समस्त सृष्टि का कारण एवं आधार एक ही चेतन सत्ता है जिसे भारतीय अध्यात्म
ने ब्रह्म कहा है । इस ब्रह्म का स्वरुप है ' सत्यं ग्यानमनंत' यह ब्रह्म
सत्य है, शाश्वत है, ग्यान स्वरुप है एवं अनंत स्वरुप है । सृष्टि के समस्त
स्वरुप इसी के स्वरुप हैँ । ब्रह्म से भिन्न कुछ भी नहीँ है । समस्त
प्राणी जगत के भीतर वही चेतन तत्त्व ब्रह्म विद्यमान है । जिसे आत्मा कहा
जाता है ।देह, इंद्रियोँ के संयोग वाला यह आत्मा ही जीव है । इस जीव और
ब्रह्म का अभेद संबंध है जिसे गुरु आत्म ग्यानी शिष्य को उपदेशित
करता है ' अयमात्मा ब्रह्म' (यह आत्मा ब्रह्म है), तत्त्वमसि(वह तू ही है)
वह-अर्थात् ईश्वर या ब्रह्म, तू अर्थात जीव या आत्मा, असि- है । ये
महावाक्य हैँ जो जीव और ब्रह्म की अभेदता का बोध कराते हैँ । शिष्य को इनका
बोध हो जाने पर वह कहता है' अहम् ब्रह्मास्मि' । ब्रह्म सर्वग्य है एवं
जीव एकदेशीय एवं अल्पग्य है । इस अल्पग्य स्वरुप मेँ जो चेतन तत्त्व आत्मा
है वही ईश्वर है । दोनोँ का अभेद संबंध केवल चेतन मेँ होता है ।इस अभेदता
को जिसने जान लिया वही मुक्त है । उसे मुक्ति की न साधना करनी पडती है न
उसकी चिन्ता ही । यही ग्यान की परम स्थिति है "ॐ"

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