🌺दृष्टि में समता का भाव🌺दृष्टि
सम कैसे हो?सर्व प्रथम अपने भीतर यह भाव दृढ रहना चाहिए कि''मैं साधक
हूँ''परमात्मा का जिज्ञासु हूँ''और एक बात यह कि सब में परमात्मा है। सब
में परमात्मा को कैसे देखें?इस बात पर थोङा ध्यान देने की आवश्यकता
है।मनुष्य है --इसमें जो ''है''---पना है सत्ता है,वह कभी मिटती नहीं।वह
बुरा हो या भला हो,दुराचारी हो या सदाचारी हो,उसमें जो ''है''--पना हैवह
मिटेगा क्या?उत्तम से उत्तम वस्तुओं में भी वह ''है''--पना है और जो निम्न
से निम्न दृष्टिगोचर होती है उसमें भी
''है''--पना है।उन वस्तुओं का रूप बदल जाता है पर ''है'--पना(सत्ता)नहीं
बदलता।कूङा करकट को जला दो तो वह राख बन जाएगा।पर उसकी सत्ता दूसरी नहीं हो
जाएगी।वह सत्ता परमात्मा की है।उस सत्ता की तरफ दृष्टि रखनी चाहिए।जो
परिवर्तन होता है वह प्रकृति में होता है।🌸संक्षेप
में प्रकृति का स्वरूप बताऐं तो एक वस्तु और एक क्रिया---ये दो प्रकृति
हैं।वस्तु भी बदलती रहती है और क्रिया भी बदलती रहती है।यह बदलना प्रकृति
का है।आप प्रकृति के जिज्ञासु नहीं हैं,परमात्मा के जिज्ञासु हैं।अतः बदलने
वाले को न देख कर रहने वाले''है''--पने को देखना चाहिए।संसार है,मनुष्य
है,पशु है,पक्षी है,यहजीवित है या मृत है--इसमें तो फर्क है,पर ''है''में
क्या फर्क पङा?लाभ हो गया,हानि हो गई,पोते का जन्म हुआ,बेटा मर गया,तो
नफा--नुकसान में,जन्मने-मरने में फर्क है,पर दोनो के ज्ञान में क्या फर्क
पङा।व्यवहार तो स्वाँग के अनुसार ही होगा।हम साधु हैं तो साधु की तरह
करेंगे।गृहस्थ हैं तो गृहस्थ की तरह करेंगे।सामने जो व्यक्ति है,परिस्थिति
है,उसको लेकर बर्ताव करना है,परन्तु भीतर से,सिद्धान्त यह रहे कि सबमें एक
परमात्म सत्ता है। सत्यरूप से,ज्ञान रूप से,आनंद रूप से सबमें परमात्मा ही
परिपूर्ण है।ओम् ओम् ओम् तत् सत्।

No comments:
Post a Comment