.

ईश्वर है

जीवन एक तो वह है जो हम जानते हैं; वह सरासर स्वम्यवत है। एक और जीवन है लो उन्होंने जाना जो जागे हैं। उस जीवन का नाम ही ईश्वर है।
ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है; वास्तविक जीवन की अनुभूति का नाम है। संसार का कोई अस्तित्व नहीं; सोये हुए आदमी के सपनों की भीड़ है।
ऐसा समझो, संसार है सोये हुए आदमी के कल्पना -जाल का नाम और ईश्वर है जागे मनुष्य की प्रतीति, साक्षात्कार।
जो है वही है। अगर तुम सोये हो तो सपने फैल जायेंगे, सपने छा जायेंगे। जो है, उस पर सपने सवार हो जायेंगे। तुम जागे हो, सपने हट जायेंगे। जो है, जैसा है, वैसा प्रगट हो जायेगा।
नींद क्या है? अहंकार नींद है। मैं भिन्न हूं मैं पृथक हूं मैं अलग हूं मेरा अपना निज का अस्तित्व है-ऐसी प्रतीति निद्रा है। फिर शेष सारे उपद्रव इस प्रतीति से ही खड़े होते हैं। फिर मैं से ममता होती है। फिर मैं से माया होती है। फिर मैं के फैलाव का कोई ओर -छोर नहीं है। जिसे जागना है, उसे मैं को जड़ से काट देना होगा।
मिटने की कला धर्म है। अपने को बिलकुल नेस्तनाबूद कर देने की कला धर्म है। अपने को ऐसे मिटा देन है जैसे बूंद सागर मैं गिर जाती है और खोजाती है; कि बीज भूमि में गिर जाता है और विनष्ट हो जाता है। पर देखना राज, रहस्य, चमत्कार! मरे हुए बीज से उगता है वृक्ष। मृत्यु से अमृत का पौधा निकलता है। बीज में तो कुछ भी न था, वृक्ष मैं बहुत कुछ होगा। रसधार बहेगी। हवाओं में नर्तन होगा। बदलियों से प्रेमालाप होगा। चाद-तारों से गुफ्तगू होगी। सूरज से छेड़ -छाड़ होगी। फूल खिलेंगे। फल लगेंगे। पक्षी आवास करेंगे। थके – पौदे लोगों को छाया मिलेगी।
बीज में तो यह कुछ भी नहीं था। बी तो व्यर्थ था। अगर बीज की कोई सार्थकता थी तो इतनी ही थी की वृक्ष बन जाये। वृक्ष बने तो सार्थक, बीज रह जाये तो व्यर्थ। मनुष्य भी परमात्मा बन जाये तो सार्थक, मनुष्य ही रह जाये तो व्य।
मनुष्य बीज है; उसमें बहुत कुछ होने की संभावना है। मनुष्य पर अपनी इतिश्री न मान लेना, अंत न मान लेना। मनुष्य अंत नहीं, प्रारंभ है। मनुष्य समाप्ति नहीं है; मनुष्य के पार जाना है, अतिक्रमण करना है। अपने से ऊपर उठने की जो आकांक्षा है, वही सत्य की खोज है-
जिसने मनुष्य की यह देह रची है। इस जगत में मनुष्य की देह सबसे बड़ा चमत्कार है। ऐसे तो चमत्कार ही चमत्कार हैं। ऐसे तो वृक्ष ही देह भी कुछ कम चमत्कार नहीं। ऐसे तो आकाश में उड़ते हुए पक्षी की देह भी कुछ कम चमत्कार नहीं। पर मनुष्य बेजोड़ है! उसकी देह में जितने फुल संभव हैं उतने किसी और देह में नहीं। उसके भीतर जितने खजाने भरे हैं, उतने किसी और देह में नहीं। उसमें जितने फल लग सकते हैं, उतने किसी और वृक्ष में नहीं। और वह जितना ऊंचा उड़ सकता है, कोई पक्षी न कभी उड़ा है न उड़ सकेगा। वह जितना गहरा जा सकत है, कोई मछली न कभी गयी है, न जा सकेगी।
मनुष्य अपूर्व है, अद्वितीय है। हिमालय के उत्तुंग शिखर भी उसके चेतना के शिखर के सामने टीले -टाले हैं। चांद-तारों की रोशनी भी उसके भीतर ध्यान से जन्मी हुई रोशनी के सामने फीकी है, अंधेरी है। यह विराट सूरज जो रोज सुबह उगता है और जिससे इस पृथ्वी का सारा जीवन चलता है, यह कुछ भी नहीं, जिन्होंने भीतर आंख खोली है, उन्होंने ऐसे हजार -हजार सूरज एक साथ उगते देखे हैं। उन्होंने उसका जल्वा देखा है। उन्होंने उसकी रोशनी देखी है।
बड़ा सिलावट है परमात्मा, पत्थर में फूल उगा देता है। पत्थर में प्राण डाल देता है। ऐसे तो मनुष्य मिट्टी है।
उर्दू में, अरबी में, हिब्रू में मनुष्य के लिए शब्द है- ‘ आदम’, आदमी। आदम का अर्थ होता है : मिट्टी। क्योंकि परमात्मा ने मिट्टी से आदमी को रचा और फिर उसमें सांस फूंकी। अंग्रेजी में शब्द है : ‘ह्यूमन’। ह्यूमन का अर्थ होता है। मिट्टी, खुमस। ऐसे तो आदमी मिट्टी है। और अगर हम आदमी में तलाश न करें, खोज न करें, मोती न चुगें तो मिट्टी ही रह जाता है। मिट्टी में मिट्टी एक दिन गिर जाती है। कब्र में सब समा जाता है। कुछ बचता नहीं। लेकिन अगर हम खोज करें, अगर हम थोड़ा श्रम उठाएं, अगर हम अपनी ही पहाड़ियों पर चढ़े और अपने ही प्रशांत महासागरों में डुबकी लगाएं, तो बहुत -बहुत मोती हाथ लगते हैं। उन मोतियों में सबसे बड़ा जो मोती है, सबसे बड़ा चमत्कार जो है, वह यह कि पुणय में चिन्मय छिपा हुआ है। मिट्टी में अमृत का आवास है। देह मिट्टी है और उसके भीतर परमात्मा छिपा है। मंदिर मिट्टी है मगर मंदिर का देवता मिटी नहीं है।
पर देवता से तो कितने कम लोगों की पहचान होती है! लोग तो दर्पण में देखकर अपनी पहचान करते हैं। दर्पण में तो तुम्हें जो दिखाई पड़ता है वह मिट्टी की छाया है। दर्पण में तो मिट्टी की ही छाया बन सकती है। तुम्हारी छाया दर्पण में कभी नहीं बन सकती। ऐसा कोई दर्पण नहीं है जिसमें तुम्हारी छाया बन सके। कोई दर्पण तुम्हारी चेतना का प्रतिबिंब नहीं पकड़ सकता। चेतना कोई वस्तु तो नहीं कि उसका प्रतिबिंब जो सके।
और दर्पण से ही हमें अपनी पहचान है। अलग – अलग तरह के दर्पण हमने निर्मित किये हैं। कांच का दर्पण ही अकेला दर्पण नहीं है। दूसरे की आखों में जब तुम झांकते हो और उनसे अपने संबंध में कुछ सूत्र लेते हो, वह दर्पण भी कांच का ही दर्पण है। तुम्हें अपने संबंध में जो पता है वह तुमने दूसरों से इकट्ठा किया है, उनके मंतव्य हैं। किसी ने कहा प्यारे हो, किसी ने कहा सुंदर हो; तुम्हारी छाती फूल गयी। और किसी ने कहा कुरूप हो, और किसी ने कहा गंदे हो; और तुम्हारे प्राण सिकुड़ गये। और किसी ने फूल -मालाएं पहना दीं और किसी ने पत्थर मारे और गालियां दीं…। और इस तरह तुम चारों तरफ से अपने संबंध मैं मंतव्य इकट्ठे कर लेते हो। वे सारे मंतव्य बहुत विरोधाभासी हैं। उनमें मित्रों के मंतव्य हैं, शत्रुओं के मंतव्य हैं, तटस्थों के मंतव्य हैं। इसलिए तुम एक बिगूचन हो। तुमने सब तरह के मंतव्य तो इकट्ठे कर लिए, उनमें कोई तालमेल बिठालना मुश्किल है। कोई कुछ कहता है, कोई कुछ कहता हैं। आज कुछ कहता है, कल कुछ कहता है।
ज्ञानियों ने कहा है : अपनी दशा में कोई स्वयं से साक्षात्कार करता है, मन- मुक्त होकर, मन से शून्य होकर, मन-रिक्त होकर! और तब दिखाई पड़ता है कैसा चमत्कार है, कैसा अदभुत चमत्कार है! भरोसे योग्य नहीं। मिट्टी की इस काया में- अमृत का वास! मिट्टी के इस बर्तन में-अमृत भर दिया! सोने का बर्तन होता, हीरे -जवाहरात जड़ा होता, तो शायद हम सोचते भी कि इसके भीतर अमृत होगा। मिट्टी की इस देह में, जो मिटी से बनी और मिट्टी में गिर जायेगी… और जीवन की परम संपदा भर दी!
शायद यह देह मिट्टी की है, इसलिए हमें स्मरण भी नहीं जाता। सोने की देह होती, तो तुम शायद भीतर टटोलते कि जब देह सोने की है तो भीतर पता नहीं और खजाने पड़े हों। देह तो मिट्टी की है, तो तुम भीतर जाते नहीं और बाहर ही बाहर तलाश करते रहते हो। और बाहर मिलेगा नहीं, क्योंकि जो है वह भीतर है। खूब गहरे में दबाया है। उतनी गहरी खुदाई अपने भीतर करनी होगी। उस खुदाई का नाम ही ध्यान है।
औम तत्सत.

Sunday, May 31, 2015

मुक्ति कैसे होगी

अष्टावक्र ......
शैष भाग.....
कथं ज्ञानम्?
कैसे होगा ज्ञान? कथं मुक्ति? मुक्ति कैसे होगी?’
क्योंकि जिसको तुम ज्ञान कहते हो, वह तो बांध लेता उलटे, मुक्त कहां करता? ज्ञान तो वही है जो मुक्त करे। जीसस ने कहा है, सत्य वही है जो मुक्त करे। ज्ञान तो वही है जो मुक्त करे—यह ज्ञान की कसौटी है। पंडित मुक्त तो दिखाई नहीं पड़ता, बंधा दिखाई पड़ता है। मुक्ति की बातें करता है, मुक्त दिखाई नहीं पड़ता; हजार बंधनों में बंधा हुआ मालूम पड़ता है।
तुमने कभी गौर किया, तुम्हारे तथाकथित संत तुमसे भी ज्यादा बंधे हुए मालूम पड़ते हैं! तुम शायद थोड़े—बहुत मुक्त भी हो, तुम्हारे संत तुमसे भी ज्यादा बंधे हैं। लकीर के फकीर हैं, न उठ सकते स्वतंत्रता से, न बैठ सकते स्वतंत्रता से, न जी सकते स्वतंत्रता से।
कुछ दिनों पहले कुछ साध्वियों की मेरे पास खबर आई कि वे मिलना चाहती हैं, मगर श्रावक आने नहीं देते। यह भी बड़े मजे की बात हुई! साधु का अर्थ होता है, जिसने फिक्र छोड़ी समाज की; जो चल पड़ा अरण्य की यात्रा पर; जिसने कहा, अब न तुम्हारे आदर की मुझे जरूरत है न सम्मान की। लेकिन साधु—साध्वी कहते हैं, ‘श्रावक आने नहीं देते! वे कहते हैं, वहां भूल कर मत जाना। वहां गये तो यह दरवाजा बंद!’ यह कोई साधुता हुई? यह तो परतंत्रता हुई, गुलामी हुई। यह तो बड़ी उलटी बात हुई। यह तो ऐसा हुआ कि साधु श्रावक को बदले, उसकी जगह श्रावक साधु को बदल रहा है। एक मित्र ने आ कर मुझे कहा कि एक साध्वी आपका लिखा पढ़ती है, लेकिन लेकिन चोरी से। और अगर कभी किसी के सामने आपका नाम भी ले दो तो वह इस तरह हो जाती है जैसे उसने कभी आपका नाम सुना ही नहीं।
यह मुक्ति हुई?
जनक ने पूछा, ‘कथं मुक्ति?
कैसे होती मुक्ति? क्या है मुक्ति? उस ज्ञान को मुझे समझायें, जो मुक्त कर देता है।’
स्वतंत्रता मनुष्य की सबसे महत्वपूर्ण आकांक्षा है। सब पा लो, लेकिन गुलामी अगर रही तो छिदती है। सब मिल जाये, स्वतंत्रता न मिले तो कुछ भी नहीं मिला। मनुष्य चाहता है खुला आकाश। कोई सीमा न हो! वह मनुष्य की अंतरतम, निगढ़तम आकांक्षा है, जहां कोई सीमा न हो, कोई बाधा न हो। इसी को परमात्मा होने की आकांक्षा कहो, मोक्ष की आकांक्षा कहो।
हमने ठीक शब्द चुना है ‘मोक्ष'; दुनिया की किसी भाषा में ऐसा प्यारा शब्द नहीं है। स्वर्ग, फिरदौस—इस तरह के शब्द हैं, लेकिन उन शब्दों में मोक्ष की कोई धुन नहीं है। मोक्ष का संगीत ही अनूठा है। उसका अर्थ ही केवल इतना है : ऐसी परम स्वतंत्रता जिस पर कोई बाधा नहीं है; स्वतंत्रता इतनी शुद्ध कि जिस पर कोई सीमा नहीं है।
पूछा जनक ने, ‘कैसे होगी मुक्ति और कैसे होगा वैराग्य? हे प्रभु, मुझे समझा कर कहिए!’ अष्टावक्र ने गौर से देखा होगा जनक की तरफ; क्योंकि गुरु के लिए वही पहला काम है कि जब कोई जिज्ञासा करे तो वह गौर से देखे. ‘जिज्ञासा किस स्रोत से आती है? पूछने वाले ने क्यों पूछा है?’ उत्तर तो तभी सार्थक हो सकता है जब प्रश्न क्यों किया गया है, वह समझ में आ जाये, वह साफ हो जाए।
ध्यान रखना, सदज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति, सदगुरु तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं देता—तुम्हें उत्तर देता है! तुम क्या पूछते हो, इसकी फिक्र कम है; तुमने क्यों पूछा है, तुम्हारे पूछने के पीछे अंतरचेतन में छिपा हुआ जाल क्या है, तुम्हारे प्रश्नों की आड़ में वस्तुत: कौन—सी आकांक्षा छिपी है..!
दुनिया में चार तरह के लोग हैं—ज्ञानी, मुमुक्षु, अज्ञानी, मूढ़। और दुनिया में चार ही तरह की जिज्ञासाए होती हैं। ज्ञानी की जिज्ञासा तो नि:शब्द होती है। कहना चाहिए, ज्ञानी की जिज्ञासा तो जिज्ञासा होती ही नहीं—जान लिया, जानने को कुछ बचा नहीं, पहुंच गये, चित्त निर्मल हुआ, शांत हुआ, घर लौट आये, विश्राम में आ गये! तो ज्ञानी की जिज्ञासा तो जिज्ञासा जैसी होती ही नहीं। इसका यह अर्थ नहीं कि ज्ञानी सीखने को तैयार नहीं होता। ज्ञानी तो सरल, छोटे बच्चे की भांति हो जाता है—सदा तत्पर सीखने को।
जितना ज्यादा तुम सीख लेते हो, उतनी ही सीखने की तत्परता बढ़ जाती है। जितने तुम सरल और निष्कपट होते चले जाते हो, उतने ही सीखने के लिए तुम खुल जाते हो। आयें हवाएं, तुम्हारे द्वार खुले पाती हैं। आये सूरज, तुम्हारे द्वार पर दस्तक नहीं देनी पड़ती। आये परमात्मा, तुम्हें सदा तत्पर पाता है।
ज्ञान—ज्ञान को संगृहीत नहीं करता; ज्ञानी सिर्फ ज्ञान की क्षमता को उपलब्ध होता है। इस बात को ठीक से समझ लेना, क्योंकि पीछे यह काम पड़ेगी। ज्ञानी का केवल इतना ही अर्थ है कि जो जानने के लिए बिलकुल खुला है; जिसका कोई पक्षपात नहीं, जानने के लिए जिसके पास कोई परदा नहीं; जिसके पास जानने के लिए कोई पूर्व—नियोजित योजना, ढांचा नहीं। ज्ञानी का अर्थ है ध्यानी जो ध्‍यान पूर्ण है।
तो देखा होगा अष्‍टावक्र ने गौर से, जनक में झांक कर : यह व्यक्ति ज्ञानी तो नहीं है। यह ध्यान को तो उपलब्ध नहीं हुआ है। अन्यथा इसकी जिज्ञासा मौन होती; उसमें शब्द न होते।
बुद्ध के जीवन में उल्लेख है—एक फकीर मिलने आया। एक साधु मिलने आया। एक परिव्राजक घुमक्कड़। उसने आकर बुद्ध से कहा : ‘पूछने योग्य शब्द मेरे पास नहीं। क्या पूछना चाहता हूं उसे शब्‍दों में। बांधने की मेरे पास कोई कुशलता नहीं। आप तो जानते ही हैं, समझ लें। जो मेरे योग्य हो, कह दें।‘
यह ज्ञानी की जिज्ञासा है।
बुद्ध चुप बैठे रहे, उन्होंने कुछ भी न कहा। घड़ी भर बाद, जैसे कुछ घटा! वह जो आदमी चुपचाप बैठा बुद्ध की तरफ देखता रहा था, उसकी आंख से आंसुओ की धार लग गई, चरणों में झुका नमस्कार किया और कहा, ‘धन्यवाद! खूब धन्यभागी हूं! जो लेने आया था, आपने दिया।’वह उठकर चला भी गया। उसके चेहरे पर अपूर्व आभा थी। वह नाचता हुआ गया।
बुद्ध के आसपास के शिष्य बड़े हैरान हुए। आनंद ने पूछा. ‘भंते! भगवान! पहेली हो गई। पहले तो यह आदमी कहता है कि मुझे पता नहीं कैसे पूछ— पता नहीं किन शब्दों में पूछ— यह भी पता नहीं क्या पूछने आया हूर फिर आप तो जानते ही हैं सब; देख लें मुझे; जो मेरे लिए जरूरी हो, कह दें। पहले तो यह आदमी ही जरा पहेली था.. यह कोई ढंग हुआ पूछने का! और जब तुम्हें यही पता नहीं कि क्या पूछना है तो पूछना ही क्यों? पूछना क्या? खूब रही! फिर यहीं बात खत्म न हुई; आप चुप बैठे सो चुप बैठे रहे! आपको ऐसा कभी मौन देखा नहीं; कोई पूछता है तो आप उत्तर देते हैं। कभी—कभी तो ऐसा होता है कि कोई नहीं भी पूछता तो भी आप उत्तर देते हैं। आपकी करुणा सदा बहती रहती है। क्या हुआ अचानक कि आप चुप रह गये और आंख बंद हो गई? और फिर क्या रहस्यमय घटा कि वह आदमी रूपांतरित होने लगा। हमने उसे बदलते देखा। हमने उसे किसी और ही रंग में डूबते देखा। उसमें मस्ती आते देखी। वह नाचते हुए गया है—आंसुओ से भरा हुआ, गदगद, आह्लादित! वह चरणों में झुका। उसकी सुगंध हमें भी छुई। यह हुआ क्या? आप कुछ बोले नहीं, उसने सुना कैसे? और हम तो इतने दिनों से, वर्षों से आपके पास हैं, हम पर आपकी कृपा कम है क्या? यह प्रसाद, जो उसे दिया, हमें क्यों नहीं मिलता?’
लेकिन ध्यान रहे, उतना ही मिलता है जितना तुम ले सकते हो।
बुद्ध ने कहा, ‘सुनो। घोड़े..।’आनंद से घोड़े की बात की, क्योंकि आनंद क्षत्रिय था, बुद्ध का चचेरा भाई था और बचपन से ही घोड़े का बड़ा शौक था उसे, घुड़सवार था। प्रसिद्ध घुड़सवार था, प्रतियोगी था बड़ा! उन्होंने कहा, ‘सुन आनंद!’ बुद्ध ने कहा : ‘घोड़े चार प्रकार के होते हैं। एक तो मारो भी तो भी टस से मस नहीं होते। रही से रही घोड़े! जितना मारो उतना ही हठयोगी हो जाते हैं, बिलकुल हठ बांध कर खड़े हो जाते हैं। तुम मारो तो वे जिद्द बना लेते हैं कि देखें कौन जीतता है! फिर दूसरे तरह के घोड़े होते हैं. मारो तो चलते हैं, न मारो तो नहीं चलते। कम से कम पहले से बेहतर। फिर तीसरे तरह के घोड़े होते हैं : कोड़ा फटकासे, मारना जरूरी नहीं। सिर्फ कोड़ा फटकारो, आवाज काफी है। और भी कुलीन होते हैं—दूसरे से भी बेहतर। फिर आनंद, तुझे जरूर पता होगा ऐसे भी घोड़े होते हैं कि कोड़े की छाया देख कर भागते हैं, फटकारना भी नहीं पड़ता। यह ऐसा ही घोड़ा था। छाया काफी है।’
अष्टावक्र ने देखा होगा गौर से।
जब तुम आ कर मुझसे कुछ पूछते हो तो तुम्हारे प्रश्न से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल तुम हो। कभी—कभी तुम्हें भी ऐसा लगता होगा कि तुमने जो नहीं पूछा था, वह मैंने उत्तर दिया है। और कभी—कभी तुम्हें ऐसा भी लगता होगा कि शायद मैं टाल गया तुम्हारे प्रश्न को, बचाव कर गया, कुछ और उत्तर दे गया हूं। लेकिन सदा तुम्हारी भीतरी जरूरत ज्यादा महत्वपूर्ण है; तुम क्या पूछते हो, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं। क्योंकि तुम्हें खुद ही ठीक पता नहीं, तुम क्या पूछते हो, क्यों पूछते हो। उत्तर वही दिया जाता है, जिसकी तुम्हें जरूरत है। तुम्हारे पूछने से कुछ तय नहीं होता।
देखा होगा अष्टावक्र ने. ज्ञानी तो नहीं है जनक। अज्ञानी है फिर क्या? अज्ञानी भी नहीं है। क्योंकि अज्ञानी तो अकड़ीला, अकड़ से भरा होता है। अज्ञानी तो झुकना जानता ही नहीं। यह तो मुझे बारह साल की उम्र के लड़के के पैरों में झुक गया, साष्टांग दंडवत की। यह अज्ञानी के लिए असंभव है। अज्ञानी तो समझता है कि मैं जानता ही हूं मुझे कौन समझायेगा! अज्ञानी अगर कभी पूछता भी है तो तुम्हें गलत सिद्ध करने को पूछता है। क्योंकि अज्ञानी तो यह मान कर ही चलता है कि पता तो मुझे है ही; देखें इनको भी पता है या नहीं! अज्ञानी परीक्षा के लिए पूछता है। नहीं, इसकी आंखें, जनक की तो बड़ी निर्मल हैं। मुझ बारह साल के अनजान—अपरिचित लड़के को सम्राट होते हुए भी इसने कहा, ‘एतत मम बूहि प्रभो! हे प्रभु, मुझे समझा कर कहें!’ नहीं, यह विनयशील है, अज्ञानी तो नहीं है। मूढ़ है क्या फिर? मूढ़ तो पूछते ही नहीं। मूढ़ों को तो पता ही नहीं है कि जीवन में कोई समस्या है।
मूढ़ और बुद्धपुरुषों में एक समानता है। बुद्धपुरुषों के लिए कोई समस्या नहीं रही, मूढ़ों के लिए अभी समस्या उठी ही नहीं। बुद्धपुरुष समस्या के पार हो गये : मूढ़ अभी समस्या के बाहर हैं। मूढ़ तो इतना मूर्च्‍छित है कि उसे कहां सवाल? ‘कथं ज्ञानम्’—मूढ़ पूछेगा? ‘कथं मुक्ति’—मूढ़ पूछेगा? ‘कैसे होगा वैराग्य’—मूढ़ पूछेगा? असंभव!
मूढ़ अगर पूछेगा भी तो पूछता है, राग में सफलता कैसे मिलेगी? मूढ़ अगर पूछता भी है तो पूछता है, संसार में और थोड़े ज्यादा दिन कैसे रहना हो जाये? मुक्ति..! नहीं, मूढ़ पूछता है बंधन सोने के कैसे बनें? बंधन में हीरे—जवाहरात कैसे जड़ें? मूढ़ पूछता भी है तो ऐसी बातें पूछता है। ज्ञान! मूढ़ तो मानता ही नहीं कि ज्ञान हो सकता है। वह तो संभावना को ही स्वीकार नहीं करता। वह तो कहता है, कैसा ज्ञान? मूढ़ तो पशुवत जीता है।
नहीं, यह जनक मूढ़ भी नहीं है—मुमुक्षु है।
मुमुक्षु’ शब्द समझना जरूरी है। मोक्ष की आकांक्षा—मुमुक्षा! अभी मोक्ष के पास नहीं पहुंचा, ज्ञानी नहीं है; मोक्ष के प्रति पीठ करके नहीं खड़ा, मूढ़ नहीं है; मोक्ष के संबंध में कोई धारणाएं पकड़ कर नहीं बैठा, आज्ञानी भी नहीं है—मुमुक्षु है। मुमुक्षु का अर्थ है, सरल है इसकी जिज्ञासा; न मूढ़ता से अपवित्र हो रही है, न अज्ञानपूर्ण धारणाओं से विकृत हो रही है। शुद्ध है इसकी जिज्ञासा। सरल चित्त से पूछा है।
अष्टावक्र ने कहा, ‘हे प्रिय, यदि तू मुक्ति को चाहता है तो विषयों को विष के समान छोड़ दे और क्षमा, आर्जव, दया, संतोष और सत्य को अमृत के समान सेवन कर।’
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्यज।
शब्द ‘विषय’ बड़ा बहुमूल्य है—वह विष से ही बना है। विष का अर्थ होता है, जिसे खाने से आदमी मर जाये। विषय का अर्थ होता है, जिसे खाने से हम बार—बार मरते हैं। बार—बार भोग, बार—बार भोजन, बार—बार महत्वाकांक्षा, ईर्ष्या, क्रोध, जलन—बार—बार इन्हीं को खा—खा कर तो हम मरे हैं! बार—बार इन्हीं के कारण तो मरे हैं! अब तक हमने जीवन में जीवन कहा जाना, मरने को ही जाना है। अब तक हमारा जीवन जीवन की प्रज्वलित ज्योति कहां, मृत्यु का ही धुआ है। जन्म से ले कर मृत्यु तक हम मरते ही तो हैं धीरे—धीरे, जीते कहां? रोज—रोज मरते हैं! जिसको हम जीवन कहते हैं, वह एक सतत मरने की प्रक्रिया है। अभी हमें जीवन का तो पता ही नहीं, तो हम जीयेगे कैसे? यह शरीर तो रोज क्षीण होता चला जाता है। यह बल तो रोज खोता चला जाता है। ये भोग और विषय तो रोज हमें चूसते चले जाते हैं, जराजीर्ण करते चले जाते हैं। ये विषय और कामनाएं तो छेदों की तरह हैं; इनसे हमारी ऊर्जा और आत्मा रोज बहती चली जाती है। आखिर में घड़ा खाली हो जाता है, उसको हम मृत्यु कहते हैं।
तुमने कभी देखा, अगर छिद्र वाले घड़े को कुएं में डालो तो जब तक घड़ा पानी में डूबा होता है, भरा मालूम पड़ता है; उठाओ, पानी के ऊपर खींचो रस्सी, बस खाली होना शुरू हुआ! जोर का शोरगुल होता है। उसी को तुम जीवन कहते हो? जलधारें गिरने लगती हैं, उसी को तुम जीवन कहते हो? और घड़ा जैसे—जैसे पास आता हाथ के, खाली होता चला जाता है। जब हाथ में आता है, तो खाली घड़ा! जल की एक बूंद भी नहीं! ऐसा ही हमारा जीवन है
शैष भाग आगे जारी.........
शुभ प्रभात्म मित्रौं
औम तत्सत.

अष्टावक्र ........... शैष भाग

अष्टावक्र ...........
शैष भाग.........
बच्चा पैदा नहीं हुआ, भरा मालूम होता है; पैदा हुआ कि खाली होना शुरू हुआ। जन्म का पहला दिन मृत्यु का पहला दिन है। खाली होने लगा। एक दिन मरा, दो दिन मरा, तीन दिन मरा! जिनको तुम ‘जन्म—दिन’ कहते हो, अच्छा हो, ‘मृत्यु—दिन’ कहो तो ज्यादा सत्यतर होगा .। एक साल मर जाते हो, उसको कहते हो, चलो एक जन्म—दिन आ गया! पचास साल मर गये, कहते हो, ‘पचास साल जी लिये, स्वर्ण—जयंती मनाएं!’ पचास साल मरे। मौत करीब आ रही है, जीवन दूर जा रहा है। घड़ा खाली हो रहा है! जो दूर जा रहा है, उसके आधार पर तुम जीवन को सोचते हो या जो पास आ रहा है उसके आधार पर? यह कैसा उलटा गणित! हम रोज मर रहे हैं। मौत करीब सरकती आती है।
अष्टावक्र कहते हैं. विषय हैं विषवत, क्योंकि उन्हें खा—खा कर हम सिर्फ मरते हैं; उनसे कभी जीवन तो मिलता नहीं।
‘यदि तू मुक्ति चाहता है, हे तात, हे प्रिय, तो विषयों को विष के समान छोड़ दे, और क्षमा, आर्जव, दया, संतोष और सत्य को अमृत के समान सेवन कर।’
अमृत का अर्थ होता है, जिससे जीवन मिले, जिससे अमरत्व मिले; जिससे उसका पता चले जो फिर कभी नहीं मरेगा।
तो क्षमा!
क्रोध विष है; क्षमा अमृत है।
आर्जव!
कुटिलता विष है; सीधा—सरलपन, आर्जव अमृत है।
दया!
कठोरता, क्रूरता विष है; दया, करुणा अमृत है।
संतोष।
असंतोष, का कीड़ा खाए चला जाता है। असंतोष का कीड़ा हृदय में कैंसर की तरह है; फैलता चला जाता है; विष को फैलाए चले जाता है।
संतोष—जो है उससे तृप्ति; जो नहीं है उसकी आकांक्षा नहीं। जो है वह काफी से ज्यादा है। वह है ही काफी से ज्यादा। आंख खोलो, जरा देखो!
संतोष कोई थोपना नहीं है ऊपर जीवन के। जरा गौर से देखो, तुम्हें जो मिला है वह तुम्हारी जरूरत से सदा ज्यादा है! तुम्हें जो चाहिए वह मिलता ही रहा है। तुमने जो चाहा है, वह सदा मिल गया है। तुमने दुख चाहा है तो दुख मिल गया है। तुमने सुख चाहा है तो सुख मिल गया है। तुमने गलत चाहा तो गलत मिल गया है। तुम्हारी चाह ने तुम्हारे जीवन को रचा है। चाह बीज है, फिर जीवन उसकी फसल है। जन्मों—जन्मों में जो तुम चाहते रहे हो वही तुम्हें मिलता रहा है। कई बार तुम सोचते हो हम कुछ और चाह रहे हैं, जब मिलता है तो कुछ और मिलता है—तो तुम्हारे चाहने में भूल नहीं हुई है सिर्फ तुमने चाहने के लिए गलत शब्द चुन लिया था। जैसे—तुम चाहते हो सफलता, मिलती है विफलता। तुम कहते हो, विफलता मिल रही है, चाही तो सफलता थी।.
लेकिन जिसने सफलता चाही उसने विफलता को स्वीकार कर ही लिया; वह विफलता से भीतर डर ही गया है। विफलता के कारण ही तो सफलता चाह रहा है। और जब—जब सफलता चाहेगा तब—तब विफलता का खयाल आयेगा। विफलता का खयाल भी मजबूत होता चला जायेगा। सफलता तो कभी मिलेगी; लेकिन रास्ते पर यात्रा तो विफलता—विफलता में ही बीतेगी। विफलता का भाव संगृहीभूत होगा। वह इतना संगृहीभूत हो जायेगा कि वही एक दिन प्रगट हो जायेगा। तब तुम कहते हो कि हमने तो सफलता चाही थी। लेकिन सफलता के चाहने में तुमने विफलता को चाह लिया।
सफलता चाही, विफलता मिलेगी। अगर सचमुच सफलता चाहिए हो, सफलता चाहना ही मत; फिर तुम्हें कोई विफल नहीं कर सकता।
तुम कहते हो : हमने सम्मान चाहा था, अपमान मिल रहा है। सम्मान चाहता ही वही व्यक्ति है, जिसका अपने प्रति कोई सम्मान नहीं। वही तो दूसरों से सम्मान चाहता है। अपने प्रति जिसका अपमान है वही तो दूसरों से अपने अपमान को भर लेना चाहता है, ढांक लेना चाहता है। सम्मान की आकांक्षा इस बात की खबर है कि तुम अपने भीतर अपमानित अनुभव कर रहे हो; तुम्हें अनुभव हो रहा है कि मैं कुछ भी नहीं हूं दूसरे मुझे कुछ बना दें, सिंहासन पर बिठा दें, पताकाएं फहरा दें, झंडे उठा लें मेरे नाम के—दूसरे कुछ कर दें!
तुम भिखमंगे हो! तुमने अपना अपमान तो खुद कर लिया जब तुमने सम्मान चाहा। और यह अपमान गहन होता जायेगा।
मेरा कोई अपमान नहीं कर सकता, क्योंकि मैं सम्मान चाहता ही नहीं। यह सम्मान को पा लेना है। लाओत्सु कहता है, मुझे कोई हरा नहीं सकता, क्योंकि जीत की हमने बात ही छोड़ दी। अब हराओगे कैसे! तुम उसी को हरा सकते हो जो जीतना चाहता है अब यह जरा उलझा हुआ हिसाब है।
इस दुनिया में सम्मान उन्हें मिलता है जिन्होंने सम्मान नहीं चाहा। सफलता उन्हें मिलती है जिन्होंने सफलता नहीं चाही। क्योंकि जिन्होंने सफलता नहीं चाही उन्होंने तो स्वीकार ही कर लिया कि सफल तो हम हैं ही, अब और चाहना क्या है? सम्मान तो हमारे भीतर आत्मा का है ही; अब और चाहना क्या है? परमात्मा ने सम्मान दे दिया तुम्हें पैदा करके; अब और किसका सम्मान चाहते हो? परमात्मा ने तुम्हें काफी गौरव दे दिया! जीवन दिया! यह सौभाग्य दिया कि आंख खोलो, देखो हरे वृक्षों को, फूलों को, पक्षियों को! कान दिए—सुनो संगीत को, जलप्रपात के मरमर को! बोध दिया कि बुद्ध हो सको! अब और क्या चाहते हो? सम्मानित तो तुम हो गये! परमात्मा ने तुम्हें प्रमाण—पत्र दिया। तुम भिखारी की तरह किनसे प्रमाण—पत्र मांग रहे हो? उनसे, जो तुमसे प्रमाण—पत्र मांग रहे हैं?
यह बड़ा मजेदार मामला है : दो भिखारी एक—दूसरे के सामने खड़े भीख मांग रहे हैं! यह भीख मिलेगी कैसे? दोनों भिखारी हैं। तुम किससे सम्मान मांग, रहे हो? किसके सामने खड़े हो? यह अपमान कर रहे हो तुम अपना। और यही अपमान गहन होता जायेगा।
संतोष का अर्थ होता है : देखो, जो तुम्हारे पास है। देखो जरा आंख खोल कर, जो तुम्हें मिला ही है। यह अष्टावक्र की बड़ी बहुमूल्य कुंजी है। यह धीरे—धीरे तुम्हें साफ होगी। अष्टावक्र की दृष्टि बड़ी क्रांतिकारी है, बड़ी अनूठी है, जड़—मूल से क्रांति की है।
‘संतोष और सत्य को अमृत के समान सेवन कर।’
क्योंकि असत्य के साथ जो जीयेगा वह असत्य होता चला जायेगा। जो असत्य को बोलेगा, असत्य को जीयेगा, स्वभावत: असत्य से घिरता चला जायेगा। उसके जीवन से संबंध विच्छिन्न हो जाएंगे, जड़ें टूट जाएंगी।
परमात्मा में जड़ें चाहते हो तो सत्य के द्वारा ही वे जड़ें हो सकती हैं। प्रामाणिकता और सत्य के द्वारा ही तुम परमात्मा से जुड़ सकते हो। परमात्मा से टूटना है तो असत्य का धुआ पैदा करो, असत्य के बादल अपने पास बनाओ। जितने तुम असत्य होते चले जाओगे उतने परमात्मा से दूर होते चले जाओगे।
‘तू न पृथ्वी है, न जल है, न वायु है, न आकाश है। मुक्ति के लिए आत्मा को, अपने को इन सबका साक्षी चैतन्य जान।’
सीधी—सीधी बातें हैं; भूमिका भी नहीं है। अभी दो वचन नहीं बोले अष्टावक्र ने कि ध्यान आ गया, कि समाधि की बात आ गई। जानने वाले के पास समाधि के अतिरिक्त और कुछ जताने को है भी नहीं। वह दो वचन भी बोले, क्योंकि एकदम से अगर समाधि की बात होगी तो शायद तुम चौंक ही जाओगे, समझ ही न पाओगे। मगर दो वचन—और सीधी समाधि की बात आ गई!
अष्टावक्र सात कदम भी नहीं चलते; बुद्ध तो सात कदम चले, आठवें कदम पर समाधि है। अष्टावक्र तो पहला कदम ही समाधि का उठाते हैं।
‘तू न पृथ्वी है, न जल, न वायु, न आकाश’—ऐसी प्रतीति में अपने को थिर कर।’मुक्ति के लिए आत्मा को, अपने को इन सबका साक्षी चैतन्य जान।’
‘साक्षी’ सूत्र है। इससे महत्वपूर्ण सूत्र और कोई भी नहीं। देखने वाले बनो! जो हो रहा है उसे होने दो; उसमें बाधा डालने की जरूरत नहीं। यह देह तो जल है, मिट्टी है, अग्नि है, आकाश है। तुम इसके भीतर तो वह दीये हो जिसमें ये सब जल, अग्नि, मिट्टी, आकाश, वायु प्रकाशित हो रहे हैं। तुम द्रष्टा हो। इस बात को गहन करो।
साक्षिणां चिद्धूपं आत्मानं विदि…….
यह इस जगत में सर्वाधिक बहुमूल्य सूत्र है। साक्षी बनो! इसी से होगा शान! इसी से होगा वैराग्य! इसी से होगी मुक्ति!
प्रश्न तीन थे, उत्तर एक है।
‘यदि तू देह को अपने से अलग कर और चैतन्य में विश्राम कर स्थित है तो तू अभी ही सुखी, शात और बंध—मुक्त हो जायेगा।’
इसलिए मैं कहता हूं यह जड़—मूल से क्रांति है। पतंजलि इतनी हिम्मत से नहीं कहते कि ‘अभी ही।’ पतंजलि कहते हैं, ‘करो अभ्यास—यम, नियम; साधो—प्राणायाम, प्रत्याहार, आसन; शुद्ध करो। जन्म—जन्म लगेंगे, तब सिद्धि है।’
महावीर कहते हैं, ‘पंच महाव्रत! और तब जन्म—जन्म लगेंगे, तब होगी निर्जरा; तब कटेगा जाल कर्मों का।’
सुनो अष्टावक्र को
यदि देह पृथस्कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि।
अधुनैव सुखी शांत: बंधमुक्तो भविष्यसि।।
‘अधुनैव!’ अभी, यहीं, इसी क्षण! ‘यदि तू देह को अपने से अलग कर और चैतन्य में विश्राम कर स्थित है…!’ अगर तूने एक बात देखनी शुरू कर दी कि यह देह मैं नहीं हूं; मैं कर्ता और भोक्ता नहीं हूं; यह जो देखने वाला मेरे भीतर छिपा है जो सब देखता है—बचपन था कभी तो बचपन देखा, फिर जवानी आयी तो जवानी देखी, फिर बुढ़ापा आया तो बुढ़ापा देखा; बचपन नहीं रहा तो मैं बचपन तो नहीं हो सकता—आया और गया, मैं तो हूं! जवानी नहीं रही तो मैं जवानी तो नहीं हो सकता— आई और गई; मैं तो हूं! बुढ़ापा आया, जा रहा है, तो मैं बुढ़ापा नहीं हो सकता। क्योंकि जो आता है जाता है, वह मैं कैसे हो सकता हूं! मैं तो सदा हूं। जिस पर बचपन आया, जिस पर जवानी आई, जिस पर बुढ़ापा आया, जिस पर हजार चीजें आईं और गईं—मैं वही शाश्वत हूं।
स्टेशनों की तरह बदलती रहती है बचपन, जवानी, बुढ़ापा, जन्म—यात्री चलता जाता। तुम स्टेशन के साथ अपने को एक तो नहीं समझ लेते! की स्टेशन पर तुम ऐसा तो नहीं समझ लेते कि मैं भुज हूं! फिर पहुंचे मनमाड तो ऐसा तो नहीं समझ लेते कि मैं मनमाड हूं! तुम जानते हो कि भुज आया, गया; मनमाड आया, गया—तुम तो यात्री हो! तुम तो द्रष्टा हों—जिसने भुज देखा, भुज आया; जिसने मनमाड़ देखा, मनमाड आया! तुम तो देखने वाले हो!
तो पहली बात : जो हो रहा है उसमें से देखने वाले को अलग कर लो!
‘देह को अपने से अलग कर और चैतन्य में विश्राम..।’
और करने योग्य कुछ भी नहीं है। जैसे लाओत्सु का सूत्र है—समर्पण, वैसे अष्टावक्र का सूत्र है—विश्राम, रेस्ट। करने को कुछ भी नहीं है।
मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, ध्यान कैसे करें? वे प्रश्न ही गलत पूछ रहे हैं। गलत पूछते हैं तो मैं उनको कहता हूं करो। अब क्या करोगे! तो उनको बता देता हूं कि करो, कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा—अभी तुम्हें करने कीं खुजलाहट है तो उसे तो पूरा करना होगा। खुजली है तो क्या करोगे! बिना खुजाए नहीं बनता। लेकिन धीरे—धीरे उनको करवा—करवा कर थका डालता हूं। फिर वे कहते हैं कि अब इससे छुटकारा दिलवाओ! अब कब तक यह करते रहें? मैं कहता हूं मैं तो पहले ही राजी था, लेकिन तुम्हें समझने में जरा देर लगी। अब विश्राम करो!
ध्यान का आत्यंतिक अर्थ विश्राम है......
शैष आगे जारी...........
औम तत्सत.

रूद्रयामल तंत्र.

रूद्रयामल तंत्र..........
शिवजी ने कहा भी है – ‘‘हे प्राणवल्लभे। अवैष्णव, नास्तिक, गुरु सेवा रहित, अनर्थकारी, क्रोधी आदि ऐसे अनाधिकारी को मंत्र अथवा नाम जप की महिमा अथवा विधि कभी न दें। कुमार्गगामी अपने पुत्र तक को यह विद्या न दें। तन-मन और धन से गुरु सुश्रुषा करने वालों को यह विधि दें।’’
किसी भी देवी-देवता का सतत् नाम जप यदि लयबद्धता से किया जाए तो वह अपने में स्वयं ही एक सिद्ध मंत्र बन जाता है। जप की शास्त्रोक्त विधि तो बहुत ही क्लिष्ट है। किसी नाम अथवा मंत्र से इक्षित फल की प्राप्ति के लिए उसमें पुरुश्चरण करने का विधान है। पुरुश्चरण क्रिया युक्त मंत्र शीघ्र फलप्रद होता है। मंत्रादि की पुरुश्चरण क्रिया कर लेने पर कोई भी सिद्धी अपने आराध्य मंत्र के द्वारा सरलता से प्राप्त की जा सकती है। पुरुश्चरण के दो चरण हैं। किसी कार्य की सिद्धी के लिए पहले से ही उपाय सोचना, तदनुसार अनुष्ठान करना तथा किसी मंत्र, नाम जप, स्तोत्र आदि को अभीष्ट कार्य की सिद्धि के लिए नियमपूर्वक सतत् जपना इष्ट सिद्धि की कामना से सर्वप्रथम मंत्र, नामादि का पुरश्चरण कर लें। अर्थात मंत्र में जितने अक्षर हैं उतने लाख जप करें। मंत्र का दशांश अर्थात दसवां भाग हवन करें। हवन के लिए मंत्र के अंत में ‘स्वाहा’ बोलें। हवन का दशांश तर्पण करें। अर्थात मंत्र के अंत में ‘तर्पयामी’ बोलें। तर्पण का दशांश मार्जन करें अर्थात मंत्र के अंत में ‘मार्जयामि’ अथवा ‘अभिसिन्चयामी’ बोलें। मार्जन का दशांश साधु ब्राह्मण आदि को श्रद्धा भाव से भोजन कराएं, दक्षिणादि से उनको प्रसन्न करके उनका आशीर्वाद लें। इस प्रकार पुरुश्चरण से मंत्र साधक का कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता।
अपने-अपने बुद्धि-विवेक अथवा संत और गुरु कृपा से आराध्य देव का मंत्र, नाम, स्तोत्रादि चुनकर आप भी उसे सतत् जपकर जीवन को सार्थक बना सकते हैं। लम्बी प्रक्रिया में न जाना चाहें तो अपने आराध्य देव के शत, कोटि अथवा लक्ष नाम जप ही आपके लिए प्रभावशाली मंत्र सिद्ध हो सकते हैं। भौतिक इक्षाओं की पूर्ति के लिए आप सरल सा उपाय भी कर सकते हैं। बौद्धिक पाठक गण यदि मंत्र सार, मंत्र चयन आदि की विस्तृत प्रक्रिया में भी जाना चाहते हैं तो वह पुस्तक ‘मंत्र जप के रहस्य’ से लाभ उठा सकते हैं।
प्रस्तुत प्रयोग पूरे 100 दिन का है अर्थात इसे सौ दिनों में पूरा करना है। बीच में यदि कोई दिन छूट जाए तो उसके स्थान पर उसी क्रम में दिनों की संख्या आप आगे भी बढ़ा सकते हैं। जिस प्रयोजन के लिए नाम, मंत्रादि, जप प्रारम्भ कर रहे हैं उसके अनुरुप बैठने का एक स्थान सुनिश्चित कर लें :
प्रयोजन स्थान
सर्व कार्य सिद्धि अगस्त्य अथवा पीपल के नीचे
लक्ष्मी कृपा कैथ अथवा बेल वृक्ष के नीचे
संतान सुख आम, मालती अथवा अलसी वृक्ष के नीचे
भूमि-भवन जामुन वृक्ष के नीचे
धन-धान्य बरगद अथवा कदम्ब वृक्ष के नीचे
पारिवारिक सुख विवाह आदि किसी नदी का तट
आरोग्य अथवा आयुष्य शिव मन्दिर
सर्वकामना सिद्धि देवालय अथवा पवित्र नदी का तट

प्रयोग काल में शब्द, नाम अथवा मंत्रादि आपको अपने प्रयोजन हेतु जिस पत्र पर लिखना है, उसका विवरण निम्न प्रकार से है :
प्रयोजन पत्र
सुख-समृद्धि केले के पत्र पर
धन-धान्य भोजपत्र पर
मान-सम्मान पीपल पत्र पर
सर्वकामना सिद्धि अनार के पत्र पर
लक्ष्मी कृपा बेल के पत्र पर
मोक्ष तुलसी पत्र
धन प्राप्ति कागज पर
संतान-गृहस्त सुख भोज पत्र पर
वैसे तो अष्ट गंध की स्याही सर्वकामना हेतु किए जा रहे मंत्र के अनुसार निम्न कार्य हेतु किए जा रहे मंत्र सिद्धि के लिए उपयुक्त है तथापि महानिर्वाण तंत्र के अनुसार निम्न कार्य हेतु अलग-अलग स्याही भी चुन सकते है :
प्रयोजन स्याही
सर्व कार्य सिद्धि केसर तथा चंदन
मोक्ष सफेद चंदन
धनदायक प्रयोग रक्त चंदन
आरोग्य गोरोचन तथा गोदुग्ध
संतान सुख चंदन तथा कस्तूरी
शुभ कार्य गोरोचन, चंदन, पंच गंध
(सफेद तथा लाल चंदन, अगर तगर तथा केसर)
रुद्रयामल महातन्त्र के अन्तर्गत चण्डिका शाप विमोचन मन्त्र
श्रीदुर्गा-पाठ को करने से पहले अगर इन बीस श्लोकों को पढ लिया जावे तो किसी प्रकार से देवी की पूजा के प्रति की गयी भूल से मिला श्राप खत्म हो जाता है,अक्सर श्रीदुर्गा पूजा में किसी न किसी प्रकार का विघ्न तभी पडता है ,जब जानबूझ कर या किसी कारण वश पूजा में अशुद्धि या किसी कन्या को बेकार में परेशान किया जाता है।
शाप-विमोचन संकल्प
ऊँ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचन मन्त्रस्य वसिष्ठनारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषय: सर्वैश्वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्रीं शक्ति: त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तो मम संकल्पितकार्यसिद्धयर्थे जपे विनियोग:।
शापविमोचन मन्त्र
ऊँ (ह्रीं) रीं रेत:स्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१॥
ऊँ रं रक्तस्वरू पिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै,ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥२॥
ऊँ क्षुं क्षुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥३॥
ऊँ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥४॥
ऊँ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥५॥
ऊँ तं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥६॥
ऊँ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥७॥
ऊँ जां जातिरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥८॥
ऊँ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥९॥
ऊँ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१०॥
ऊँ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफ़लदात्र्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥११॥
ऊँ श्रीं बुद्धिस्वरूपिण्यै महिषासुरसैन्यनाशिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१२॥
ऊँ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१३॥
ऊँ माँ मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमासहितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१४॥
ऊँ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्वर्यकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१५॥
ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं नम: शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१६॥
ऊँ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फ़ट स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद विमुक्ताभव॥१७॥
ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नम:॥१८॥
इत्येवं हि महामन्त्रान पठित्वा परमेश्वर,चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशय:॥१९॥
एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति य:,आत्मानं चैव दातारं क्षीणं कुर्यान्न संशय:॥२०॥
(श्रीदुर्गामार्पणामस्तु)
2…कुण्डलिणी की सात्त्विक और धार्मिक उपासनाविधि रूद्रयामलतन्त्र नामक ग्रंथमे वर्णित है , जो साधक को दिव्य ज्ञान प्रदान करती है ।
1. संक्षिप्त विवरण – योग
योगरन्धितकर्माणो ह्रदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम् ‍ ॥
श्रीमद्‌भाग ०८ . ३ . २७
योग के द्वारा कर्म , कर्म वासना और कर्मफल को भस्म करके योगी जन योग से विशुद्ध अपने ह्रदय में जिन योगेश्वर भगवान् ‍ का दर्शन करते हैं । उन्हें मैं प्रणाम करता हूँ ।
पराञ्चि खानि व्यतृणत् ‌ स्वयंभूस्तस्मात्पराङ् ‍ पश्यति नान्तरात्मन् ‍ ।
कश्चिद्‌धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ‍ ॥
कठोपनिषद् ‍ २ .१ .१
समस्त जन संसार में स्वभावतः बहिर्मुख ही उत्पन्न होते हैं । उनमें कोई विरला योगी ही अमृतत्व की कामना से अन्तर्मुख होकर प्रत्यगात्मा को देखता है ।
ओंकार का जप और तेज का ध्यान ही शब्दब्रह्म की उपासना है । इस लोक में दो प्रकार के शब्द सुने जाते हैं , एक नित्य तथा दूसरा कार्यरुप अनित्य । जो शब्द सुना जाता है या उच्चरित होता हैं , वह लोक व्यवहार के लिए प्रवृत्त वैखरी रुप कार्यात्मक अनित्य है । पश्यन्ती रुप शब्द ब्रह्मात्मक बिम्ब के ही वर्ण (मात्रुकाएँ ), पद और वाक्य प्रतिबिम्ब हैं । पश्यन्ति रुप नित्य शब्दात्मा समस्त साध्य साधनात्मक पद और पदार्थ भेद रुप व्यवहार का उपादान कारण है । अकार ककारादि क्रम का वहाँ उपसंहार हो जाता है । अतः समस्त कर्मों का आश्रय , सुख -दुःख का अधिष्ठान , घट के भीतर रखे हुए दीपक के प्रकाश की भाँति भोगायतन शरीर मात्र का प्रकाशक ‘शब्दब्रह्म ’ उच्चारण करने वाले जनों के ह्रदय में विद्यमान रहता है । योगी उसी शब्द तत्त्व स्वरुप महानात्मा के साथ ऐक्य लाभ करता हुआ वैकरण्य (लय ) को प्राप्त करता है ।
नाद्योग में साधक दक्षिणकर्ण में ‘अनाहत ’ को सुनता है । अभ्यास करने पर क्रमशः घण्टा -वादन , मेघ -गर्जन एवं तालवादन आदि दस प्रकार के नाद सुनायी पडते हैं । अन्तिम नाद ओंकार है , उसी में मन का लय करना चाहिए । तभी स्वरुपस्थिति प्राप्त होती है । ऐसा ही नादबिन्दूपनिषद् ‌ में कहा भी है —
सिद्धासने स्थितो योगी मुद्रां सन्धाय वैष्णवीम् ‍ ।
श्रुणुयाद् ‍ दक्षिणे कर्णे नादमन्तर्गतं सदा ॥
हठयोगप्रदीपिका (४ . २९ , ८३ . ५९ ) में कहा गया है कि —
इन्दियाणां मनोनाथो मनोनाथस्तु मारुतः ।
मारुतस्य लयो नाथः स लयो नादमाश्रितः ॥
अभ्यस्यमानो नादोऽयं ब्राह्ममावृणुते ध्वनिम् ‍ ।
पश्चाद् ‍ विक्षेपमखिलं जित्वा योगी सुखी भवेत् ‍ ॥
कर्पूरमनले यद्वषत् ‍ सैन्धवं सलिले यथा ।
तथा संघीयमानं च मनस्तत्त्वे विलियते ॥
यह लय योग ही कुण्डलिनी योग के नाम से प्रसिद्ध है —
लयक्रिया साधनेन सुप्ता सा कुलकुण्डली ।
प्रबुद्‌ध्य तस्मिन् ‍ पुरुषे लीयते नात्र संशयः ॥
.शैष कल...
.
औम तत्सत.

प्रभु को दर्सन को लागि तल कीलिक गरि हेर्नु होला