साफी कर गुरु -ज्ञान की..
चिलम को लपेटने का जो कपड़ा होता है उसको कहते हैं साफी। साफी कर गुरु- ज्ञान की…। और ऐसा क्या कभी एकाध दम मारी, आठों पहर पी! दिल खोलकर पी! पीता ही रह, अहर्निश पी!
चिलम को लपेटने का जो कपड़ा होता है उसको कहते हैं साफी। साफी कर गुरु- ज्ञान की…। और ऐसा क्या कभी एकाध दम मारी, आठों पहर पी! दिल खोलकर पी! पीता ही रह, अहर्निश पी!
इस बात को अंततः फिर दोहरा दूं कि जीवन में जिन्होंने भी सत्य जाना है
उन्होंने सदा कहा है : परमात्मा को पाओ, फिर व्यर्थ तो अपने – आप छूट जाता
है। और जिन्होंने सत्य नहीं जाना, वे कहते हैं : पहले व्यर्थ को छोड़ो, फिर
परमात्मा मिलेगा।
और दूसरी कोटि की जो बात है, मूलत: गलत है। ऐसी ही गलत है जैसे कोई तुमसे कहे : पहले अंधेरे को हटाओ फिर दीया जलेगा। अगर तुम अंधेरे को हटाने में लग गये तो अंधेरा तो हटेगा ही नहीं, दीया तो जलेगा ही क्यों! अंधेरा कोई हटा सकता है?
नहीं; दीया जलाओ, अंधेरा अपने से चला जाता है। ठीक तो नहीं है कहना कि चला जाता है; भाषा की भूल है। क्योंकि अंधेरा था ही नहीं, कहीं जाता – आता नहीं। अंधेरा तो सिर्फ प्रकाश का अभाव है। जैसे ही प्रकाश का भाव होता है, अंधेरा नहीं पाया जाता। कोई अंधेरे को नहीं हटा सकता। कोई पाप को नहीं मिटा सकता। कोई अज्ञान को नहीं जला सकता।
ज्ञान की ज्योति जलाओ! ज्ञान का दिया जलाओ। और ज्ञान के दीये को जलाने का जो उपाय है, वह ध्यान का तुम्हारे भीतर अंतस्तल हो तो उसमें अपने- अपन ज्ञान का दीया जलता है। वह दीया परमात्मा तक पहुंचा देगा।
वह दीया तत्क्षण परमात्मा को प्रगट करवा देगा। वह दीया पर्याप्त है-
औम तत्सत.
और दूसरी कोटि की जो बात है, मूलत: गलत है। ऐसी ही गलत है जैसे कोई तुमसे कहे : पहले अंधेरे को हटाओ फिर दीया जलेगा। अगर तुम अंधेरे को हटाने में लग गये तो अंधेरा तो हटेगा ही नहीं, दीया तो जलेगा ही क्यों! अंधेरा कोई हटा सकता है?
नहीं; दीया जलाओ, अंधेरा अपने से चला जाता है। ठीक तो नहीं है कहना कि चला जाता है; भाषा की भूल है। क्योंकि अंधेरा था ही नहीं, कहीं जाता – आता नहीं। अंधेरा तो सिर्फ प्रकाश का अभाव है। जैसे ही प्रकाश का भाव होता है, अंधेरा नहीं पाया जाता। कोई अंधेरे को नहीं हटा सकता। कोई पाप को नहीं मिटा सकता। कोई अज्ञान को नहीं जला सकता।
ज्ञान की ज्योति जलाओ! ज्ञान का दिया जलाओ। और ज्ञान के दीये को जलाने का जो उपाय है, वह ध्यान का तुम्हारे भीतर अंतस्तल हो तो उसमें अपने- अपन ज्ञान का दीया जलता है। वह दीया परमात्मा तक पहुंचा देगा।
वह दीया तत्क्षण परमात्मा को प्रगट करवा देगा। वह दीया पर्याप्त है-
औम तत्सत.

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