उस परम तत्त्व से प्रेम या भक्ति कैसे की जाए जिसे हम जानते ही नहीं?’
उत्तर दे रहा हुँ
जिसे तुम जानते हो, जिस दिन इससे तुम्हारा प्रेम असफल हो जाएगा–उस दिन। जिस दिन तुम जान लोगे कि यहां प्रेम के तृप्त होने का उपाय ही नहीं है, उस दिन यात्रा शुरू होगी। असली बात तुम्हारे भीतर की प्यास है। अपनी प्यास पहचानो, परमात्मा की फिक्र छोड़ो।
इसलिए तो कुछ ऐसे ज्ञानी हुए जैसे बुद्ध-महावीर, जिन्होंने परमात्मा की बात ही नहीं की। उन्होंने कहा, परमात्मा को क्यों बीच में लाएं? अपनी प्यास है; अपनी प्यास को ही समझने की कोशिश करें; अपनी प्यास में ही उतरें। वे अपनी प्यास में ही उतर गए और उन्होंने परम अवस्था पा ली। परमात्मा मिल गया–परमात्मा की बात किए बिना मिल गया। और जिन्होंने भगवान को नहीं माना, उनको हमने भगवान कहा। बुद्ध को हमने भगवान कहा। महावीर को हमने भगवान कहा। माना नहीं उन्होंने भगवान को। वे बड़े तर्कनिष्ठ लोग थे। उन्होंने कहा, भगवान को तो हम जानते नहीं, उसकी क्या बात करें? हमारे भीतर एक प्यास है, उसका ही हम विश्लेषण करेंगे। अपनी ही प्यास की हम खोज करेंगे। अपनी ही प्यास में गहरे जाएंगे। सीढ़ियां-दर-सीढ़ियां नीचे उतरेंगे। अपनी ही प्यास के कुएं में झांकेंगे। अंततः कहीं न कहीं जल की कोई रेखा होगी।
जिन्होंने ऐसी यात्रा की, वे ध्यानी : उन्होंने ध्यान के माध्यम से परम अवस्था पा ली। वे स्वयं परमात्मा हो गए! जरूरी नहीं कि सभी ऐसी यात्रा करें। जो सरल हृदय हैं, जिनका चित्त अभी बहुत विश्लेषण के रोग से ग्रसित नहीं हुआ है, जिनके पास थोड़ी-सी भाव की संपदा शेष है, वे आंख उठाकर आकाश के अज्ञात में देखना शुरू कर दें। रोएं। गीत गा सकें गीत गाएं। कुछ न बन सके तो रोना तो बन सकता है। रोने के लिए तो कोई कुशलता और कला नहीं चाहिए। उसी रोने में प्रार्थना का जन्म हो जाएगा।
घड़ी भर रोज रो लो। पर्याप्त है। नहा जाओगे उन आंसुओं में; हलके हो जाओगे। और तुम पाओगे कि धीरे-धीरे जिसकी खोज है वह करीब आने लगा.
हम स्वमं कभी एकांत मै बैठकर रोतें है जब भी कुछ एहसास होतो है रो लैता हु.
प्रभु कै लिऐ पुर्ण समाधी प्राप्त होती है शाँती मिलती है.

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