Sunday, May 17, 2015

चितया दुःखं जायते

चितया दुःखं जायते……।
और कोई ढंग से चिंता पैदा नहीं होती, बस चिंता एक ही है कि तुम कर्ता हो। कर्ता हो तो चिंता है, चिंता है तो दुख।
इति निश्चयी सुखी शांत: सर्वत्र गलितस्पृह।
ऐसा जिसने निश्चयपूर्वक जाना, अनुभव से निचोड़ा—वह व्यक्ति सुखी हो जाता है, शांत हो जाता है, उसकी सारी स्पृहा समाप्त हो जाती है।
नीड़ नहीं करता पंछी की
पल भर कभी प्रतीक्षा।
गान नहीं लिखता पंखों की
अच्छी बुरी समीक्षा।
दीप नहीं लेता शलभों की
कोई अग्नि परीक्षा।
धूम नहीं काजल बनने की
करता कभी अभीप्सा।
प्राण स्वयं ही केवल अपनी,
तृषा तृप्ति का माध्यम।
तत्व सभी निरपेक्ष,
अपेक्षा मन का मीठा विभ्रम!
तत्व सभी निरपेक्ष,
अपेक्षा मन का मीठा विभ्रम।
भ्रम है, सपना है——ऐसा हो, वैसा न हो जाए। और जैसा होना है वैसा ही होता है। तुम्हारे किए कुछ भी अंतर नहीं पड़ता, रत्ती भर अंतर नहीं पड़ता; तुम नाहक परेशान जरूर हो जाते हो, बस उतना ही अंतर पड़ता है। कभी तुम ऐसे भी तो जी कर देखो। कभी अष्टावक्र की बात पर भी तो जी —कर देखो। कभी तय कर लो कि तीन महीने ऐसे जीएंगे कि जो होगा ठीक, कोई अपेक्षा न करेंगे। क्या तुम सोचते हो, सब होना बंद हो जाएगा?
मैं तुमसे कह सकता हूं प्रामाणिक रूप से, वर्षों से मैंने कुछ नहीं किया, अपने कमरे में अकेला बैठा रहता हूं। जो होना है, होता रहता है—होता ही रहता है! एक बार तुम करके देख लो, तुम चकित
हो जाओगे। तुम हैरान हो जाओगे कि जन्मों—जन्मों से कर—करके परेशान हो गए, और यह तो सब होता ही है। करने वाला जैसे कोई और ही है। सब होता रहता है। तुम बीच से हट जाओ, तुम रोड़े मत बनो। तुम जैसे—जैसे रोड़े बनते हो, वैसे—वैसे उलझते —हो।
प्राय: अपने को नकार कर
सोचता है आदमी
दूसरों के बारे में
भटकता है अंधियारे में
निकालता है खा कर चोट
पत्थरों को गालियां।
करता है निंदा रास्तों की
सुन कर अपनी ही प्रतिध्वनि
भींचता है मुट्ठिया
पीसता है दातं
नोचता है चेतना के पंख
नहीं देख पाता
आत्मा का निरभ्र आकाश।
तुम जो भी शोरगुल मचा रहे हो, वह तुम नाहक ही मचा रहे हो
हिंदी में शब्द है परछाई,। यह बड़ा अदभुत शब्द है! किसने गढ़ा? किसी बड़े जानकार ने गढ़ा होगा। तुम्हारी छाया को कहते हैं परछाईं—पराये की छाया। कभी इस शब्द पर खयाल किया? छाया तुम्हारी है, नाम है परछाईं! तुम्हारी छाया ही पर हो जाती है, वह ही पर जैसी भासती है। ठीक ही जिसने यह शब्द चुना होगा, बड़ा बोधपूर्वक चुना होगा—परछाईं। अपनी ही छाया दूसरे जैसी मालूम होती है, उससे ही संघर्ष चलने लगता है। फिर लड़ो खूब, जीत हमारे हाथ नहीं लगेगी। कहीं छाया से कोई जीता है! शून्य में व्यर्थ ही कुशतम—कुश्ती कर रहे हो।
मैं शरीर नहीं हूं देह मेरी नहीं है, मैं चैतन्य हूं—ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है, वह पुरुष कैवल्य को प्राप्त होता हुआ, किए और अनकिए कर्म को स्मरण नहीं करता है।’
नाहं देहो न मे देहो बोधोठहमिति निश्चयी।
कैवल्यमिव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम्।।
अहं देह: न.
मैं देह नहीं।
देह: मे न.
और देह मेरी नहीं।
बोधोठहम् इति निश्चयी..
ऐसा जिसके भीतर बोध का दीया जला, ऐसा निश्चयपूर्वक जिसके भीतर ज्योति जगी. कैवल्य संप्राप्त:.
वह धीरे—धीरे कैवल्य की परम दशा को उपलब्ध होने लगता है।
क्योंकि जिसने जाना मैं देह नहीं, ज्यादा दूर नहीं है उसका जानना कि मैं ब्रह्म हूं। उसने पहला कदम उठा लिया। जिसने कहा, मैं देह नहीं, निश्चयपूर्वक जान कर; जिसने कहा, मैं मन नहीं—उसने कदम उठा लिए धीरे—धीरे कैवल्य की तरफ। शीघ्र ही वह घड़ी आएगी जब उसके भीतर उदघोष होगा :’अहं ब्रह्मास्मि! अनलहक! मैं ही हूं ब्रह्म!’ फिर ऐसे व्यक्ति को न तो किए की चिंता होती है न अनकिए की चिंता होती है।
तुमने देखा कभी, तुम उन कर्मों का तो हिसाब रखते ही हो जो तुमने किए; जो तुम नहीं कर पाए उनके लिए भी चिंतित होते हो! तुमने मूढ़ता का कोई अंत देखा? यह गणित को समझो। कल तुम किसी को गाली नहीं दे पाए, उसकी भी चिंता चलती है। दी होती तो चिंता चलती, समझ में आता है। दे नहीं पाए, मौका चूक गए; अब मिले मौका दुबारा, न मिले मौका दुबारा; समय वैसा हाथ आए न आए—अब इसकी चिंता चलती है। तुम किए हुए की चिंता करते हो, अनकिए की चिंता करते हो। तुम जो—जो नहीं कर पाए जीवन में, वह भी तुम्हारा पीछा करता है
ब्रह्म से ले कर तृणपर्यंत मैं ही हूं—ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है, वह निर्विकल्प शुद्ध और शांत और लाभालाभ से मुक्त होता है।’
जिसने जाना कि ब्रह्म से लेकर तृणपर्यंत एक ही जीवन—धारा है, एक ही जीवन का खेल है, एक ही जीवन की तरंगें हैं, एक ही सागर की लहरें—जिसने ऐसा पहचान लिया,’तृण से ले कर ब्रह्म तक’, वह निर्विकल्प हो जाता है। फिर किसका भय है! फिर कैसी वासना! फिर कैसी अशांति! फिर कैसी अशुद्धि! जब एक ही है तो शुद्ध ही है। फिर कैसा लाभ, कैसा अलाभ!
अनेक आश्चर्यों वाला यह विश्व कुछ भी नहीं है, अर्थात मिथ्या है—ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है, वह वासना—रहित, बोध—स्वरूप पुरुष इस प्रकार शांति को प्राप्त होता है, मानो कुछ भी नहीं है।’
नानाश्चर्यमिद विश्व न किचिदिति निश्चयी।
निर्वासन: स्फूर्तिमात्रो न किचिदिव शाम्यति
इदम् विश्व नानाश्चर्यं न किंचित.
यह जो बहुत—बहुत आश्चर्यों से भरा हुआ विश्व है, शांत हुए व्यक्ति को ऐसा लगता है कि सपना—मात्र। यह सत्य लगता है तुम्हारी वासना के कारण, तुम्हारी वासना इसमें प्राण डालती है। वासना के हटते ही प्राण निकल जाते हैं विश्व में से। यह नाना आश्चर्यों से भरा हुआ विश्व अचानक स्वम्नवत हो जाता है, मायाजाल!
इति निश्चयी निर्वासन: स्फूर्तिमात्र न किचिदिव शाम्यति!
ऐसा निश्चयपूर्वक जिसने जाना, वह वासना—रहित बोध—स्वरूप पुरुष इस प्रकार शांति को प्राप्त होता है, मानो कुछ भी नहीं है।

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प्रभु को दर्सन को लागि तल कीलिक गरि हेर्नु होला