साचा साहिबु साचु नाइ। भाखिया भाउ अपारु।।
आखहि मंगहि देहि देहि। दाति करे दातारू।।
फेरि कि अगै रखीऐ। जितु दिसै दरबारु।।
मुहौ कि बोलणु बोलीऐ। जितु सुणि धरे पिआरु।।
अमृत वेला सचु नाउ। वडिआई वीचारु।।
करमी आवे कपड़ा। नदरी माखु दुआरु।।
‘नानक’ एवै जाणिए। सभु आपे सचिआरु।।
पउड़ी: 5
थापिया न जाई कीता न होई। आपे आप निरंजन सोई।।
जिनि सेविआ तिनि पाइआ मानु। ‘नानक’ गावीऐ गुणीनिधानु।।
गावीऐ सुणीऐ मनि राखीऐ भाउ। दुख परहरि सुखु घर लै जाउ।।
गुरुमुखि नादं गुरुमुखि वेदं। गुरुमुखि रहिआ समाई।।
गुरु ईसरु गुरु गोरखु बरमा। गुरु पारबती माई।।
जे हउ जाणा आखा नाहीं। कहणा कथनु न जाई।।
गुरा एक देहि बुझाई–
सभना जीआ का इकु दाता। सो मैं विसरि न जाई।।
साहब सच्चा है, उसका नाम सच्चा है, उसका गुणगान अशेष भावों में किया जाता है। गुणगान करते हैं लोग। और दो, और दो, करके मांग करते हैं; और दाता देता ही चला जाता है। फिर उसके आगे क्या रखा जाए कि उसके दरबार का दर्शन हो? और हम कौन-सी बोली बोलें जिसे सुन कर वह प्यार करे? अमृत वेला में सत्य नाम की महिमा का ध्यान करो। कर्म से शरीर मिलता है। कृपा-दृष्टि से मोक्ष का द्वार खुलता है। नानक कहते हैं, इस प्रकार जानो कि सत्य ही, परमात्मा ही सब कुछ है।
साहब, नानक का परमात्मा के लिए दिया गया शब्द है। परमात्मा के साथ हम दो तरह से जुड़ सकते हैं। एक तो दार्शनिकों की परमात्मा के संबंध में चर्चा है। लेकिन उनके शब्द प्रेम से अधूरे हैं। उनके शब्द सूखे हैं। उनके शब्द बौद्धिक हैं, हार्दिक नहीं।
दूसरा भक्त का मार्ग है; उसके शब्दों में रस है। वह परमात्मा को एक सिद्धांत की तरह नहीं, एक संबंध की तरह देखता है। वह उससे कुछ संबंध जोड़ता है। क्योंकि जब तक संबंध न जुड़ जाए तब तक हृदय प्रभावित नहीं होता। परमात्मा का नाम हम कह सकते हैं, सत्य। लेकिन साहब में जो बात है वह सत्य में न होगी। सत्य से हम कैसे जुड़ेंगे? हमारा क्या संबंध होगा? हमारे हृदय और सत्य के बीच कौन-सा सेतु बनेगा?
लेकिन साहब प्यार का संबंध है। साहब होते ही परमात्मा प्रियतम हो गया। अब हम जुड़ सकते हैं। अब रास्ता खुला है। अब हम दौड़ सकते हैं। सत्य कितना भी ठीक हो, फिर भी भक्त के लिए रूखा-सूखा है। भक्त चाहता है कुछ, जिसके साथ स्पर्श हो सके। भक्त चाहता है कुछ, जिसके आसपास नाच सके, गा सके। भक्त चाहता है कुछ, जिसके चरणों में सिर रख सके। साहब प्यारा नाम है। उसका अर्थ है मालिक, उसका अर्थ है स्वामी।
फिर संबंध बहुत ढंग के हो सकते हैं। सूफियों ने परमात्मा को प्रेयसी माना है, तो साधक प्रेमी हो जाता है। हिंदुओं ने, यहूदियों ने, ईसाइयों ने परमात्मा को पिता माना है, तो साधक बेटा हो जाता है। नानक ने परमात्मा को साहब माना है, तो साधक दास हो जाता है।
इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है। क्योंकि इन सभी संबंधों का मार्ग भिन्न-भिन्न होगा। प्रेमी के साथ हम एक ही तल पर खड़े होते हैं। प्रेमी न तो ऊपर होता है न नीचे। प्रेयसी और प्रेमी एक ही तल पर खड़े होते हैं। कोई ऊपर नहीं और कोई नीचे नहीं। पिता और बेटे के बीच जो संबंध है, वह संस्कारगत है। चूंकि हम किसी पिता के घर पैदा हुए हैं, इसलिए एक संबंध है।…
मालिक हम खुद होना चाहते हैं और हमारी चले तो परमात्मा को दास बना लें। तो अहंकार मिटाने के लिए दास की भावना से बड़ी कोई भावना नहीं हो सकती। न तो पिता के संबंध में अहंकार गिरेगा, न प्रेयसी-प्रेमी के संबंध में अहंकार गिरेगा। अहंकार तो गिर सकता है सिर्फ दास की भावना में, कि मैं गुलाम हूं और तू मालिक है।
और यह सबसे कठिन है। क्योंकि यही अहंकार के विपरीत स्थिति है। अहंकार मानता है, मैं मालिक हूं, सारा अस्तित्व मेरा गुलाम है। भक्त कहेगा, सारा अस्तित्व मालिक है, मैं गुलाम हूं। यही वास्तविक शीर्षासन है। सिर को जमीन में करके पैर ऊपर करके खड़े हो जाना असली शीर्षासन नहीं है–अहंकार को नीचे करके! क्योंकि वही सिर है। उसको नीचे करके खड़े हो जाना दास की भावना है। इसलिए दास ही ठीक-ठीक शीर्षासन करता है। वह उलटा हो जाता है। और जैसे तुमने दुनिया को अब तक देखा है मालिक होने के ढंग से, तो दुनिया को तुमने कुछ और ही पाया है।
रास्ते से तुम गुजरते हो, भिखारी तुमसे मांगता है। क्या उसके मांगने से कभी कोई तुम्हारे मन में और उसके बीच कोई संबंध स्थापित होता है? किसी तरह का लगाव बनता है? उलटी ही हालत होती है। उसके मांगने से तुम खिंच जाते हो। अगर देते भी हो तो बेमन से देते हो। और दुबारा ध्यान रखते हो कि उस रास्ते से संभल कर निकलना है। जब कोई मांगता है तब तुम सिकुड़ते हो, देना नहीं चाहते। और जब कोई मांगता नहीं तभी देने का मन होता है।
तुम जरा अपने को ही समझो तो परमात्मा की तरफ जाने के रास्ते साफ हो जाएं। जब कोई तुमसे मांगता है तब तुम देना नहीं चाहते, क्योंकि उसकी मांग छीन-झपट मालूम होती है। वह आक्रमण कर रहा है। सब मांग आक्रमण है। लेकिन जब तुमसे कोई मांगता नहीं, तब तुम हलके होते हो, तब तुम सहज दे सकते हो।
बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को कहा है कि जब तुम गांव में भिक्षा के लिए जाओ तो मांगना मत। सिर्फ द्वार पर खड़े हो जाना। अगर कोई प्रति-उत्तर न मिले तो आगे बढ़ जाना; मांगना मत।
और यही तो भिक्षु और भिखारी में भेद है। भिक्षु को हमने महासम्मान दिया, जो हमने सम्राटों को नहीं दिया। और भिखारी को तो हम आखिरी जगह रखे हुए हैं। सम्मान दूर, उसे हम अपमान देने के योग्य भी नहीं मानते। उससे हम नजर बचा कर निकलते हैं। बुद्ध के भिक्षुओं ने पूछा कि बिना मांगे कोई कैसे देगा? बुद्ध ने कहा, बिना मांगे ही दुनिया में चीजें मिलती हैं। मांगे कि मुश्किल में पड़े। क्योंकि जब तुम मांगते नहीं तब तुम दूसरे को आतुर करते हो देने के लिए। जब तुम मांगते हो तब तुम दूसरे में संकोच पैदा करते हो।
तुम अपने जीवन के सभी संबंधों में इस कहानी को छिपा हुआ पाओगे। पत्नी कुछ मांगती है, देना मुश्किल हो जाता है। लाते भी हो तो बेमन से सिर्फ कलह टालने को। वह प्रेम का संबंध न रहा। वह सिर्फ उपद्रव से बचने की व्यवस्था हुई। पत्नी मांगती ही नहीं, कभी नहीं मांगती, तब तुम्हारा हृदय प्रफुल्लित होता है। तब तुम कुछ लाना चाहते हो। तब तुम उसे कुछ देना चाहते हो। देना तभी संभव हो पाता है जब कोई न मांगे।
तुम परमात्मा से टूटे हो तुम्हारी मांग के कारण। और तुम्हारी सब प्रार्थनाएं दो, और दो से भरी हैं। तुम परमात्मा का उपयोग एक सेवक की तरह करना चाहते हो। तुम कहते हो, मेरे पैर में दर्द है, दूर करो। तुम कहते हो, आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, ठीक करो। तुम कहते हो, पत्नी बीमार है, स्वस्थ करो। नौकरी खो गयी है, नौकरी दो। तुम परमात्मा के द्वार पर सदा भिखमंगे की तरह पहुंचते हो, मांगते पहुंचते हो। तुम्हारा मांगना ही बताता है कि साहब तुम अपने को समझ रहे हो और परमात्मा को तुम दास समझ रहे हो। वह तुम्हारी जरूरतें पूरी करने के लिए है। और तुम्हारी जरूरतें इतनी महत्वपूर्ण हैं कि तुम परमात्मा को भी सेवा में रत करना चाहते हो।
नहीं, अगर परमात्मा साहब है और तुम गुलाम हो, तो मांग क्या? और मजा यह है कि तुम मांगते हो और वह देता चला जाता है। ऐसा भी नहीं है कि तुम्हारे मांगने से न मिलता हो, मिलता चला जाता है। लेकिन जितना ही तुम पाते हो उतना ही तुम उससे दूर हटते जाते हो। क्योंकि तुम और मांगोगे। जितना मिलेगा और मांगोगे। जितना तुम मांगोगे, दूर हटते जाओगे.
औम सिद्धा.
आखहि मंगहि देहि देहि। दाति करे दातारू।।
फेरि कि अगै रखीऐ। जितु दिसै दरबारु।।
मुहौ कि बोलणु बोलीऐ। जितु सुणि धरे पिआरु।।
अमृत वेला सचु नाउ। वडिआई वीचारु।।
करमी आवे कपड़ा। नदरी माखु दुआरु।।
‘नानक’ एवै जाणिए। सभु आपे सचिआरु।।
पउड़ी: 5
थापिया न जाई कीता न होई। आपे आप निरंजन सोई।।
जिनि सेविआ तिनि पाइआ मानु। ‘नानक’ गावीऐ गुणीनिधानु।।
गावीऐ सुणीऐ मनि राखीऐ भाउ। दुख परहरि सुखु घर लै जाउ।।
गुरुमुखि नादं गुरुमुखि वेदं। गुरुमुखि रहिआ समाई।।
गुरु ईसरु गुरु गोरखु बरमा। गुरु पारबती माई।।
जे हउ जाणा आखा नाहीं। कहणा कथनु न जाई।।
गुरा एक देहि बुझाई–
सभना जीआ का इकु दाता। सो मैं विसरि न जाई।।
साहब सच्चा है, उसका नाम सच्चा है, उसका गुणगान अशेष भावों में किया जाता है। गुणगान करते हैं लोग। और दो, और दो, करके मांग करते हैं; और दाता देता ही चला जाता है। फिर उसके आगे क्या रखा जाए कि उसके दरबार का दर्शन हो? और हम कौन-सी बोली बोलें जिसे सुन कर वह प्यार करे? अमृत वेला में सत्य नाम की महिमा का ध्यान करो। कर्म से शरीर मिलता है। कृपा-दृष्टि से मोक्ष का द्वार खुलता है। नानक कहते हैं, इस प्रकार जानो कि सत्य ही, परमात्मा ही सब कुछ है।
साहब, नानक का परमात्मा के लिए दिया गया शब्द है। परमात्मा के साथ हम दो तरह से जुड़ सकते हैं। एक तो दार्शनिकों की परमात्मा के संबंध में चर्चा है। लेकिन उनके शब्द प्रेम से अधूरे हैं। उनके शब्द सूखे हैं। उनके शब्द बौद्धिक हैं, हार्दिक नहीं।
दूसरा भक्त का मार्ग है; उसके शब्दों में रस है। वह परमात्मा को एक सिद्धांत की तरह नहीं, एक संबंध की तरह देखता है। वह उससे कुछ संबंध जोड़ता है। क्योंकि जब तक संबंध न जुड़ जाए तब तक हृदय प्रभावित नहीं होता। परमात्मा का नाम हम कह सकते हैं, सत्य। लेकिन साहब में जो बात है वह सत्य में न होगी। सत्य से हम कैसे जुड़ेंगे? हमारा क्या संबंध होगा? हमारे हृदय और सत्य के बीच कौन-सा सेतु बनेगा?
लेकिन साहब प्यार का संबंध है। साहब होते ही परमात्मा प्रियतम हो गया। अब हम जुड़ सकते हैं। अब रास्ता खुला है। अब हम दौड़ सकते हैं। सत्य कितना भी ठीक हो, फिर भी भक्त के लिए रूखा-सूखा है। भक्त चाहता है कुछ, जिसके साथ स्पर्श हो सके। भक्त चाहता है कुछ, जिसके आसपास नाच सके, गा सके। भक्त चाहता है कुछ, जिसके चरणों में सिर रख सके। साहब प्यारा नाम है। उसका अर्थ है मालिक, उसका अर्थ है स्वामी।
फिर संबंध बहुत ढंग के हो सकते हैं। सूफियों ने परमात्मा को प्रेयसी माना है, तो साधक प्रेमी हो जाता है। हिंदुओं ने, यहूदियों ने, ईसाइयों ने परमात्मा को पिता माना है, तो साधक बेटा हो जाता है। नानक ने परमात्मा को साहब माना है, तो साधक दास हो जाता है।
इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है। क्योंकि इन सभी संबंधों का मार्ग भिन्न-भिन्न होगा। प्रेमी के साथ हम एक ही तल पर खड़े होते हैं। प्रेमी न तो ऊपर होता है न नीचे। प्रेयसी और प्रेमी एक ही तल पर खड़े होते हैं। कोई ऊपर नहीं और कोई नीचे नहीं। पिता और बेटे के बीच जो संबंध है, वह संस्कारगत है। चूंकि हम किसी पिता के घर पैदा हुए हैं, इसलिए एक संबंध है।…
मालिक हम खुद होना चाहते हैं और हमारी चले तो परमात्मा को दास बना लें। तो अहंकार मिटाने के लिए दास की भावना से बड़ी कोई भावना नहीं हो सकती। न तो पिता के संबंध में अहंकार गिरेगा, न प्रेयसी-प्रेमी के संबंध में अहंकार गिरेगा। अहंकार तो गिर सकता है सिर्फ दास की भावना में, कि मैं गुलाम हूं और तू मालिक है।
और यह सबसे कठिन है। क्योंकि यही अहंकार के विपरीत स्थिति है। अहंकार मानता है, मैं मालिक हूं, सारा अस्तित्व मेरा गुलाम है। भक्त कहेगा, सारा अस्तित्व मालिक है, मैं गुलाम हूं। यही वास्तविक शीर्षासन है। सिर को जमीन में करके पैर ऊपर करके खड़े हो जाना असली शीर्षासन नहीं है–अहंकार को नीचे करके! क्योंकि वही सिर है। उसको नीचे करके खड़े हो जाना दास की भावना है। इसलिए दास ही ठीक-ठीक शीर्षासन करता है। वह उलटा हो जाता है। और जैसे तुमने दुनिया को अब तक देखा है मालिक होने के ढंग से, तो दुनिया को तुमने कुछ और ही पाया है।
रास्ते से तुम गुजरते हो, भिखारी तुमसे मांगता है। क्या उसके मांगने से कभी कोई तुम्हारे मन में और उसके बीच कोई संबंध स्थापित होता है? किसी तरह का लगाव बनता है? उलटी ही हालत होती है। उसके मांगने से तुम खिंच जाते हो। अगर देते भी हो तो बेमन से देते हो। और दुबारा ध्यान रखते हो कि उस रास्ते से संभल कर निकलना है। जब कोई मांगता है तब तुम सिकुड़ते हो, देना नहीं चाहते। और जब कोई मांगता नहीं तभी देने का मन होता है।
तुम जरा अपने को ही समझो तो परमात्मा की तरफ जाने के रास्ते साफ हो जाएं। जब कोई तुमसे मांगता है तब तुम देना नहीं चाहते, क्योंकि उसकी मांग छीन-झपट मालूम होती है। वह आक्रमण कर रहा है। सब मांग आक्रमण है। लेकिन जब तुमसे कोई मांगता नहीं, तब तुम हलके होते हो, तब तुम सहज दे सकते हो।
बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को कहा है कि जब तुम गांव में भिक्षा के लिए जाओ तो मांगना मत। सिर्फ द्वार पर खड़े हो जाना। अगर कोई प्रति-उत्तर न मिले तो आगे बढ़ जाना; मांगना मत।
और यही तो भिक्षु और भिखारी में भेद है। भिक्षु को हमने महासम्मान दिया, जो हमने सम्राटों को नहीं दिया। और भिखारी को तो हम आखिरी जगह रखे हुए हैं। सम्मान दूर, उसे हम अपमान देने के योग्य भी नहीं मानते। उससे हम नजर बचा कर निकलते हैं। बुद्ध के भिक्षुओं ने पूछा कि बिना मांगे कोई कैसे देगा? बुद्ध ने कहा, बिना मांगे ही दुनिया में चीजें मिलती हैं। मांगे कि मुश्किल में पड़े। क्योंकि जब तुम मांगते नहीं तब तुम दूसरे को आतुर करते हो देने के लिए। जब तुम मांगते हो तब तुम दूसरे में संकोच पैदा करते हो।
तुम अपने जीवन के सभी संबंधों में इस कहानी को छिपा हुआ पाओगे। पत्नी कुछ मांगती है, देना मुश्किल हो जाता है। लाते भी हो तो बेमन से सिर्फ कलह टालने को। वह प्रेम का संबंध न रहा। वह सिर्फ उपद्रव से बचने की व्यवस्था हुई। पत्नी मांगती ही नहीं, कभी नहीं मांगती, तब तुम्हारा हृदय प्रफुल्लित होता है। तब तुम कुछ लाना चाहते हो। तब तुम उसे कुछ देना चाहते हो। देना तभी संभव हो पाता है जब कोई न मांगे।
तुम परमात्मा से टूटे हो तुम्हारी मांग के कारण। और तुम्हारी सब प्रार्थनाएं दो, और दो से भरी हैं। तुम परमात्मा का उपयोग एक सेवक की तरह करना चाहते हो। तुम कहते हो, मेरे पैर में दर्द है, दूर करो। तुम कहते हो, आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, ठीक करो। तुम कहते हो, पत्नी बीमार है, स्वस्थ करो। नौकरी खो गयी है, नौकरी दो। तुम परमात्मा के द्वार पर सदा भिखमंगे की तरह पहुंचते हो, मांगते पहुंचते हो। तुम्हारा मांगना ही बताता है कि साहब तुम अपने को समझ रहे हो और परमात्मा को तुम दास समझ रहे हो। वह तुम्हारी जरूरतें पूरी करने के लिए है। और तुम्हारी जरूरतें इतनी महत्वपूर्ण हैं कि तुम परमात्मा को भी सेवा में रत करना चाहते हो।
नहीं, अगर परमात्मा साहब है और तुम गुलाम हो, तो मांग क्या? और मजा यह है कि तुम मांगते हो और वह देता चला जाता है। ऐसा भी नहीं है कि तुम्हारे मांगने से न मिलता हो, मिलता चला जाता है। लेकिन जितना ही तुम पाते हो उतना ही तुम उससे दूर हटते जाते हो। क्योंकि तुम और मांगोगे। जितना मिलेगा और मांगोगे। जितना तुम मांगोगे, दूर हटते जाओगे.
औम सिद्धा.

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