Saturday, May 23, 2015

परमात्मा है

एक तो तुम उसे भाओगे तभी, जब तुम उसके विरोध में नहीं खड़े हो। तुम उसे भाओगे तभी, जब तुमने सब भांति अपने को उसमें लीन कर दिया है। तुम उसे भाओगे तभी, जब तुम्हारा कर्ता-भाव मिट गया है। परमात्मा कर्ता है, तुम निमित्त हो। बस! तुम भा जाओगे।
लेकिन अभी तो तुम्हारे भीतर धुन बजती है कि मैं कर्ता हूं। पूजा भी करते हो तो भी कर्ता तुम ही रहते हो। तीर्थों में स्नान करते हो तो भी कर्ता तुम ही रहते हो। दान करते हो तो भी कर्ता तुम ही रहते हो। सब व्यर्थ हुआ। स्नान भी व्यर्थ गया, दान भी व्यर्थ गया, पूजा बेकार हुई। क्योंकि कर्ता का भाव! अभी तुम सोचते हो, मेरा है।
धार्मिक व्यक्ति में और अधार्मिक व्यक्ति में एक ही अंतर है। धार्मिक व्यक्ति के लिए कर्ता परमात्मा है, अधार्मिक व्यक्ति के लिए कर्ता वह स्वयं है। मेरे किए कुछ हो सकता है, यह भाव ही अधर्म है। उसके किए ही सब हो रहा है, यह भाव धर्म है। तुम उसे प्यारे हो जाओगे।
तुम अपने ही हाथ से उसकी तरफ पीठ किए खड़े हो। तुम्हारा कर्तापन ही तुम पीठ किए हो। जैसे ही तुम कर्तापन छोड़ोगे, सन्मुख हो जाओगे। विमुखता मिट जाएगी।
तुमने किया क्या है? न जन्म तुम्हारा, न जीवन तुम्हारा, न मृत्यु तुम्हारी; सब वही कर रहा है। लेकिन बीच के अंतराल में तुम अपने कर्ता होने का भाव जुटा लेते हो। और वह जो कर्ता का भाव है फिर वह पाप करे तो भी पाप, पुण्य करे तो भी पाप। इसे खयाल में ले लेना।
तुम सोचते हो पाप करना पाप है और पुण्य करना पुण्य है। तुम गलती में हो। कर्ता होना पाप है, अकर्ता होना पुण्य है। अगर पुण्य करते वक्त भी तुम कहते हो, मैंने किया–मंदिर बनाए, पूजा की, इतने व्रत-उपवास किए, इतनी बार तीर्थ गया, काशी गया, हज गया, हाजी हुआ–यह तुम जितना कहोगे, मैंने किया, सब पाप हो गया। इसलिए पाप का संबंध कर्म से नहीं, भाव से है। तुम अगर अकर्ता-भाव से कर सको तो इस जगत में कोई भी पाप नहीं है। अगर तुम कर्ता-भाव से करो तो इस जगत में सभी कुछ पाप है।
कृष्ण अर्जुन को गीता में यही कह रहे हैं कि तू कर्ता-भाव छोड़ दे और वह जो करवा रहा है, वही कर। उसकी जो मर्जी वह होने दे। तू बीच में मत आ। तू अपनी तरफ से चुनाव मत कर। तू विचार मत कर कि क्या ठीक है और क्या गलत है। तू जानेगा भी कैसे कि क्या ठीक है और क्या गलत है? तेरे देखने की सीमा कितनी? तेरी समझ कितनी? तेरा अनुभव कितना? तेरा होश कितना? तू इस छोटे से दीए से देखने की कोशिश मत कर, इसकी रोशनी चार फीट से ज्यादा दूर नहीं पड़ती। और जीवन का विस्तार अनंत है। वह तुझसे जो करवा रहा है तू कर। तू बीच में मत खड़ा हो। तू सिर्फ माध्यम बन जा। जैसे बांसुरी से कोई गीत गाए और बांसुरी केवल राह दे, ऐसी तू राह दे। निमित्त हो जा।
जो निमित्त हो गया वह उसका प्यारा हो गया। जो कर्ता बना रहा वह दुश्मन बना रहा। उसका प्रेम तो फिर भी बरसता रहेगा, क्योंकि उसका प्रेम बेशर्त है। तुम क्या हो, इससे कोई संबंध नहीं। लेकिन तुम ही उसे पाने में असमर्थ हो जाओगे। जैसे घड़ा सीधा रखा हो और वर्षा हो रही हो तो भर जाएगा। वर्षा तो होती ही रहेगी, घड़ा उलटा रखा है तो खाली रह जाएगा। वर्षा तो उलटे घड़े पर भी होती रहेगी, क्योंकि वर्षा तो बेशर्त है। उसका प्रेम किसी शर्त से बंधा नहीं है कि तुम ऐसे हो जाओ तो मैं प्रेम करूंगा।
इसे भी समझ लेना। नानक का यह वचन सुनकर कई लोगों को लगेगा कि मैं ऐसा हो जाऊं तो वह मुझे प्रेम करेगा। नहीं, उसका प्रेम तो बरस ही रहा है। अगर उसके प्रेम में भी शर्त हो तो मनुष्य और परमात्मा के प्रेम में कोई अंतर न रह जाए। यही तो मनुष्य के प्रेम की पीड़ा है कि हम कहते हैं, तुम ऐसा करोगे तो मैं प्रेम करूंगा, तुम ऐसे होओगे तो मैं प्रेम करूंगा। मेरी शर्तें पूरी करोगे तो मैं प्रेम करूंगा, अन्यथा मैं प्रेम खींच लूंगा। बाप बेटे से यही कह रहा है, पत्नी पति से यही कह रही है, मित्र मित्र से यही कह रहा है कि तुम ऐसा करो। अगर तुम ऐसा किए तो मुझे जंचोगे।
इस कारण, इस प्रेम के अनुभव के कारण, तुम यह मत सोच लेना कि नानक यह कह रहे हैं कि परमात्मा तुम्हें तब प्रेम करेगा जब तुम कुछ शर्तें पूरी करोगे। नहीं, उसका प्रेम तो बरस रहा है। शर्तें पूरी करोगे तो तुम सीधे घड़े की भांति हो जाओगे। उसकी वर्षा हो रही है, भर जाएगी। तुम लबालब हो जाओगे। तुम बहने लगोगे भर कर। न केवल उसका प्रेम तुम्हें मिलेगा, तुमसे औरों को भी मिलने लगेगा।
गुरु हम उसी को कहते हैं कि जिसका घड़ा इतना भर गया परमात्मा के प्रेम से कि अब समाता नहीं। वही औरों के घड़ों पर भी बहने लगा। गुरु का मतलब ही इतना है कि जिसकी अपनी जरूरत पूरी हो गई। जिसकी चाह बुझ गई। जिसकी तृष्णा शांत हो गई। जिसका घड़ा इतना भर गया कि अब वह देने में समर्थ है। अब वह न दे तो क्या करे? जैसे बादल जब भर जाए पानी से तो बरसेगा, हलका होगा। जब फूल भर जाए गंध से तो गंध बिखरेगी।
ऐसे ही जब तुम्हारा घड़ा भर जाएगा उसके प्रेम से, तुम्हारे चारों तरफ बंटने लगेगा, बहेगा। और उसकी वर्षा का तो कोई अंत नहीं। एक बार तुम्हें पता चल जाए कि सीधे होने से भरना शुरू हो जाता है, वह वर्षा तो होती ही रहती है, तुम कितना ही उलीचो। हजार हाथ से उलीचो तो भी उलीच न पाओगे। तो यह खयाल रखना कि नानक जब यह कह रहे हैं, तो उनका प्रयोजन तुमसे है।
‘यदि मैं उसको भा गया, तो मैंने तीर्थों में स्नान कर लिया।’
उसको तो तुम भाए ही हुए हो, अन्यथा तुम होते कैसे? अगर वह एक क्षण को भी न चाहता तुम्हारा होना, तो तुम तिरोहित हो जाते। तुम्हारी श्वास-श्वास में वही है। तुम्हारी हर धड़कन में वही है। अस्तित्व ने तुम्हें चाहा है। अस्तित्व ने तुम्हें प्यार किया है। अस्तित्व ने तुम्हें बनाया है। तुम कैसे हो, इसकी फिक्र नहीं है, अस्तित्व तुम्हें अभी भी जीवन दे रहा है। उसे तुम तो भाए ही हुए हो। लेकिन तुम उलटे खड़े हो। तुम पीठ किए हो। तुम उसके प्रेम से भी डरे हो। तुम उससे भागे हुए हो। वह तुम्हें भरना चाहता है, तुम बचना चाहते हो।
इसलिए जब नानक कहते हैं, यदि मैं उसको भा गया, तो अर्थ है–जब मैं सीधा हुआ, सन्मुख हुआ। जब मैंने भय छोड़ा.
औम सिद्धा.

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प्रभु को दर्सन को लागि तल कीलिक गरि हेर्नु होला