जब तक स्त्री का बच्चा न पैदा हो, तब तक कुछ कमी रहती है, चेहरे पर कुछ
भाव शून्य रहता है। स्त्री अपने परम सौंदर्य को उपलब्ध होती है मां बन कर,
क्योंकि मा बन कर वह स्रष्टा हो जाती है। थोड़ा—सा सृष्टि का रस उस पर भी
बरस जाता है। थोड़ी बदली उस पर भी बरखा कर जाती है। पुरुष भी जब कुछ बना
लेता है तो प्रमुदित होता, आह्रादित होता, आनंदित होता।
कहते हैं, आर्कमिडीज ने जब पहली दफा कोई गणित का सिद्धात खोज लिया तो वह टब में लेटा हुआ था। लेटे—लेटे उसी आराम में उसे सिद्धात समझ में आया, अनुभूति हुई, एक द्वार खुला! वह इतना मस्त हो गया, भागा निकल कर! क्योंकि सम्राट ने उससे कहा था यह सिद्धात खोज लेने को। वह भूल ही गया कि नंगा है। राह में भीड़ इकट्ठी हो गई और वह चिल्ला रहा है :’यूरेका, यूरेका! पा लिया!’ लोगों ने पूछा :’पागल हो गए हो? नंगे हो!’ तब उसे होश आया, भागा घर में। उसने कहा, यह तो मुझे खयाल ही न रहा।
सृजन का आनंद : पा लिया! उस घड़ी आदमी वैसा ही है जैसा परमात्मा—स्व थोड़ी—सी किरण उतरती है!
वैज्ञानिक हो, कवि हो, चित्रकार, मूर्तिकार—जब भी तुम कुछ सृजन कर लेते हो तो एक किरण उतरती है। यह तो एक रास्ता है। इसको मैं काव्य का रास्ता कहता, कला का रास्ता —कहता। परमात्मा के पास जाने का सबसे सुगम रास्ता है कला। मगर पूरा नहीं है यह रास्ता। इससे सिर्फ किरणें हाथ में आती हैं, सूरज कभी हाथ में नहीं आता।
फिर दूसरा रास्ता है ऋषि का। ऋषि परमात्मा को जानता है साक्षी हो कर, कवि जानता है स्रष्टा हो कर। स्रष्टा हम कितने ही बड़े हो जाएं, हमारी सृष्टि छोटी ही रहेगी। क्योंकि सृष्टि के लिए हमें शरीर का उपयोग करना पड़ेगा। इन्हीं हाथों से तो बनाओगे न मूर्ति! ये हाथ ही छोटे हैं। इन हाथों से बनी मूर्ति कितनी सुंदर हो तो भी छोटी रहेगी। इसी मन से तो रचोगे न काव्य! यह मन ही बहुत क्षुद्र है। इस मन से कितना ही सुंदर काव्य रचो, आखिर मन की ही रचना रहेगी। तो थोड़ी—सी किरण तो उतरेगी, लेकिन पूरा परमात्मा नहीं खयाल में आएगा।
साक्षी! साक्षी में न तो शरीर की जरूरत है, न मन की जरूरत है। तो सब सीमाएं छूट गईं—शुद्ध ब्रह्म, जो तुम्हारे भीतर छिपा है, उसका सीधा साक्षात्कार हुआ। उस साक्षात्कार में तुम ईश्वर हो। ईश्वर को पाने का उपाय है : दृश्य की तरह ईश्वर को कभी मत खोजना, अन्यथा भटकते रहोगे। क्योंकि दृश्य ईश्वर बनता ही नहीं। ईश्वर द्रष्टा है।
सबको बनाने वाला, सबको जानने वाला ईश्वर है। यहां दूसरा कोई नहीं है। ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है, वह पुरुष शांत है।’
फिर कैसी अशांति? जब एक ही है, फिर कैसी अशांति? द्वंद्व न रहा, द्वैत न रहा, दुविधा न रही, दुई न रही—फिर कैसी अशांति? कलह करने का उपाय न रहा। तुम ही तुम हो, मैं ही मैं हूं—स्व ही है! एकरस सब हुआ, तो शांति अनायास सिद्ध हो जाती है।
उसकी सब आशाएं जड़ से नष्ट हो गई हैं।’
जिसने ऐसा जाना कि ईश्वर ही है, अब उसकी कोई आशा नहीं, कोई आकांक्षा नहीं। क्योंकि अब अपनी आकांक्षा ईश्वर पर थोपने का क्या प्रयोजन? वह जो करेगा, ठीक ही करेगा। फिर जो हो रहा है ठीक ही हो रहा है। जो है, शुभ है।
जब भी तुम आशा करते हो, उसका अर्थ ही इतना है कि तुमने शिकायत कर दी। जब तुमने कहा कि ऐसा हो, उसका अर्थ ही है कि जैसा हो रहा है उससे तुम राजी नहीं। तुमने कहा, ऐसा हो—उसमें ही तुमने शिकायत कर दी; उसमें ही तुम्हारी प्रार्थना नष्ट हो गई।
प्रार्थना का अर्थ है जैसा है वैसा शुभ; जैसा है वैसा सुंदर; जैसा है वैसा सत्य; इरासे अन्यथा की कोई मांग नहीं। तब तुम्हारे भीतर प्रार्थना है। आस्तिक का अर्थ है जैसा है, उससे मैं रारिपूर्ण हृदय से राजी हूं। मेरा कोई सुझाव नहीं परमात्मा को कि ऐसा हो कि वैसा हो। मेरा सुझाव क्या अर्थ रखता है? क्या मैं परमात्मा से स्वयं को ज्यादा बुद्धिमान मान बैठा हूं। जब एक ही है, तो जो भी हो रहा है ठीक ही हो रहा है। और जब सभी ठीक हो रहा है तो अशांति खो ही जाती है।
अंतर्गलितसर्वाश……।
ऐसे व्यक्ति के भीतर से आशा, निराशा, वासना, आकांक्षा सब गलित हो जाती है, विसर्जित हो जाती है। फिर आसक्ति का भी कोई उपाय नहीं बचता। जब एक ही है, तो कौन करे आसक्ति, किससे करे आसक्ति? जब एक ही है, तो मन के लिए ही ठहरने की जगह नहीं बचती। उस एक में मन ऐसे खो जाता है जैसे धुएं की रेखा आकाश में खो जाती है।
मूल फूल को पूछता रहा : ऊपर कुछ पता चला?
फूल मूल को पूछता रहा : नीचे कुछ सुराग मिला?
लेकिन फूल और मूल एक ही हैं। वह जो नीचे चली गई है जड़ गहरे अंधेरे में पृथ्वी के, गहन गर्भ में, और वह जो फूल आकाश में उठा है और खिला है हवाओं में गंध को बिखेरता, सूरज की किरणों में नाचता——ये दो नहीं हैं।
मैंने सुना है, एक केंचुआ सरक रहा था कीचड़ में। वह अपनी ही पूंछ के पास आ गया, मोहित हो गया। कहा :’प्रिये, बहुत दिन से तलाश में था, अब मिलन हो गया!’ उसकी पूंछ ने कहा : अरे गढ़! मैं तेरी ही पूंछ हूं।’ वह समझा कि कोई स्त्री से मिलन हो गया है। अकेला था, संगी—साथी की
तलाश रही होगी।
मूल फूल को पूछ रहा, फूल मूल को पूछ रहा। दोनों एक हैं। कौन किससे पूछे? कौन किसको उत्तर दे?
विपत्ति और संपत्ति दैवयोग से ही अपने समय पर आती हैं। ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है वह सदा संतुष्ट और स्वस्थेंद्रिय हुआ न इच्छा करता है न शोक करता है।’
आपद: संपद: काले दैवादेवेति निश्चयी।
तृप्त: स्वस्थेद्रियो नित्यं न वांछति न शोचति।
काले आपक च लपक….,।
समय पर सब होता है। समय पर जन्म, समय पर मृत्यु; समय पर सफलता, समय पर असफलता—समय पर सब होता है। कुछ भी समय के पहले नहीं होता है। ऐसा जो जानता है कि विपत्ति और संपत्ति दैवयोग से समय आने पर घटती हैं, वह सदा संतुष्ट है। फिर जल्दी नहीं, फिर अधैर्य नहीं। जब समय होगा, फसल पकेगी, काट लेंगे। जब सुबह होगा, सूरज निकलेगा, तो सूरज के दर्शन करेंगे, धूप सेंक लेंगे। जब रात होगी, विश्राम करेंगे, आराम करेंगे; सब छोड़—छाड़, डूब जाएंगे निद्रा में। सब अपने से हो रहा है और सब अपने समय पर हो रहा है। अशांति तब पैदा होती है जब हम समय के पहले कुछ मांगने लगते हैं; हम कहते हैं, जल्दी हो जाए।
इसलिए तुम देखते हो, पश्चिम में लोग ज्यादा अशांत हैं, पूरब में कम! हालांकि पूरब में होने चाहिए ज्यादा, क्योंकि दुख यहां ज्यादा, धन की यहां कमी, भूख यहां, अकाल यहां, हजार—हजार बीमारियां यहां, सब तरह की पीड़ाएं यहां। पश्चिम में सब सुविधाएं, सब सुख, वैज्ञानिक, तकनीकी विकास—फिर भी पश्चिम में लोग दुखी; पूरब में लोग सुखी न हों, पर दुखी नहीं। मामला क्या है? एक बात पूरब ने समझ ली, एक बात पूरब को समझ में आ गई है कि सब होता, अपने समय पर होता; हमारे किए क्या होगा? तो पूरब में एक प्रतीक्षा है, एक धैर्यपूर्ण प्रतीक्षा है—इसलिए तनाव नहीं।
फिर पश्चिम में धारणा है कि एक ही जन्म है। यह सत्तर—अस्सी साल का जन्म, फिर गए सो गए! तो जल्दबाजी भी है, सत्तर—अस्सी साल में सब कुछ कर लेना है। इसमें आधी जिंदगी तो ऐसे सोने में, खाने—पीने में बीत जाती है, नौकरी करने, कमाने में बीत जाती है। ऐसे मुश्किल से थोड़े—से दिन बचते हैं भोगने को, तो भोग लो। गहरी आतुरता है, हाथ कहीं खाली न रह जाएं! समय बीता जाता, समय की धार भागी चली जा रही—तो भागो, तेजी करो, जल्दी करो! और कितनी ही जल्दी करो, कुछ खास परिणाम नहीं होता। जल्दी करने से और देरी हो जाती
साक्षी बनो, कर्ता होना छोड़ो। कर्ता होने से ही सारा उपद्रव है। पूरब का सारा संदेश एक छोटे—से शब्द में आ जाता है : साक्षी बनो!
मेरा जीवन सबका साखी।
कितनी बार दिवस बीता है,
कितनी बार निशा बीती है।
कितनी बार तिमिर जीता है,
कितनी बार ज्योति जीती है।
मेरा जीवन सबका साखी।
कितनी बार सृष्टि जागी है
कितनी बार प्रलय सोया है।
कितनी बार हंसा है जीवन
कितनी बार विवश रोया है।
मेरा जीवन सबका साखी।
देखते चलो। रमो मत किसी में, रुको मत कहीं, अटको मत कहीं। देखते चलो। जो आए—कोई भाव मत बनाओ; बुरा— भला मत सोचो। जो आए जैसा आए, जो लहर उठे—देखते चलो। और धीरे—धीरे तुम पाओगे : देखने वाला ही शेष रह गया, सब लहरें चली गईं, सलिल शांत हुआ। उस परम शांति के क्षण में सत्य का साक्षात्कार है।
काले आपद: च लपक,
जब आता समय, होतीं घटनाएं।
दैवात् एव…।
ऐसा प्रभु—मर्जी से!
इति निश्चयी…..।
ऐसा जिसने जाना अनुभव से।
नित्यम् तृप:।
सदा तृप्त है।
नित्यम् तृप्त:! स्वाद लो इस शब्द का नित्यम् तृप्त:! चबाओ इसे, गलाओ इसे! उतर जाने दो हृदय तक! नित्यम् तृप्त:। वह सदा तृप्त है। ऐसा व्यक्ति अतृप्ति जानता ही नहीं। अतृप्ति पैदा होती है—आकांक्षा से। तुम करते आकांक्षा, फिर वैसा नहीं होता तो अतृप्ति पैदा होती है। न करो आकांक्षा, न होगी अतृप्ति। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी.
औम सिद्धा.
कहते हैं, आर्कमिडीज ने जब पहली दफा कोई गणित का सिद्धात खोज लिया तो वह टब में लेटा हुआ था। लेटे—लेटे उसी आराम में उसे सिद्धात समझ में आया, अनुभूति हुई, एक द्वार खुला! वह इतना मस्त हो गया, भागा निकल कर! क्योंकि सम्राट ने उससे कहा था यह सिद्धात खोज लेने को। वह भूल ही गया कि नंगा है। राह में भीड़ इकट्ठी हो गई और वह चिल्ला रहा है :’यूरेका, यूरेका! पा लिया!’ लोगों ने पूछा :’पागल हो गए हो? नंगे हो!’ तब उसे होश आया, भागा घर में। उसने कहा, यह तो मुझे खयाल ही न रहा।
सृजन का आनंद : पा लिया! उस घड़ी आदमी वैसा ही है जैसा परमात्मा—स्व थोड़ी—सी किरण उतरती है!
वैज्ञानिक हो, कवि हो, चित्रकार, मूर्तिकार—जब भी तुम कुछ सृजन कर लेते हो तो एक किरण उतरती है। यह तो एक रास्ता है। इसको मैं काव्य का रास्ता कहता, कला का रास्ता —कहता। परमात्मा के पास जाने का सबसे सुगम रास्ता है कला। मगर पूरा नहीं है यह रास्ता। इससे सिर्फ किरणें हाथ में आती हैं, सूरज कभी हाथ में नहीं आता।
फिर दूसरा रास्ता है ऋषि का। ऋषि परमात्मा को जानता है साक्षी हो कर, कवि जानता है स्रष्टा हो कर। स्रष्टा हम कितने ही बड़े हो जाएं, हमारी सृष्टि छोटी ही रहेगी। क्योंकि सृष्टि के लिए हमें शरीर का उपयोग करना पड़ेगा। इन्हीं हाथों से तो बनाओगे न मूर्ति! ये हाथ ही छोटे हैं। इन हाथों से बनी मूर्ति कितनी सुंदर हो तो भी छोटी रहेगी। इसी मन से तो रचोगे न काव्य! यह मन ही बहुत क्षुद्र है। इस मन से कितना ही सुंदर काव्य रचो, आखिर मन की ही रचना रहेगी। तो थोड़ी—सी किरण तो उतरेगी, लेकिन पूरा परमात्मा नहीं खयाल में आएगा।
साक्षी! साक्षी में न तो शरीर की जरूरत है, न मन की जरूरत है। तो सब सीमाएं छूट गईं—शुद्ध ब्रह्म, जो तुम्हारे भीतर छिपा है, उसका सीधा साक्षात्कार हुआ। उस साक्षात्कार में तुम ईश्वर हो। ईश्वर को पाने का उपाय है : दृश्य की तरह ईश्वर को कभी मत खोजना, अन्यथा भटकते रहोगे। क्योंकि दृश्य ईश्वर बनता ही नहीं। ईश्वर द्रष्टा है।
सबको बनाने वाला, सबको जानने वाला ईश्वर है। यहां दूसरा कोई नहीं है। ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है, वह पुरुष शांत है।’
फिर कैसी अशांति? जब एक ही है, फिर कैसी अशांति? द्वंद्व न रहा, द्वैत न रहा, दुविधा न रही, दुई न रही—फिर कैसी अशांति? कलह करने का उपाय न रहा। तुम ही तुम हो, मैं ही मैं हूं—स्व ही है! एकरस सब हुआ, तो शांति अनायास सिद्ध हो जाती है।
उसकी सब आशाएं जड़ से नष्ट हो गई हैं।’
जिसने ऐसा जाना कि ईश्वर ही है, अब उसकी कोई आशा नहीं, कोई आकांक्षा नहीं। क्योंकि अब अपनी आकांक्षा ईश्वर पर थोपने का क्या प्रयोजन? वह जो करेगा, ठीक ही करेगा। फिर जो हो रहा है ठीक ही हो रहा है। जो है, शुभ है।
जब भी तुम आशा करते हो, उसका अर्थ ही इतना है कि तुमने शिकायत कर दी। जब तुमने कहा कि ऐसा हो, उसका अर्थ ही है कि जैसा हो रहा है उससे तुम राजी नहीं। तुमने कहा, ऐसा हो—उसमें ही तुमने शिकायत कर दी; उसमें ही तुम्हारी प्रार्थना नष्ट हो गई।
प्रार्थना का अर्थ है जैसा है वैसा शुभ; जैसा है वैसा सुंदर; जैसा है वैसा सत्य; इरासे अन्यथा की कोई मांग नहीं। तब तुम्हारे भीतर प्रार्थना है। आस्तिक का अर्थ है जैसा है, उससे मैं रारिपूर्ण हृदय से राजी हूं। मेरा कोई सुझाव नहीं परमात्मा को कि ऐसा हो कि वैसा हो। मेरा सुझाव क्या अर्थ रखता है? क्या मैं परमात्मा से स्वयं को ज्यादा बुद्धिमान मान बैठा हूं। जब एक ही है, तो जो भी हो रहा है ठीक ही हो रहा है। और जब सभी ठीक हो रहा है तो अशांति खो ही जाती है।
अंतर्गलितसर्वाश……।
ऐसे व्यक्ति के भीतर से आशा, निराशा, वासना, आकांक्षा सब गलित हो जाती है, विसर्जित हो जाती है। फिर आसक्ति का भी कोई उपाय नहीं बचता। जब एक ही है, तो कौन करे आसक्ति, किससे करे आसक्ति? जब एक ही है, तो मन के लिए ही ठहरने की जगह नहीं बचती। उस एक में मन ऐसे खो जाता है जैसे धुएं की रेखा आकाश में खो जाती है।
मूल फूल को पूछता रहा : ऊपर कुछ पता चला?
फूल मूल को पूछता रहा : नीचे कुछ सुराग मिला?
लेकिन फूल और मूल एक ही हैं। वह जो नीचे चली गई है जड़ गहरे अंधेरे में पृथ्वी के, गहन गर्भ में, और वह जो फूल आकाश में उठा है और खिला है हवाओं में गंध को बिखेरता, सूरज की किरणों में नाचता——ये दो नहीं हैं।
मैंने सुना है, एक केंचुआ सरक रहा था कीचड़ में। वह अपनी ही पूंछ के पास आ गया, मोहित हो गया। कहा :’प्रिये, बहुत दिन से तलाश में था, अब मिलन हो गया!’ उसकी पूंछ ने कहा : अरे गढ़! मैं तेरी ही पूंछ हूं।’ वह समझा कि कोई स्त्री से मिलन हो गया है। अकेला था, संगी—साथी की
तलाश रही होगी।
मूल फूल को पूछ रहा, फूल मूल को पूछ रहा। दोनों एक हैं। कौन किससे पूछे? कौन किसको उत्तर दे?
विपत्ति और संपत्ति दैवयोग से ही अपने समय पर आती हैं। ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है वह सदा संतुष्ट और स्वस्थेंद्रिय हुआ न इच्छा करता है न शोक करता है।’
आपद: संपद: काले दैवादेवेति निश्चयी।
तृप्त: स्वस्थेद्रियो नित्यं न वांछति न शोचति।
काले आपक च लपक….,।
समय पर सब होता है। समय पर जन्म, समय पर मृत्यु; समय पर सफलता, समय पर असफलता—समय पर सब होता है। कुछ भी समय के पहले नहीं होता है। ऐसा जो जानता है कि विपत्ति और संपत्ति दैवयोग से समय आने पर घटती हैं, वह सदा संतुष्ट है। फिर जल्दी नहीं, फिर अधैर्य नहीं। जब समय होगा, फसल पकेगी, काट लेंगे। जब सुबह होगा, सूरज निकलेगा, तो सूरज के दर्शन करेंगे, धूप सेंक लेंगे। जब रात होगी, विश्राम करेंगे, आराम करेंगे; सब छोड़—छाड़, डूब जाएंगे निद्रा में। सब अपने से हो रहा है और सब अपने समय पर हो रहा है। अशांति तब पैदा होती है जब हम समय के पहले कुछ मांगने लगते हैं; हम कहते हैं, जल्दी हो जाए।
इसलिए तुम देखते हो, पश्चिम में लोग ज्यादा अशांत हैं, पूरब में कम! हालांकि पूरब में होने चाहिए ज्यादा, क्योंकि दुख यहां ज्यादा, धन की यहां कमी, भूख यहां, अकाल यहां, हजार—हजार बीमारियां यहां, सब तरह की पीड़ाएं यहां। पश्चिम में सब सुविधाएं, सब सुख, वैज्ञानिक, तकनीकी विकास—फिर भी पश्चिम में लोग दुखी; पूरब में लोग सुखी न हों, पर दुखी नहीं। मामला क्या है? एक बात पूरब ने समझ ली, एक बात पूरब को समझ में आ गई है कि सब होता, अपने समय पर होता; हमारे किए क्या होगा? तो पूरब में एक प्रतीक्षा है, एक धैर्यपूर्ण प्रतीक्षा है—इसलिए तनाव नहीं।
फिर पश्चिम में धारणा है कि एक ही जन्म है। यह सत्तर—अस्सी साल का जन्म, फिर गए सो गए! तो जल्दबाजी भी है, सत्तर—अस्सी साल में सब कुछ कर लेना है। इसमें आधी जिंदगी तो ऐसे सोने में, खाने—पीने में बीत जाती है, नौकरी करने, कमाने में बीत जाती है। ऐसे मुश्किल से थोड़े—से दिन बचते हैं भोगने को, तो भोग लो। गहरी आतुरता है, हाथ कहीं खाली न रह जाएं! समय बीता जाता, समय की धार भागी चली जा रही—तो भागो, तेजी करो, जल्दी करो! और कितनी ही जल्दी करो, कुछ खास परिणाम नहीं होता। जल्दी करने से और देरी हो जाती
साक्षी बनो, कर्ता होना छोड़ो। कर्ता होने से ही सारा उपद्रव है। पूरब का सारा संदेश एक छोटे—से शब्द में आ जाता है : साक्षी बनो!
मेरा जीवन सबका साखी।
कितनी बार दिवस बीता है,
कितनी बार निशा बीती है।
कितनी बार तिमिर जीता है,
कितनी बार ज्योति जीती है।
मेरा जीवन सबका साखी।
कितनी बार सृष्टि जागी है
कितनी बार प्रलय सोया है।
कितनी बार हंसा है जीवन
कितनी बार विवश रोया है।
मेरा जीवन सबका साखी।
देखते चलो। रमो मत किसी में, रुको मत कहीं, अटको मत कहीं। देखते चलो। जो आए—कोई भाव मत बनाओ; बुरा— भला मत सोचो। जो आए जैसा आए, जो लहर उठे—देखते चलो। और धीरे—धीरे तुम पाओगे : देखने वाला ही शेष रह गया, सब लहरें चली गईं, सलिल शांत हुआ। उस परम शांति के क्षण में सत्य का साक्षात्कार है।
काले आपद: च लपक,
जब आता समय, होतीं घटनाएं।
दैवात् एव…।
ऐसा प्रभु—मर्जी से!
इति निश्चयी…..।
ऐसा जिसने जाना अनुभव से।
नित्यम् तृप:।
सदा तृप्त है।
नित्यम् तृप्त:! स्वाद लो इस शब्द का नित्यम् तृप्त:! चबाओ इसे, गलाओ इसे! उतर जाने दो हृदय तक! नित्यम् तृप्त:। वह सदा तृप्त है। ऐसा व्यक्ति अतृप्ति जानता ही नहीं। अतृप्ति पैदा होती है—आकांक्षा से। तुम करते आकांक्षा, फिर वैसा नहीं होता तो अतृप्ति पैदा होती है। न करो आकांक्षा, न होगी अतृप्ति। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी.
औम सिद्धा.

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