Saturday, May 23, 2015

परमात्मा

करम खंड की वाणी जोरु। तिथै होरु न कोई होरु।।
तिथै जोध महाबल सूर। तिन महि राम रहिआ भरपूर।।
तिथै सीतो सीता महिमा माहि। ताके रूप न कथने जाहि।।
न ओहि मरहि न ठागे जाहि। जिनकै राम बसै मन माहि।।
तिथै भगत वसहि के लोअ। करहि अनंदु सचा मनि सोइ।।
सच खंडि वसै निरंकारु। करि करि वेखै नदरि निहाल।।
तिथै खंड मंडल बरमंड। जे को कथै त अंत न अंत।।
तिथै लोअ लोअ आकार। जिव जिव हुकमु तिवै तिव कार।।
वेखै विगसे करि वीचारु। ‘नानक’ कथना करड़ा सारु।।
मनुष्य असहाय है। लेकिन तभी तक, जब तक परमात्मा से दूर है। मनुष्य दुर्बल है, दरिद्र है, दीन है, लेकिन तभी तक, जब तक परमात्मा से दूर है। उससे हमारी दूरी ही हमारी दरिद्रता है। और जितने हम उससे दूर होते जाते हैं, उतना ही जीवन अर्थहीन होता जाता है.
ऐसा लगेगा ही। ऐसी प्रतीति होगी। तुम अपने ही जीवन को देखो, शोरगुल बहुत है। बड़े काम में तुम संलग्न हो। चल ही नहीं रहे, दौड़ रहे हो। लेकिन कभी पूछा अपने से, कहां पहुंच रहे हो? दौड़-दौड़ कर भी वहीं खड़े हो जहां जन्म के बाद तुमने अपने को पाया था। रत्ती भर तो उपलब्धि नहीं हुई। पाया क्या है? अगर हाथ देखोगे तो खाली है। तिजोड़ी भर गयी हो भला। लेकिन तिजोड़ी यहीं पड़ी रह जाएगी। तुम खाली हो। और तुम जितने भी भरेपन के सपने देख रहे हो, उनमें सच्चाई जरा भी नहीं है।
तुम कितना ही इकट्ठा कर लो संसार का, लेकिन मरते क्षण संसार छूट जाएगा। और जो छूट ही जाना है, वह तुम्हारा हो कर भी तुम्हारा नहीं हो पाता। जिन्होंने इस जगत की संपदा को अपना आधार बनाया उन्होंने रेत पर महल खड़े किए हैं, वे गिरेंगे। और तुम कितनी देर अपने को धोखा दे पाओगे? कभी तो जागोगे, कभी तो होश आएगा, कभी तो तुम विचार करोगे कि चला इतना, पहुंचा कहीं भी नहीं। तुम्हारी अवस्था कोल्हू के बैल जैसी है। चलता बहुत है। चलता ही रहता है। दिन-भर शोरगुल भी बहुत होता है उसके आसपास। क्योंकि तेल पिरता है, घानी चलती है। पहुंचता कहां है? सांझ वहीं पाता है जहां सुबह अपने को पाया था। फिर कल सुबह वहीं से यात्रा होगी।
तुम्हारा जीवन भी कोल्हू के बैल जैसा है। तुम कितना ही सजाओ, तुम कितना ही छिपाओ, तुम कितने ही ऊपर से रंग-रोगन करो, भीतर तुम्हें भी पता है कि भिखारी का पात्र है तुम्हारा हृदय। मांगता है और खाली है। और भरता कभी भी नहीं। जितना दूर आदमी होता जाता है परमात्मा से, उतना ही दरिद्र होता जाता है। स्वामित्व तो उसके साथ है।
और हम केवल दूर ही होते तो भी ठीक था, हम उसके विपरीत हैं। दूर होना भी इतना बुरा नहीं जितना विपरीत होना है। हम जो भी कर रहे हैं, उससे विपरीत है। दूर हो कर भी अगर हम उसके साथ हों, तो तत्क्षण क्रांति हो जाए।
जैसे कोई आदमी नदी में उलटी धार में बह रहा हो, स्रोत की तरफ तैरने की कोशिश कर रहा हो–लड़ रहा है; नदी से दूर ही नहीं है, दुश्मन है। और मजा यह है कि तुम जितना लड़ोगे, उतना ही तुम पाओगे कि नदी तुम्हारी दुश्मन है। नदी को क्या लेना-देना? तुम पहुंचो या न पहुंचो, नदी को क्या प्रयोजन है? नदी दुश्मन नहीं है। नदी तो अपनी धार में बही जा रही है, अपनी मस्ती में। उसे अपना सागर खोजना है। तुम उससे उलटे बह रहे हो। तुम्हारे कारण ही नदी तुम्हें दुश्मन मालूम होती है। तुम्हारे कारण ही तुम्हें संसार में सब तरफ शत्रु दिखायी पड़ते हैं। और जीने का मौका कहां मिले? शत्रुओं से सुरक्षा करने में ही समय व्यतीत हो जाता है। कैसे अपने को बचाएं, इसी में अवसर खो जाता है।
परमात्मा से दूर तो जीवन अर्थहीन होगा ही। परमात्मा से विपरीत न केवल अर्थहीन होगा, बल्कि एक दुःस्वप्न भी होगा। दूर, सपना होगा; विपरीत, दुख का सपना हो जाएगा। और तुम जिसे जीवन कहते हो, वह एक नाइटमेयर है, एक दुःस्वप्न है।
तुमने कभी दुःस्वप्न का विचार किया? दुःस्वप्न का अर्थ होता है, तुम जागना चाहते हो, जाग नहीं सकते। दुःस्वप्न का अर्थ होता है, छाती पर कोई चढ़ा है। तुम हटाना चाहते हो, लेकिन हाथ नहीं हिलते। तुम उसे हटाना चाहते हो, लेकिन कोई शक्ति नहीं है। सब शक्ति खो गई। तुम पाते हो कि कोई तुम्हें पहाड़ों से गिरा रहा है। लेकिन तुम्हारे पास कुछ भी उपाय नहीं कि तुम अपने को बचा सको। तुम आंख खोलना चाहते हो और आंख नहीं खुलती है। तुम हाथ हिलाना चाहते हो कि रोक दो, लेकिन हाथ नहीं उठता है। तुम चीखना चाहते हो और कंठ से आवाज नहीं निकलती है। ऐसी जो स्वप्न की दशा है, वह दुःस्वप्न है, नाइटमेयर है।
परमात्मा से दूर जो है, वह सपने में है; विपरीत जो है, वह दुख के सपने में है। तुम अपने जीवन को देखोगे, तो ऐसा ही पाओगे। न आंख खोले खुलती है, न हाथ हिलाए हिलता है, न छाती से वजन हटता है। और फिर भी जी रहे हो। तो फिर तुम्हारा जीवन सिवाय संताप के और कुछ भी नहीं हो सकता।
कहते हैं कि जीवन संताप है, एंग्विश है। इसमें चिंता से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है। यह बात बहुत दूर तक सच है। जैसा तुम्हारा जीवन है, अगर उसका ही अध्ययन किया जाए तो जीवन एक संताप है।
लेकिन एक और जीवन भी हमने जाना है, नानक का, कबीर का, बुद्ध का, कृष्ण का, क्राइस्ट का। हमसे बिलकुल विपरीत। जहां हम संताप से दबे हैं, वहां उनके जीवन में एक नृत्य है। और जहां हमारे भीतर सिवाय दुख के और कुछ भी नहीं गूंजता, वहां उनके जीवन में एक संगीत है, एक नाद है। जहां हम ऐसे चलते हैं जैसे पैरों में भयंकर भारी जंजीरें बंधी हों, वहां उनके पैरों में नृत्य है और पुलक है। जहां हमें देख कर ऐसा लगता है कि होना एक महापाप का फल है, वहां उन्हें देख कर लगता है कि होना एक आशीर्वाद है।
एक और भी ढंग है जीने का। उस ढंग की कुंजी है, ईश्वर से दूर नहीं, ईश्वर के पास। और ईश्वर के विपरीत नहीं, ईश्वर के अनुकूल। जो धर्म के अनुकूल बहने लगता है, उसके जीवन में रूपांतरण हो जाता है। जरूरत भी नहीं है कि तुम विपरीत लड़ो। लेकिन अहंकार लड़ाता है। क्योंकि अहंकार मानता है, जितना तुम जीतोगे उतने ही तुम बड़े हो जाओगे।
और मजा यही है कि हो उलटा रहा है। जितने तुम जीतते हो उतने तुम छोटे होते जाते हो। गरीब आदमी के पास तुम बड़ा हृदय भी पा लो, अमीर आदमी के पास उतना बड़ा हृदय भी नहीं रह जाता। और छोटा हो गया है। दरिद्र दान भी दे दे, अमीर की देने की हिम्मत ही खो जाती है। गरीब थोड़ा प्रेम भी कर ले, अमीरों के जीवन से प्रेम की धुन भी खो जाती है। प्रार्थना तो बहुत दूर, परमात्मा तो बहुत दूर, साधारण प्राकृतिक प्रेम की धुन भी खो जाती है।
जितना तुम इस संसार में इकट्ठा करते हो, लगता है उतने ही सिकुड़ते जाते हो, छोटे होते जाते हो। यह बड़ा विरोधाभास है। जितना तुम्हारे पास होता है, उतने ही तुम छोटे होते हो। तुम्हारे भीतर का आकाश सिकुड़ जाता है। और जो तुम्हारे पास है, तुम उसी के लिए डरे होते हो। तुम उसी से परेशान होते हो।
नानक कहते हैं कि शक्ति का सूत्र है, उसकी कृपा। और उसकी कृपा तब उपलब्ध होती है, जब तुम अपने को बिलकुल असहाय समझ लेते हो। बिलकुल! टोटल! रत्ती भर भी चालाकी वहां न चलेगी। तुम ऐसा ऊपर-ऊपर से कहो कि मैं असहाय हूं, इससे कुछ न होगा।
यह प्रतीति गहरे में प्रविष्ट हो जाए। यह प्रतीति तुम्हारे हृदय के गहनतम में पहुंच जाए। यह प्रतीति तुम्हारे रोएं-रोएं में गूंजे। यह ओंठों की प्रार्थना न हो, यह कंठ का उदगार न हो, यह हृदय की प्रतीति हो। यह तुम्हारे आंसुओं से जाहिर हो। यह तुम्हारे शब्द-शब्द में समा जाए, यह तुम्हारे निःशब्द में भी गूंजती रहे। तुम उठो, बैठो, और तुम ऐसे जैसे कि तुम परम असहाय हो।
तुम कर क्या सकते हो? तुम्हारा किया कुछ भी तो नहीं होता। तुम्हारे किए अनकिया ही होता है। तुम जो करते हो, उससे जो नहीं घटना चाहिए, वही घटता है। तुम्हारे किए कुछ भी नहीं होता.
औम सिद्धा.

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प्रभु को दर्सन को लागि तल कीलिक गरि हेर्नु होला