Saturday, June 6, 2015

ध्यान का अर्थ होता है


एक तो ध्यान और एक ज्ञान। ध्यानी नहीं शिव सारसा! शिव जैसा ध्यानी नहीं है। ध्यानी हो तो शिव जैसा हो। क्या अर्थ है? ध्यान का अर्थ होता है : न विचार, वासना, न स्मृति, न कल्पना। ध्यान का अर्थ होता है : भीतर सिर्फ होना मात्र। इसीलिए शिव को मृत्यु का, विध्वंस का, विनाश का देवता कहा है। क्योंकि ध्यान विध्वंस है-विध्वंस है मन का। मन ही संसार है। मन ही सृजन है। मन ही सृष्टि है। मन गया कि प्रलय हो गयी। ऐसा मत सोचो कि किसी दिन प्रलय होती है। ऐसा मत सोचो कि एक दिन आयेगा जब प्रलय हो जायेगी और सब विध्वंस हो जायेगा। नहीं, जो भी ध्यान में उतरता है, उसकी प्रलय हो जाती है। जो भी ध्यान में उतरता है, उसके भीतर शिव का पदार्पण हो जाता है।
ध्यान है मृत्यु- मन की मृत्यु, ‘मैं’ की मृत्यु, विचार का अंत। शुद्ध चैतन्य रह जाये-दर्पण जैसा खाली! कोई प्रतिबिम्ब न बने।
तो एक तो यात्रा है ध्यान की। और फिर ध्यान से ही ज्ञान का जन्म होता है। जो ज्ञान ध्यान के बिना तुम इकट्ठा करते हो, वह ज्ञान नहीं है, ज्ञान का धोखा है। मिथ्या ज्ञान है। ज्ञान तो ध्यान में जन्मता है। ध्यान है शुद्ध बोध। उस बोध में तुम्हें दिखाई पड़ना शुरू होता है। जीवन का अर्थ, जीवन का रहस्य। ध्यान तो है कुंजी, खोल देती है अनंत के द्वार।
ध्यानी नहीं शिव सारसा ग्लानी सा गोरख।
न तो आज दिखाई पड़ते हैं ध्यानी, जिन्होंने शिव को निमंत्रण किया हो, जो शिव जैसे हो गये हों। है।, शिव की प्रतिमाएं पूजी जा रही हैं। गांव गांव घर -घर शिव के आराधन, पूजन के आयोजन चल रहे हैं। जितनी शिव की प्रतिमाएं हैं, उतनी तो किसी और की नही है.
शिवलिंग ध्यान का प्रतीक है। वह ध्यान की आखिरी गहरी अवस्था का प्रतीक है।
शिव की जगह-जगह पूजा हो रही है, लेकिन पूजा की वात नहीं है। शिवत्व उपलब्धि की बात है। वह जो शिवलिंग तुमने देखा है बाहर मंदिरों में, वृक्षों के नीचे, तुमने कभी ख्याल नहीं किया, उसका आकार ज्योति का आकार है। जैसे दीये की ज्योति का आकार होता है। शिवलिंग अंतर्ज्योति का प्रतीक है। जब तुम्हारे भीतर का दीया जलेगा तो ऐसी ही ज्योति प्रगट होती है, ऐसी ही शुभ्र! यही रूप होता है उसका। और ज्योति बढ़ती जाती है, बढ़ती जाती है। और धीरे – धीरे ज्योतिर्मय व्यक्ति के चारों तरफ एक आभामंडल होता है; उस आभामंडल की आकृति भी अंडाकार होती है।
और जिसने ध्यान जाना हो, उसके ही भीतर गोरख जैसा ज्ञान पैदा होता है। संतों की परंपरा में गोरख का बड़ा मूल्य है। क्योंकि गोरख ने जितनी ध्यान को पाने की विधिया हद हैं, उतनी किसी ने नहीं दी हैं। गोरख ने जितने द्वार ध्यान के खोले, किसी ने नहीं खोले। गोरख ने इतने द्वार खोले ध्यान के कि गोरख के नाम से एक शब्द भीतर चल पड़ा है-गोरखधंधा! गोरख ने इतने द्वार खोले कि लोगों को लगा कि यह तो उलझन की बात हो गयी। गोरख ने एक- आध द्वार नहीं खोला, अनंत द्वार खोल दिये! गोरख ने इतनी बातें कह दीं, जितनी किसी ने कभी नहीं कही थीं।
बुद्ध ने ध्यान की एक प्रक्रिया दी है, विपस्सना; बस पर्याप्त। महावीर ने ध्यान की एक प्रक्रिया दी है, शुक्ल ध्यान; बस पर्याप्त। पतंजलि ने ध्यान की एक प्रक्रिया दी है, निर्विकल्प समाधि। बस पर्याप्त। गोरख ने परमात्मा के मंदिर के जितने संभव द्वार हो सकते हैं, सब द्वारों की चाबिया दी हैं।
गोरख मरे। ध्यान में डूबे। गोरख ने पहले शिव को निमंत्रित कर लिया-विध्वंस के देवता को। ध्यान में जाना अर्थात शिव को निमंत्रण देना है कि आओ और मुझे मिटाओ। और जो मिट गया उसके भीतर ज्ञान को जन्म होता है। जो मिट गया, उसके भीतर ज्ञान की धारा उठती है। मुहम्मद मिटे तो कुरान जन्मा। वेद के ऋषि मिटे तो वेद जन्मे। उपनिषद किनसे गाये गये? उनसे गाये गये जो मिट गये थे। ऐसे ही गीता, ऐसे ही बाइबिल, ऐसे ही धम्मपद।
इस जगत में जो भी अनूठे गीत उतरे हैं, वे उनसे उतरे हैं जो बांस की पोली पोंगरी हो गये थे। जिन्होंने अपने को बीच से बिलकुल हटा लिया था। और जिन्होंने कहा परमात्मा को कि तुझे जो गाना होगा, हम बाधा न देंगे। अगर कुछ भूल-चूक होगी तो हमारी होगी, अगर कुछ ठीक होगा तो बस तेरा। सब ठीक तेरा, सब भूलें हमारी।
जो बिलकुल हट गये, उनसे ज्ञान जन्मा। ज्ञान किताबों से नहीं मिलता। ज्ञान अध्ययन से नहीं मिलता। मनन से नहीं मिलता, चिंतन से नहीं मिलता। पाडित्य मिलता है अध्ययन, मनन, चिंतन से। ज्ञान तो ध्यान से मिलता है। इसलिए मौलिक अर्थों में तो ध्यान ही ज्ञान है।
ररे रमे सूं निसितिरया! राम में जो रम जाये, पूरा- का-पूरा,
ऐसा रम जाये कि अलग बचे ही नहीं, न दिन न रात को भेद रह जाये, चौबीस घंटे रमा रहे राम में, क्षण भर की दरी न हो, कण- भर की दूरी न हो- वही साधु है।
। मूल्य है जो ध्यान में उतर जाये और ज्ञान के मोतियों को ले आये। मूल्य उसका है, जो डुबकी मारे ध्यान के सागर में और ले आये मोतियों को भरके। जो शिव में डूबे और गोरख बनकर निकले, मूल्य उसका है।
ररे रमे सूं निसतिरया! राम ही राम रह जाये जिसके जीवन में, दिन और रात एक ही धुन बजे, एक ही गीत उठे-वही साधु है। कोड अठासी रिख…। ऐसे वो फिर करोड़ों साधु हैं। हंसा तो मोती चुगैं, बगुला गार तलाई। और अगर तुम हंस हो तो ऐसे साधु को खोज ही लोगे।
हंसा तो मोती चुगैं!
हंसा तो मोती चुगैं, बगुला गार तलाई। बगुले तो कीचड़ में बैठे रहते हैं। कहीं भी गंदे तालाबों की कीचड़ के पास बैठे रहते हैं। लगते है हंसों जैसे ही हैं। और बड़े भगत भी मालूम होते हैं।
हंस की खूबी क्या है? हंस मानसरोवर की खाज करता है। देखते हो, हमने हंसों की उस नरम झील को, जो दूर हिमालय के पवित्र शांत, अक्षइषत वातावरण में है – ‘मानसरोवर’ कहा है। सोचकर कहा है, क्योंकि ऐसे ही जो हंस हैं, वे भीतर के मानसरोवर को खोजते हैं – जहां मन समाप्त हो जाता है और चेतना का सागर ही लहराता हर जाता है। जहां मन के सारे दूषण, गंदी हवाएं विदा हो गयी हों और जहां अछूती क्यारी झील रह जाये -मानसरोवर उसी का नाक है। वह तुम्हारे भीतर है।
हिमालय के पहाड़ तुम्हें भी अपने भीतर चढ़ने होंगे, तो ही तुम उस मानसरोवर को खोज पाओगे। और वहां मोतियों से ही, मोतियों से भरी है झील। मोती ही हंस के योग्य हैं। इस संसार से जो तृप्त हो जाता है, समझ लेना कि बगुला है। कीचड़ से तृप्त हो गया, कमल से पहचान ही न हुई।
हंसा तो मोती चुगैं बगुला गार तलाई।
हरिजन हरिसू यूं मिल्या, व्यू जल में रस भाई।।
और जैसे जल में जाता है, ऐसे ही हरिजन वही है जो हरि से मिल गया।
हरिजन हरिसू यूं मिल्या…। हरिजन तो वह है, जो हरि से इस भांति मिल गया, जैसे जल में जल को डाल दो और दानों जल एक हो जायें; जैसे नदी सागर में उतरे और एक हो जाये। जो राम से ऐसा मिल गया। जो हरि के साथ एक हो गया। सिर्फ बुद्ध पुरुषों को ही हरिजन कहा जा सकता है। ब्राह्मण भी हरिजन नहीं हैं, शूद्र तो होते। ब्रह्म को जानते तो हरिजन होते। ब्राह्मण भी ब्राह्मण नहीं है, न हरिजन है। क्या हरिजन होंगे! कभी- कभी कोई विरला व्यक्ति हरिजन हो पाता है।
रा मरण जग जलभ पूनि, अएए जग द्य घणाई।
चरण सरेवा राजस, राख लेव शरणाई।।
अपने गुरु से, जब गुरु ने पुकार दी- ‘और है कोई लेनेहारा? ‘-तो लाल कहते हैं कि जुलू मरण… दिखाई पड़ गया मुझे कि बुढ़ापा है, फिर मौत है, फिर – फिर आना है। यही चक्कर है जन्म का और मरण का। और यह जीवन सिवाय दुख के और कुछ भी नहीं है। उसे एक पुकार में दिख गया! यह देख कर ही कि गुरु अपने हाथ से कब्र में उतर रहा है-बुद्धि जिसके पास भी होती, उसको भी दिखाई पड़ जाता कि इस जगत में पाने योग्य कुछ भी नहीं है। इस जगत में अगर मरने की कला आ
गयी तो सब आ गया।
जुरा मरण जग जलभ पुनि! यहां है ही क्या? बुढ़ापा है, बीमारी है, दुख हैं, चिंताएं हैं, संताप हैं। फिर मौत है, फिर जन्म; और फिर वही सिलसिला है। बड़ा दुख है इस जीवन में। चरण सरेवा राजस! कहते हैं गुरु को : मुझे चरण छू लेने दो! इसके पहले कि तुम विदा हो जाओ, मुझे चरण छू लेने दो। चरण सरेवा राजस, राख लेव शरणाई।
जाने के पहले मुझे शरण दे दो। मिटने के पहले मुझे भी मिटा दो। तुम्हारी समाधि मेरी समाधि भी बन जाये। तुम्हारी मौत मेरी मौत भी बन जाये। बस एक ही आकांक्षा तुमने जगा दी कि तुम्हारे चरण छू लूं।
सदगुरु के चरण छूना ही पर्याप्त है। मगर हमारे मुल्क में तो चरण छूना औपचारिकता हो गयी है। तुम तो जहां जाओ वहीं हर किसी के चरण छूते हो। चरण छूना एक शिष्टाचार हो गया है। शिष्टाचार के कारण चरण छूने का जो राज था वह खो गया। चरण छूने का जो अपूर्व अर्थ था, वह खो गया। जैसे हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हैं, ऐसे ही बड़ा बुजुर्ग कोई मिला, उसके चरण छूकर नमस्कार कर लेते हो : चरण छू लेते हो, मगर सिर झुकता नहीं। चरण छू लेते हो, मगर अहंकार झुकता नहीं। इसलिए कहते हैं कि मुझे अपने पर भरोसा नहीं है। तुम्हारी ही कृपा हो तो मैं तुम्हारे चरण छू पाऊं। मैं तो छू रहा हूं मगर दो आशीर्वाद कि यह छूना सार्थक जो पाये। दो आशीर्वाद कि सच में छू पाऊं। कहीं हाथ ही चरण न छुए, मेरे प्राण भी छू लें।
चरण सरेवां राजस राख लेव शरणाई।
शैष कल ....
औम तत्सत

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प्रभु को दर्सन को लागि तल कीलिक गरि हेर्नु होला