Saturday, June 6, 2015

ईश्वर है

जीवन एक तो वह है जो हम जानते हैं; वह सरासर स्वम्यवत है। एक और जीवन है लो उन्होंने जाना जो जागे हैं। उस जीवन का नाम ही ईश्वर है।
ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है; वास्तविक जीवन की अनुभूति का नाम है। संसार का कोई अस्तित्व नहीं; सोये हुए आदमी के सपनों की भीड़ है।
ऐसा समझो, संसार है सोये हुए आदमी के कल्पना -जाल का नाम और ईश्वर है जागे मनुष्य की प्रतीति, साक्षात्कार।
जो है वही है। अगर तुम सोये हो तो सपने फैल जायेंगे, सपने छा जायेंगे। जो है, उस पर सपने सवार हो जायेंगे। तुम जागे हो, सपने हट जायेंगे। जो है, जैसा है, वैसा प्रगट हो जायेगा।
नींद क्या है? अहंकार नींद है। मैं भिन्न हूं मैं पृथक हूं मैं अलग हूं मेरा अपना निज का अस्तित्व है-ऐसी प्रतीति निद्रा है। फिर शेष सारे उपद्रव इस प्रतीति से ही खड़े होते हैं। फिर मैं से ममता होती है। फिर मैं से माया होती है। फिर मैं के फैलाव का कोई ओर -छोर नहीं है। जिसे जागना है, उसे मैं को जड़ से काट देना होगा।
मिटने की कला धर्म है। अपने को बिलकुल नेस्तनाबूद कर देने की कला धर्म है। अपने को ऐसे मिटा देन है जैसे बूंद सागर मैं गिर जाती है और खोजाती है; कि बीज भूमि में गिर जाता है और विनष्ट हो जाता है। पर देखना राज, रहस्य, चमत्कार! मरे हुए बीज से उगता है वृक्ष। मृत्यु से अमृत का पौधा निकलता है। बीज में तो कुछ भी न था, वृक्ष मैं बहुत कुछ होगा। रसधार बहेगी। हवाओं में नर्तन होगा। बदलियों से प्रेमालाप होगा। चाद-तारों से गुफ्तगू होगी। सूरज से छेड़ -छाड़ होगी। फूल खिलेंगे। फल लगेंगे। पक्षी आवास करेंगे। थके – पौदे लोगों को छाया मिलेगी।
बीज में तो यह कुछ भी नहीं था। बी तो व्यर्थ था। अगर बीज की कोई सार्थकता थी तो इतनी ही थी की वृक्ष बन जाये। वृक्ष बने तो सार्थक, बीज रह जाये तो व्यर्थ। मनुष्य भी परमात्मा बन जाये तो सार्थक, मनुष्य ही रह जाये तो व्य।
मनुष्य बीज है; उसमें बहुत कुछ होने की संभावना है। मनुष्य पर अपनी इतिश्री न मान लेना, अंत न मान लेना। मनुष्य अंत नहीं, प्रारंभ है। मनुष्य समाप्ति नहीं है; मनुष्य के पार जाना है, अतिक्रमण करना है। अपने से ऊपर उठने की जो आकांक्षा है, वही सत्य की खोज है-
जिसने मनुष्य की यह देह रची है। इस जगत में मनुष्य की देह सबसे बड़ा चमत्कार है। ऐसे तो चमत्कार ही चमत्कार हैं। ऐसे तो वृक्ष ही देह भी कुछ कम चमत्कार नहीं। ऐसे तो आकाश में उड़ते हुए पक्षी की देह भी कुछ कम चमत्कार नहीं। पर मनुष्य बेजोड़ है! उसकी देह में जितने फुल संभव हैं उतने किसी और देह में नहीं। उसके भीतर जितने खजाने भरे हैं, उतने किसी और देह में नहीं। उसमें जितने फल लग सकते हैं, उतने किसी और वृक्ष में नहीं। और वह जितना ऊंचा उड़ सकता है, कोई पक्षी न कभी उड़ा है न उड़ सकेगा। वह जितना गहरा जा सकत है, कोई मछली न कभी गयी है, न जा सकेगी।
मनुष्य अपूर्व है, अद्वितीय है। हिमालय के उत्तुंग शिखर भी उसके चेतना के शिखर के सामने टीले -टाले हैं। चांद-तारों की रोशनी भी उसके भीतर ध्यान से जन्मी हुई रोशनी के सामने फीकी है, अंधेरी है। यह विराट सूरज जो रोज सुबह उगता है और जिससे इस पृथ्वी का सारा जीवन चलता है, यह कुछ भी नहीं, जिन्होंने भीतर आंख खोली है, उन्होंने ऐसे हजार -हजार सूरज एक साथ उगते देखे हैं। उन्होंने उसका जल्वा देखा है। उन्होंने उसकी रोशनी देखी है।
बड़ा सिलावट है परमात्मा, पत्थर में फूल उगा देता है। पत्थर में प्राण डाल देता है। ऐसे तो मनुष्य मिट्टी है।
उर्दू में, अरबी में, हिब्रू में मनुष्य के लिए शब्द है- ‘ आदम’, आदमी। आदम का अर्थ होता है : मिट्टी। क्योंकि परमात्मा ने मिट्टी से आदमी को रचा और फिर उसमें सांस फूंकी। अंग्रेजी में शब्द है : ‘ह्यूमन’। ह्यूमन का अर्थ होता है। मिट्टी, खुमस। ऐसे तो आदमी मिट्टी है। और अगर हम आदमी में तलाश न करें, खोज न करें, मोती न चुगें तो मिट्टी ही रह जाता है। मिट्टी में मिट्टी एक दिन गिर जाती है। कब्र में सब समा जाता है। कुछ बचता नहीं। लेकिन अगर हम खोज करें, अगर हम थोड़ा श्रम उठाएं, अगर हम अपनी ही पहाड़ियों पर चढ़े और अपने ही प्रशांत महासागरों में डुबकी लगाएं, तो बहुत -बहुत मोती हाथ लगते हैं। उन मोतियों में सबसे बड़ा जो मोती है, सबसे बड़ा चमत्कार जो है, वह यह कि पुणय में चिन्मय छिपा हुआ है। मिट्टी में अमृत का आवास है। देह मिट्टी है और उसके भीतर परमात्मा छिपा है। मंदिर मिट्टी है मगर मंदिर का देवता मिटी नहीं है।
पर देवता से तो कितने कम लोगों की पहचान होती है! लोग तो दर्पण में देखकर अपनी पहचान करते हैं। दर्पण में तो तुम्हें जो दिखाई पड़ता है वह मिट्टी की छाया है। दर्पण में तो मिट्टी की ही छाया बन सकती है। तुम्हारी छाया दर्पण में कभी नहीं बन सकती। ऐसा कोई दर्पण नहीं है जिसमें तुम्हारी छाया बन सके। कोई दर्पण तुम्हारी चेतना का प्रतिबिंब नहीं पकड़ सकता। चेतना कोई वस्तु तो नहीं कि उसका प्रतिबिंब जो सके।
और दर्पण से ही हमें अपनी पहचान है। अलग – अलग तरह के दर्पण हमने निर्मित किये हैं। कांच का दर्पण ही अकेला दर्पण नहीं है। दूसरे की आखों में जब तुम झांकते हो और उनसे अपने संबंध में कुछ सूत्र लेते हो, वह दर्पण भी कांच का ही दर्पण है। तुम्हें अपने संबंध में जो पता है वह तुमने दूसरों से इकट्ठा किया है, उनके मंतव्य हैं। किसी ने कहा प्यारे हो, किसी ने कहा सुंदर हो; तुम्हारी छाती फूल गयी। और किसी ने कहा कुरूप हो, और किसी ने कहा गंदे हो; और तुम्हारे प्राण सिकुड़ गये। और किसी ने फूल -मालाएं पहना दीं और किसी ने पत्थर मारे और गालियां दीं…। और इस तरह तुम चारों तरफ से अपने संबंध मैं मंतव्य इकट्ठे कर लेते हो। वे सारे मंतव्य बहुत विरोधाभासी हैं। उनमें मित्रों के मंतव्य हैं, शत्रुओं के मंतव्य हैं, तटस्थों के मंतव्य हैं। इसलिए तुम एक बिगूचन हो। तुमने सब तरह के मंतव्य तो इकट्ठे कर लिए, उनमें कोई तालमेल बिठालना मुश्किल है। कोई कुछ कहता है, कोई कुछ कहता हैं। आज कुछ कहता है, कल कुछ कहता है।
ज्ञानियों ने कहा है : अपनी दशा में कोई स्वयं से साक्षात्कार करता है, मन- मुक्त होकर, मन से शून्य होकर, मन-रिक्त होकर! और तब दिखाई पड़ता है कैसा चमत्कार है, कैसा अदभुत चमत्कार है! भरोसे योग्य नहीं। मिट्टी की इस काया में- अमृत का वास! मिट्टी के इस बर्तन में-अमृत भर दिया! सोने का बर्तन होता, हीरे -जवाहरात जड़ा होता, तो शायद हम सोचते भी कि इसके भीतर अमृत होगा। मिट्टी की इस देह में, जो मिटी से बनी और मिट्टी में गिर जायेगी… और जीवन की परम संपदा भर दी!
शायद यह देह मिट्टी की है, इसलिए हमें स्मरण भी नहीं जाता। सोने की देह होती, तो तुम शायद भीतर टटोलते कि जब देह सोने की है तो भीतर पता नहीं और खजाने पड़े हों। देह तो मिट्टी की है, तो तुम भीतर जाते नहीं और बाहर ही बाहर तलाश करते रहते हो। और बाहर मिलेगा नहीं, क्योंकि जो है वह भीतर है। खूब गहरे में दबाया है। उतनी गहरी खुदाई अपने भीतर करनी होगी। उस खुदाई का नाम ही ध्यान है।
औम तत्सत.

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प्रभु को दर्सन को लागि तल कीलिक गरि हेर्नु होला