कौन हैं शिव
शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है। ‘शि’ का अर्थ है, पापों का नाश करने वाला, जबकि ‘व’ का अर्थ देने वाला यानी दाता।
क्या है शिवलिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग
शिव की दो काया है। एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए, दूसरी वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है। लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है : शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न।
शिव, शंकर, महादेव…
शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं – शिव शंकर भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। शिव ने सृष्टि की स्थापना, पालना और विनाश के लिए क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और महेश (महेश भी शंकर का ही नाम है) नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की है। इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना। भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है। इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है।
अर्द्धनारीश्वर क्यों
शिव को अर्द्धनारीश्वर भी कहा गया है, इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव आधे पुरुष ही हैं या उनमें संपूर्णता नहीं। दरअसल, यह शिव ही हैं, जो आधे होते हुए भी पूरे हैं। इस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं। इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है। दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। नारी प्रकृति है और नर पुरुष। प्रकृति के बिना पुरुष बेकार है और पुरुष के बिना प्रकृति। दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है। अर्धनारीश्वर शिव इसी पारस्परिकता के प्रतीक हैं। आधुनिक समय में स्त्री-पुरुष की बराबरी पर जो इतना जोर है, उसे शिव के इस स्वरूप में बखूबी देखा-समझा जा सकता है। यह बताता है कि शिव जब शक्ति युक्त होता है तभी समर्थ होता है। शक्ति के अभाव में शिव ‘शिव’ न होकर ‘शव’ रह जाता है।
नीलकंठ क्यों
अमृत पाने की इच्छा से जब देव-दानव बड़े जोश और वेग से मंथन कर रहे थे, तभी समुद से कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं। समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया। देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गरमी से जलने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान शिव विषपान के लिए तैयार हो गए। उन्होंने भयंकर विष को हथेलियों में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए। भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं। उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव खत्म कर दिया। विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
भोले बाबा
शिव पुराण में एक शिकारी की कथा है। एकबार उसे जंगल में देर हो गई। तब उसने एक बेल वृक्ष पर रात बिताने का निश्चय किया। जगे रहने के लिए उसने एक तरकीब सोची। वह सारी रात एक-एक पत्ता तोड़कर नीचे फेंकता रहा। कथानुसार, बेल के पत्ते शिव को बहुत प्रिय हैं। बेल वृक्ष के ठीक नीचे एक शिवलिंग था। शिवलिंग पर प्रिय पत्तों का अर्पण होते देख शिव प्रसन्न हो उठे, जबकि शिकारी को अपने शुभ काम का अहसास न था। उन्होंने शिकारी को दर्शन देकर उसकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया। कथा से यह साफ है कि शिव कितनी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं। शिव महिमा की ऐसी कथाओं और बखानों से पुराण भरे पड़े हैं।
शिव स्वरूप
भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी। शिव जो धारण करते हैं, उनके भी बड़े व्यापक अर्थ हैं :
जटाएं : शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं।
चंद्र : चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है।
त्रिनेत्र : शिव की तीन आंखें हैं। इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों), स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं।
सर्पहार : सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है।
त्रिशूल : शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।
डमरू : शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है।
मुंडमाला : शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है।
छाल : शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है। व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।
भस्म : शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है।
वृषभ : शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ धर्म का प्रतीक है। महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं, जो बताता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते हैं।
इस तरह शिव-स्वरूप हमें बताता है कि उनका रूप विराट और अनंत है, महिमा अपरंपार है। उनमें ही सारी सृष्टि समाई हुई है।
महामृत्युंजय मंत्र
शिव के साधक को न तो मृत्यु का भय रहता है, न रोग का, न शोक का। शिव तत्व उनके मन को भक्ति और शक्ति का सामर्थ्य देता है। शिव तत्व का ध्यान महामृत्युंजय मंत्र के जरिए किया जाता है। इस मंत्र के जाप से भगवान शिव की कृपा मिलती है। शास्त्रों में इस मंत्र को कई कष्टों का निवारक बताया गया है। यह मंत्र यों हैं : ओम् त्र्यम्बकं यजामहे, सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनात्, मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।
भावार्थ : हम भगवान शिव की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो हर श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं और पूरे जगत का पालन-पोषण करते हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, ताकि मोक्ष की प्राप्ति हो जाए, उसी उसी तरह से जैसे एक खरबूजा अपनी बेल में पक जाने के बाद उस बेल रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है।)
क्या है महाशिवरात्रि
भगवान शिव हिंदुओं के प्रमुख देवताओं में से एक हैं, जिन्हें हिंदू बड़ी ही आस्था और श्रद्धा के साथ स्वीकारते और पूजते हैं।
यूं तो शिव की उपासना के लिए सप्ताह के सभी दिन अच्छे हैं, फिर भी सोमवार को शिव का प्रतीकात्मक दिन कहा गया है। इस दिन शिव की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है।
हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि कहते हैं। लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी पर पड़ने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है, जिसे बड़े ही हषोर्ल्लास और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
शिवरात्रि बोधोत्सव है। ऐसा महोत्सव, जिसमें अपना बोध होता है कि हम भी शिव का अंश हैं, उनके संरक्षण में हैं।माना जाता है कि सृष्टि की शुरुआत में इसी दिन आधी रात में भगवान शिव का निराकार से साकार रूप में (ब्रह्मा से रुद के रूप में) अवतरण हुआ था। ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात आदि देव भगवान श्री शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए।ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चंदमा सूर्य के नजदीक होता है। उसी समय जीवनरूपी चंदमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है। इसलिए इस चतुर्दशी को शिवपूजा करने का विधान है।
प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर देते हैं। इसलिए इसे महाशिवरात्रि या जलरात्रि भी कहा गया है।
इस दिन भगवान शिव की शादी भी हुई थी। इसलिए रात में शिव जी की बारात निकाली जाती है। रात में पूजा कर फलाहार किया जाता है। अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेल पत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।
२ अब पाप तथा विपत्तियों को दूर करने वाले महामृत्युञ्जय मन्त्र को कहता हूँ, जिसे शुक्राचार्य ने भगवान् शंकर से प्राप्त कर मरे हुये दैत्यों को जिलायाथा ॥१॥महामृत्युञ्जय मन्त्र का उद्धार – तार (ॐ), व्यापिनी चन्द्रयुक्त (औ), बिन्दु सहित खं (ह), अर्थात् (हौं), फिर तार (ॐ), फिर अर्धीश (ऊकार), बिन्दु (अनुस्वार) से युक्त चतुरानन ‘ज’ अर्थात् (जूं), सर्गी हंसः (सः) इसके बाद ‘भूर्भुवः फिर वाल (ब) विसर्ग युक्त सकार अर्थात् (स्वः), फिर ‘त्र्यम्बकं यजामहे० यह वैदिक मन्त्र, फिर ‘भूर्भुवः स्वः’, तारयुक्तभुजङेश रों जूं, फिर सर्गवान् भृगु (मनु और बिन्दु सहित आकाश (ह) अर्थातहौं, पुनः प्रणव जोडने से पचास अक्षरों का महामृत्युञ्जय संज्ञक श्रेष्ठतममन्त्र बनता है ॥२-४॥विमर्श – महामृत्युञ्जय मन्त्र का स्वरुप इसप्रकार है – ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् भूर्भुवःस्वरों जूं सः हौं ॐ (५०) ॥२-४॥इस मन्त्र के वामदेव, कहोल एवंवशिष्ठ ऋषि हैं, भगवान् रुद्र से इस मन्त्र का पंक्ति, गायत्री औरअनुष्टुप् छन्द कहा है । सदाशिव महामृत्युञ्जय रुद्र इसके देवता हैं । माया (ह्रीं) शक्ति है, रमा (श्रीं) बीज है । अभीष्ट सिद्धि हेतु इसका विनियोगकिया जाता है ॥५-६॥विनियोग – अस्य श्रीमहामृत्युञ्जयामन्त्रस्यवामदेवकहोलवशिष्ठा ऋषयः पंक्तिर्गायत्र्यनुष्टुप्छन्दांसिसदाशिवमहामृत्युञ्जयरुद्रो देवता हीं शक्तिः श्रींबीजमात्मनोऽभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।ऋष्यादिन्यास – शिर, मुख, हृदय, लिङ्ग, एवं पैरों पर ऋष्यादिन्यास करना चाहिए ॥७॥विमर्श – यथा- वामदेवहोलवशिष्ठऋषिभ्यो नमः शिरसि, पंक्तिर्गायत्र्यनुष्टुप्छन्दोभ्यः नमः मुखे, सदाशिवमहामृत्युञ्जरुद्राख्यदेवतायै नमः हृदि, ह्रीं शक्तये नमः लिङ्गे श्रीं बीजाय नमः पादयोः ॥७॥अबषडङ्गन्यास कहते हैं – अनुष्टुप् छान्द के ३, ४, ५, ९, ५, तथा ३ वर्णों सेषडङ्गन्यास करना चाहिए । उसकी विधि इस प्रकार है – प्रारम्भ में मूलमन्त्रके ९ अक्षरों के बाद त्र्यबकादि अक्षर लगाकर, फिर तार (ॐ), फिर ‘नमो भगवतेरुद्राय’ पद, फिर क्रमशः ‘शूलपाणये स्वाहा’ पद से हृदय में, फिर ‘अमृतमूर्तये मां जीवय’ से शिर में, फिर ‘चन्दशिरसे जटिने स्वाहा’ से शिखामें, फिर ‘त्रिपुरान्तकाय हां हीं’ से कवच में, फिर ‘त्रिलोचनायऋग्यजुःसाममन्त्राय’ से नेत्र में, फिर ‘अग्नित्रयाय ज्वल ज्वल मां रक्षरक्ष ॐ अघोरास्त्राय’ से अस्त्र में लगाकर न्यास करे ॥७-१२॥विमर्श -यथा – १. ॐ हौ ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं ॐ नमो भगवते रुद्रायशूलपाणये स्वाहा हृदयाय नमः, २. ॐ हौं ॐ जूँ सः भूर्भुवः स्वः यजामहे ॐ नमोभगवते रुद्राय अमृतमूर्तये मां जीवय शिरसे स्वाहा, ३. ॐ हौं ॐ जूं सःभूर्भुवः स्वः सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ॐ नमो भगवते रुद्राय चन्द्रशिरसेजटिने स्वाहा शिखायै वषट्, ४. ॐ हौं जूं सः भूर्भुवः स्वः उर्वारुकमिवबन्धनत् ॐ नमो भगवते रुद्राय त्रिपुरान्तकाय हां ह्रीं कवचाय हुम्, ५. ॐहौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मृत्योर्मुक्षीय ॐ नमो भगवते रुद्रायत्रिलोचनाय ऋग्यजुः साममन्त्राय नेत्रत्रयाय वौषट्, ६. ॐ हौं ॐ जूं सःभूर्भुवः स्वः मामृतात् ॐ नमो भगवते रुद्राय अग्नित्रयाय ज्वल ज्वलं मामरक्ष रक्ष ॐ अघोरास्त्राय अस्त्राय फट् ॥७-१२॥अब उक्त मन्त्र कावर्णन्यास कहते है – प्रारम्भ में मूल मन्त्र के ९ वर्ण लगाकर फिरत्र्यम्बकादि ३२ अक्षरों के एक एक वर्ण पर बिन्दु तथा अन्त में नमः लगाकरपूर्व, पश्चिमे, दक्षिण, उत्तर पूर्वक मुख में, फिर उरःस्थल कण्ठ, पुख, नाभि, हृदय, पीठ, कुक्षि, लिङ्ग और गुदा में न्यास करना चाहिए । फिर दोनोऊरुओं के मूल और मध्य में, दोनों जानुओं में एवं दोनों जानुवृत्त में, स्तनोम में, पार्श्वो में, पैरो में, हाघों में, नासिका, रन्ध्रों में तथाशिर इन ३२ स्थानोम में इस प्रकार न्यस करना चाहिए ॥१३-१५॥विमर्श – वर्णन्यास की विधि – (१) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्र्यं नमः पूर्वमुखे, (२) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः वं नमः पश्चिममुखे, (३) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः कं नमः दक्षिणमुखे, (४) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः यं नमः उत्तरमुखे, (५) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः जां नमः उरसि, (६) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मं नमः कण्ठे, (७) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः हें नमः मुखे, (८) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः सुं नमः नाभौ, (९) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः गं नमः हृदि, (१०) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः धिं नमः पृष्ठे, (११) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः पुं नमः कुक्षौ, (१२) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः ष्टिं नमः लिङ्गे, (१३) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः वं नमः गुदे, (१४) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः र्धं नमः दक्षिणोरुमूले, (१५) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः नं नमः वामोरुमूले, (१६) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः ॐ नमः दक्षिणोरुमध्ये, (१७) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः र्वा नमः वामोरुमध्ये, (१८) ॐ हौं ॐ जंह सः भूर्भुवः स्वः सं नमः दक्षिणजानुवृत्ते, (१९) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः कं नमः वामजानुनि, (२०) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मिं नमः दक्षिणजानुवृत्ते, (२१) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः वं नमः वामजानुवृत्ते, (२२) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः बं नमः दक्षिणस्तने, (२३) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः न्धं नमः वामस्तने, (२४) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः नां नमः दक्षिणपार्श्वे, (२५) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मृं नमः वामपार्श्वे, (२६) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्यों नमः दक्षिणपादे, (२७) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः र्मुं नमः वामपादे, (२८) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः क्षीं नमः दक्षिणकरे, (२९) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः यं नमः वामकरे, (३०) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मां नमः दक्षिणनासापुटे, (३१) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मृं नमः वामनासापुटे, (३२) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः तां नमः मूर्ध्नि ॥१३-१५॥तदनन्तरग्यारह पदों का शिर, भौह, नेत्र, मुख, गण्डस्थल, हृदय, उदर, लिङ्ग, ऊरु, जानु और दोनो पैरो में न्यास करना चाहिए । ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ इत्यादिमन्त्र के ३, ४, ३, ५, ४, २, ३, २, ३, १ और ३ वर्णों से विद्वान् एक एक पदबना लें । फिर मूल मन्त्र से व्यापक न्यास कर भगवान् शंकर का ध्यान करनाचाहिए ॥१६-१८॥विमर्श – एकादश पदन्यास । यथा – १. त्र्यम्बकं शिरसि, २. यजामहे भ्रुवोः ३. सुगन्धिं नेत्रयो. ४. पुष्टिवर्धनम् मुखे, ५.उर्वारुकं गण्डयोः, ६. एव हृदये, ७, बन्धनात् जठरे, ८. मृत्योः लिङ्गे, ९.मुक्षीय उर्वोः, १०. मा जान्वोः, ११. अमृतात् पादयोः ॥१६-१८॥अबभगवान शंकर द्वारा उपयोग में लाये गये हाथोम का वर्णन करते हुए ध्यान कहतेहैं –
अपने अङ्गास्थ दो करों में अमृत कुम्भ धारण किए हुये, उसके ऊपर वालेदो हाथों से उस अमृत कुम्भ से सुधामय जल निकालते हुये, उसके ऊपर के दोनोंहाथों से उस अमृत जल को शिर पर अभिषिक्त करते हुये, शेष दो हाथो में क्रमशःमृग और अक्षमाला धारण किए हुये, शिरःस्थित चन्द्रमण्डल से स्त्रवित अमृतधारा से अपने शरीर को आप्लावित करते हुये, पार्वती सहित त्रिनेत्र सदाशिवमृत्युञ्जय का मैं ध्यान करता हूँ ॥१९॥मुष्टि सारङ्ग, शक्ति, लिङ्ग, एवं पञ्चमुख मुद्रायें प्रदर्शित कर एक लाख की संख्या में इस मन्त्र का जप करना चाहिए ॥२०॥विमर्श – मुष्टि मुद्रा – दाहिने हाथ की हथेली से मुष्टिका बना कर ऊपर की ओरप्रदर्शित करने से मुष्टि मुद्रा बनती है । यह मुद्रा सभी विघ्नों का विनाशकरने वाली कही गई है ।मृगमुद्रा – दहिने हाथ की अनामिका और अँगूठेको मिलाकर उस पर मध्यमा को भी रख्खे । शेश दो उँगलियों को ऊपर की ओर सीधाखडा करे । यह मृग मुद्रा है ।शक्ति मुद्रा – दोंनों हाथों सेमुठ्ठी बन कर बॉये हाथ की मुठ्ठी के ऊपर दाहिने हाथ की मुठ्ठी को रख कर शिरके ऊपर संयोजन करने से शक्ति मुद्रा निष्पन्न होती है ।लिङ्गमुद्रा – दाहिने हाथ के अँगूठे को ऊपर उठाकर उसे बायें अँगूठे से बाँधे । उसकेबाद दोंनो हाथों की उँगलियों को परस्पर बाँधे । यह शिवसान्निध्यकारकलिङ्गमुद्रा है ।पञ्चमुख मुद्रा – दोनों हाथों के मणिबन्धों कोमिलाकर आगे की अंगुलियों को परस्पर मिलाना चाहिए । शिव को संतुष्ट करनेवाली यह पञ्चमुख मुद्रा कही गई है ॥२०॥जप करने के बाद दश द्रव्योमसे दशांश होम करना चाहिए । १. बिल्वफल २. तिल, ३. खीर, ४. घी, ५. दूध, ५.दही, ७. दूर्वा, ८. वट की समिधा, ९. पलाश की समिधा एवं १०. खैर की समिधायेंदश द्रव्य कहे गये हैं । इन तीनों समिधाओं को घी, शहद और शक्कर में डुबोकरहोम करना चाहिए ॥२१-२२॥अब पीठ शक्तियाँ कहते हैं – वामादिशक्तियोम के साथ शैव पीठ पर शिव का पूजन करना चाहिए । १. वामा, २.ज्येष्ठा, ३. रौद्री, ४. काली चौथी शक्ति कही गई है । इसके बाद ५.कलविकरणी, ६. बलविकरणी, ७. बलप्रमथनी, ८. सर्वभूतदमनी, ९ शक्तियाँ कही गईहैं ॥२२-२४॥तार (ॐ), फिर ‘नमो भगवते सकल’, फिर ‘गुणात्मशक्तियुक्ताय अनन्ताय’ पद, फिर ‘योगपीठात्मने ’ पद और ‘नमः’ इसमन्त्र से पीठ पर पुष्पाञ्जति देकर मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे यहपीठ मन्त्र कहा है ॥२५-२६॥विमर्श – पीठपूजा विधि – वृत्ताकारकर्णिका अष्टदल फिर भूपुर लिख कर यन्त्र बनाना चाहिए । उसी परमहामृत्युञ्जय भगवान् का पूजन करना चाहिए । सर्वप्रथम (१६. १९ में वर्णित)भगवान् मृत्युञ्जय के स्वरुप का ध्यान कर, मानसोपचार से पूजन कर, उनके लिएविधिवत् अर्घ्य स्थापित कर पीठदेवतओं का पीठ के मध्य में इस प्रकार पूजनकरना चाहिए – ॐ आधारशक्तयै नमः, ॐ प्रकृत्यै नमः, ॐ कूंर्माय नमः, ॐ शेषाय नमः, ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ क्षीरसमुद्राय नमः, ॐ श्वेतद्वीपाय नमः, ॐ मणिमण्डपाय नमः, ॐ कल्पवृक्षाय नमः, ॐ मणिवेदिकायै नमः ॐ रत्नसिंहासनाय नमः, फिर आग्नेयादि कोणों में धर्म आदि का तथ पूर्वादि दिशाओम में अधर्म आदि का पूजन करना चाहिए । यथा -ॐ धर्माय नमः, आग्नेये, ॐ ज्ञानाय नमः नैऋत्ये, ॐ वैराग्याय नमः वायव्ये, ॐ ऐश्वर्याय नमः ऐशान्ये, ॐ अधर्माय नमः पूर्वे, ॐ अज्ञानाय नमः दक्षिणे, ॐ अवैराग्याय नमः पश्चिमे, ॐ अनैश्वर्याय नमः उत्तरे ।पुनः पीठ के मध्य में अनन्त आदि का इस प्रकार पूजन करना चाहिए -ॐ अनन्ताय नमः, ॐ पदम्नाभाय नमः, ॐ अं द्वादशकलात्मने सूर्यमण्डलाय नमः, ॐ उं षोडशकलात्मने सोममण्डलाय नमः, ॐ रं दशकलात्मने वहिनण्डलाय नमः, ॐ सं सत्त्वाय नमः, ॐ रं रजसे नमः, ॐ तं तमसे नमः, ॐ आं आत्मने नमः, ॐ पं परमात्मने नमःॐ ह्रीं ज्ञानात्मने नमः ।तत्पश्चात् केशरों में पूर्वादि ८ दिशाओं में तथा मध्य मे वामादि शक्तियोम की पूजा करनी चाहिए.
शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है। ‘शि’ का अर्थ है, पापों का नाश करने वाला, जबकि ‘व’ का अर्थ देने वाला यानी दाता।
क्या है शिवलिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग
शिव की दो काया है। एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए, दूसरी वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है। लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है : शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न।
शिव, शंकर, महादेव…
शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं – शिव शंकर भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। शिव ने सृष्टि की स्थापना, पालना और विनाश के लिए क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और महेश (महेश भी शंकर का ही नाम है) नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की है। इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना। भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है। इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है।
अर्द्धनारीश्वर क्यों
शिव को अर्द्धनारीश्वर भी कहा गया है, इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव आधे पुरुष ही हैं या उनमें संपूर्णता नहीं। दरअसल, यह शिव ही हैं, जो आधे होते हुए भी पूरे हैं। इस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं। इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है। दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। नारी प्रकृति है और नर पुरुष। प्रकृति के बिना पुरुष बेकार है और पुरुष के बिना प्रकृति। दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है। अर्धनारीश्वर शिव इसी पारस्परिकता के प्रतीक हैं। आधुनिक समय में स्त्री-पुरुष की बराबरी पर जो इतना जोर है, उसे शिव के इस स्वरूप में बखूबी देखा-समझा जा सकता है। यह बताता है कि शिव जब शक्ति युक्त होता है तभी समर्थ होता है। शक्ति के अभाव में शिव ‘शिव’ न होकर ‘शव’ रह जाता है।
नीलकंठ क्यों
अमृत पाने की इच्छा से जब देव-दानव बड़े जोश और वेग से मंथन कर रहे थे, तभी समुद से कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं। समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया। देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गरमी से जलने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान शिव विषपान के लिए तैयार हो गए। उन्होंने भयंकर विष को हथेलियों में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए। भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं। उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव खत्म कर दिया। विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
भोले बाबा
शिव पुराण में एक शिकारी की कथा है। एकबार उसे जंगल में देर हो गई। तब उसने एक बेल वृक्ष पर रात बिताने का निश्चय किया। जगे रहने के लिए उसने एक तरकीब सोची। वह सारी रात एक-एक पत्ता तोड़कर नीचे फेंकता रहा। कथानुसार, बेल के पत्ते शिव को बहुत प्रिय हैं। बेल वृक्ष के ठीक नीचे एक शिवलिंग था। शिवलिंग पर प्रिय पत्तों का अर्पण होते देख शिव प्रसन्न हो उठे, जबकि शिकारी को अपने शुभ काम का अहसास न था। उन्होंने शिकारी को दर्शन देकर उसकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया। कथा से यह साफ है कि शिव कितनी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं। शिव महिमा की ऐसी कथाओं और बखानों से पुराण भरे पड़े हैं।
शिव स्वरूप
भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी। शिव जो धारण करते हैं, उनके भी बड़े व्यापक अर्थ हैं :
जटाएं : शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं।
चंद्र : चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है।
त्रिनेत्र : शिव की तीन आंखें हैं। इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों), स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं।
सर्पहार : सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है।
त्रिशूल : शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।
डमरू : शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है।
मुंडमाला : शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है।
छाल : शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है। व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।
भस्म : शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है।
वृषभ : शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ धर्म का प्रतीक है। महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं, जो बताता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते हैं।
इस तरह शिव-स्वरूप हमें बताता है कि उनका रूप विराट और अनंत है, महिमा अपरंपार है। उनमें ही सारी सृष्टि समाई हुई है।
महामृत्युंजय मंत्र
शिव के साधक को न तो मृत्यु का भय रहता है, न रोग का, न शोक का। शिव तत्व उनके मन को भक्ति और शक्ति का सामर्थ्य देता है। शिव तत्व का ध्यान महामृत्युंजय मंत्र के जरिए किया जाता है। इस मंत्र के जाप से भगवान शिव की कृपा मिलती है। शास्त्रों में इस मंत्र को कई कष्टों का निवारक बताया गया है। यह मंत्र यों हैं : ओम् त्र्यम्बकं यजामहे, सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनात्, मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।
भावार्थ : हम भगवान शिव की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो हर श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं और पूरे जगत का पालन-पोषण करते हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, ताकि मोक्ष की प्राप्ति हो जाए, उसी उसी तरह से जैसे एक खरबूजा अपनी बेल में पक जाने के बाद उस बेल रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है।)
क्या है महाशिवरात्रि
भगवान शिव हिंदुओं के प्रमुख देवताओं में से एक हैं, जिन्हें हिंदू बड़ी ही आस्था और श्रद्धा के साथ स्वीकारते और पूजते हैं।
यूं तो शिव की उपासना के लिए सप्ताह के सभी दिन अच्छे हैं, फिर भी सोमवार को शिव का प्रतीकात्मक दिन कहा गया है। इस दिन शिव की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है।
हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि कहते हैं। लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी पर पड़ने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है, जिसे बड़े ही हषोर्ल्लास और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
शिवरात्रि बोधोत्सव है। ऐसा महोत्सव, जिसमें अपना बोध होता है कि हम भी शिव का अंश हैं, उनके संरक्षण में हैं।माना जाता है कि सृष्टि की शुरुआत में इसी दिन आधी रात में भगवान शिव का निराकार से साकार रूप में (ब्रह्मा से रुद के रूप में) अवतरण हुआ था। ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात आदि देव भगवान श्री शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए।ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चंदमा सूर्य के नजदीक होता है। उसी समय जीवनरूपी चंदमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है। इसलिए इस चतुर्दशी को शिवपूजा करने का विधान है।
प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर देते हैं। इसलिए इसे महाशिवरात्रि या जलरात्रि भी कहा गया है।
इस दिन भगवान शिव की शादी भी हुई थी। इसलिए रात में शिव जी की बारात निकाली जाती है। रात में पूजा कर फलाहार किया जाता है। अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेल पत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।
२ अब पाप तथा विपत्तियों को दूर करने वाले महामृत्युञ्जय मन्त्र को कहता हूँ, जिसे शुक्राचार्य ने भगवान् शंकर से प्राप्त कर मरे हुये दैत्यों को जिलायाथा ॥१॥महामृत्युञ्जय मन्त्र का उद्धार – तार (ॐ), व्यापिनी चन्द्रयुक्त (औ), बिन्दु सहित खं (ह), अर्थात् (हौं), फिर तार (ॐ), फिर अर्धीश (ऊकार), बिन्दु (अनुस्वार) से युक्त चतुरानन ‘ज’ अर्थात् (जूं), सर्गी हंसः (सः) इसके बाद ‘भूर्भुवः फिर वाल (ब) विसर्ग युक्त सकार अर्थात् (स्वः), फिर ‘त्र्यम्बकं यजामहे० यह वैदिक मन्त्र, फिर ‘भूर्भुवः स्वः’, तारयुक्तभुजङेश रों जूं, फिर सर्गवान् भृगु (मनु और बिन्दु सहित आकाश (ह) अर्थातहौं, पुनः प्रणव जोडने से पचास अक्षरों का महामृत्युञ्जय संज्ञक श्रेष्ठतममन्त्र बनता है ॥२-४॥विमर्श – महामृत्युञ्जय मन्त्र का स्वरुप इसप्रकार है – ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् भूर्भुवःस्वरों जूं सः हौं ॐ (५०) ॥२-४॥इस मन्त्र के वामदेव, कहोल एवंवशिष्ठ ऋषि हैं, भगवान् रुद्र से इस मन्त्र का पंक्ति, गायत्री औरअनुष्टुप् छन्द कहा है । सदाशिव महामृत्युञ्जय रुद्र इसके देवता हैं । माया (ह्रीं) शक्ति है, रमा (श्रीं) बीज है । अभीष्ट सिद्धि हेतु इसका विनियोगकिया जाता है ॥५-६॥विनियोग – अस्य श्रीमहामृत्युञ्जयामन्त्रस्यवामदेवकहोलवशिष्ठा ऋषयः पंक्तिर्गायत्र्यनुष्टुप्छन्दांसिसदाशिवमहामृत्युञ्जयरुद्रो देवता हीं शक्तिः श्रींबीजमात्मनोऽभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।ऋष्यादिन्यास – शिर, मुख, हृदय, लिङ्ग, एवं पैरों पर ऋष्यादिन्यास करना चाहिए ॥७॥विमर्श – यथा- वामदेवहोलवशिष्ठऋषिभ्यो नमः शिरसि, पंक्तिर्गायत्र्यनुष्टुप्छन्दोभ्यः नमः मुखे, सदाशिवमहामृत्युञ्जरुद्राख्यदेवतायै नमः हृदि, ह्रीं शक्तये नमः लिङ्गे श्रीं बीजाय नमः पादयोः ॥७॥अबषडङ्गन्यास कहते हैं – अनुष्टुप् छान्द के ३, ४, ५, ९, ५, तथा ३ वर्णों सेषडङ्गन्यास करना चाहिए । उसकी विधि इस प्रकार है – प्रारम्भ में मूलमन्त्रके ९ अक्षरों के बाद त्र्यबकादि अक्षर लगाकर, फिर तार (ॐ), फिर ‘नमो भगवतेरुद्राय’ पद, फिर क्रमशः ‘शूलपाणये स्वाहा’ पद से हृदय में, फिर ‘अमृतमूर्तये मां जीवय’ से शिर में, फिर ‘चन्दशिरसे जटिने स्वाहा’ से शिखामें, फिर ‘त्रिपुरान्तकाय हां हीं’ से कवच में, फिर ‘त्रिलोचनायऋग्यजुःसाममन्त्राय’ से नेत्र में, फिर ‘अग्नित्रयाय ज्वल ज्वल मां रक्षरक्ष ॐ अघोरास्त्राय’ से अस्त्र में लगाकर न्यास करे ॥७-१२॥विमर्श -यथा – १. ॐ हौ ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं ॐ नमो भगवते रुद्रायशूलपाणये स्वाहा हृदयाय नमः, २. ॐ हौं ॐ जूँ सः भूर्भुवः स्वः यजामहे ॐ नमोभगवते रुद्राय अमृतमूर्तये मां जीवय शिरसे स्वाहा, ३. ॐ हौं ॐ जूं सःभूर्भुवः स्वः सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ॐ नमो भगवते रुद्राय चन्द्रशिरसेजटिने स्वाहा शिखायै वषट्, ४. ॐ हौं जूं सः भूर्भुवः स्वः उर्वारुकमिवबन्धनत् ॐ नमो भगवते रुद्राय त्रिपुरान्तकाय हां ह्रीं कवचाय हुम्, ५. ॐहौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मृत्योर्मुक्षीय ॐ नमो भगवते रुद्रायत्रिलोचनाय ऋग्यजुः साममन्त्राय नेत्रत्रयाय वौषट्, ६. ॐ हौं ॐ जूं सःभूर्भुवः स्वः मामृतात् ॐ नमो भगवते रुद्राय अग्नित्रयाय ज्वल ज्वलं मामरक्ष रक्ष ॐ अघोरास्त्राय अस्त्राय फट् ॥७-१२॥अब उक्त मन्त्र कावर्णन्यास कहते है – प्रारम्भ में मूल मन्त्र के ९ वर्ण लगाकर फिरत्र्यम्बकादि ३२ अक्षरों के एक एक वर्ण पर बिन्दु तथा अन्त में नमः लगाकरपूर्व, पश्चिमे, दक्षिण, उत्तर पूर्वक मुख में, फिर उरःस्थल कण्ठ, पुख, नाभि, हृदय, पीठ, कुक्षि, लिङ्ग और गुदा में न्यास करना चाहिए । फिर दोनोऊरुओं के मूल और मध्य में, दोनों जानुओं में एवं दोनों जानुवृत्त में, स्तनोम में, पार्श्वो में, पैरो में, हाघों में, नासिका, रन्ध्रों में तथाशिर इन ३२ स्थानोम में इस प्रकार न्यस करना चाहिए ॥१३-१५॥विमर्श – वर्णन्यास की विधि – (१) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्र्यं नमः पूर्वमुखे, (२) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः वं नमः पश्चिममुखे, (३) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः कं नमः दक्षिणमुखे, (४) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः यं नमः उत्तरमुखे, (५) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः जां नमः उरसि, (६) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मं नमः कण्ठे, (७) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः हें नमः मुखे, (८) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः सुं नमः नाभौ, (९) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः गं नमः हृदि, (१०) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः धिं नमः पृष्ठे, (११) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः पुं नमः कुक्षौ, (१२) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः ष्टिं नमः लिङ्गे, (१३) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः वं नमः गुदे, (१४) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः र्धं नमः दक्षिणोरुमूले, (१५) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः नं नमः वामोरुमूले, (१६) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः ॐ नमः दक्षिणोरुमध्ये, (१७) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः र्वा नमः वामोरुमध्ये, (१८) ॐ हौं ॐ जंह सः भूर्भुवः स्वः सं नमः दक्षिणजानुवृत्ते, (१९) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः कं नमः वामजानुनि, (२०) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मिं नमः दक्षिणजानुवृत्ते, (२१) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः वं नमः वामजानुवृत्ते, (२२) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः बं नमः दक्षिणस्तने, (२३) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः न्धं नमः वामस्तने, (२४) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः नां नमः दक्षिणपार्श्वे, (२५) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मृं नमः वामपार्श्वे, (२६) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्यों नमः दक्षिणपादे, (२७) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः र्मुं नमः वामपादे, (२८) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः क्षीं नमः दक्षिणकरे, (२९) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः यं नमः वामकरे, (३०) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मां नमः दक्षिणनासापुटे, (३१) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मृं नमः वामनासापुटे, (३२) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः तां नमः मूर्ध्नि ॥१३-१५॥तदनन्तरग्यारह पदों का शिर, भौह, नेत्र, मुख, गण्डस्थल, हृदय, उदर, लिङ्ग, ऊरु, जानु और दोनो पैरो में न्यास करना चाहिए । ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ इत्यादिमन्त्र के ३, ४, ३, ५, ४, २, ३, २, ३, १ और ३ वर्णों से विद्वान् एक एक पदबना लें । फिर मूल मन्त्र से व्यापक न्यास कर भगवान् शंकर का ध्यान करनाचाहिए ॥१६-१८॥विमर्श – एकादश पदन्यास । यथा – १. त्र्यम्बकं शिरसि, २. यजामहे भ्रुवोः ३. सुगन्धिं नेत्रयो. ४. पुष्टिवर्धनम् मुखे, ५.उर्वारुकं गण्डयोः, ६. एव हृदये, ७, बन्धनात् जठरे, ८. मृत्योः लिङ्गे, ९.मुक्षीय उर्वोः, १०. मा जान्वोः, ११. अमृतात् पादयोः ॥१६-१८॥अबभगवान शंकर द्वारा उपयोग में लाये गये हाथोम का वर्णन करते हुए ध्यान कहतेहैं –
अपने अङ्गास्थ दो करों में अमृत कुम्भ धारण किए हुये, उसके ऊपर वालेदो हाथों से उस अमृत कुम्भ से सुधामय जल निकालते हुये, उसके ऊपर के दोनोंहाथों से उस अमृत जल को शिर पर अभिषिक्त करते हुये, शेष दो हाथो में क्रमशःमृग और अक्षमाला धारण किए हुये, शिरःस्थित चन्द्रमण्डल से स्त्रवित अमृतधारा से अपने शरीर को आप्लावित करते हुये, पार्वती सहित त्रिनेत्र सदाशिवमृत्युञ्जय का मैं ध्यान करता हूँ ॥१९॥मुष्टि सारङ्ग, शक्ति, लिङ्ग, एवं पञ्चमुख मुद्रायें प्रदर्शित कर एक लाख की संख्या में इस मन्त्र का जप करना चाहिए ॥२०॥विमर्श – मुष्टि मुद्रा – दाहिने हाथ की हथेली से मुष्टिका बना कर ऊपर की ओरप्रदर्शित करने से मुष्टि मुद्रा बनती है । यह मुद्रा सभी विघ्नों का विनाशकरने वाली कही गई है ।मृगमुद्रा – दहिने हाथ की अनामिका और अँगूठेको मिलाकर उस पर मध्यमा को भी रख्खे । शेश दो उँगलियों को ऊपर की ओर सीधाखडा करे । यह मृग मुद्रा है ।शक्ति मुद्रा – दोंनों हाथों सेमुठ्ठी बन कर बॉये हाथ की मुठ्ठी के ऊपर दाहिने हाथ की मुठ्ठी को रख कर शिरके ऊपर संयोजन करने से शक्ति मुद्रा निष्पन्न होती है ।लिङ्गमुद्रा – दाहिने हाथ के अँगूठे को ऊपर उठाकर उसे बायें अँगूठे से बाँधे । उसकेबाद दोंनो हाथों की उँगलियों को परस्पर बाँधे । यह शिवसान्निध्यकारकलिङ्गमुद्रा है ।पञ्चमुख मुद्रा – दोनों हाथों के मणिबन्धों कोमिलाकर आगे की अंगुलियों को परस्पर मिलाना चाहिए । शिव को संतुष्ट करनेवाली यह पञ्चमुख मुद्रा कही गई है ॥२०॥जप करने के बाद दश द्रव्योमसे दशांश होम करना चाहिए । १. बिल्वफल २. तिल, ३. खीर, ४. घी, ५. दूध, ५.दही, ७. दूर्वा, ८. वट की समिधा, ९. पलाश की समिधा एवं १०. खैर की समिधायेंदश द्रव्य कहे गये हैं । इन तीनों समिधाओं को घी, शहद और शक्कर में डुबोकरहोम करना चाहिए ॥२१-२२॥अब पीठ शक्तियाँ कहते हैं – वामादिशक्तियोम के साथ शैव पीठ पर शिव का पूजन करना चाहिए । १. वामा, २.ज्येष्ठा, ३. रौद्री, ४. काली चौथी शक्ति कही गई है । इसके बाद ५.कलविकरणी, ६. बलविकरणी, ७. बलप्रमथनी, ८. सर्वभूतदमनी, ९ शक्तियाँ कही गईहैं ॥२२-२४॥तार (ॐ), फिर ‘नमो भगवते सकल’, फिर ‘गुणात्मशक्तियुक्ताय अनन्ताय’ पद, फिर ‘योगपीठात्मने ’ पद और ‘नमः’ इसमन्त्र से पीठ पर पुष्पाञ्जति देकर मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे यहपीठ मन्त्र कहा है ॥२५-२६॥विमर्श – पीठपूजा विधि – वृत्ताकारकर्णिका अष्टदल फिर भूपुर लिख कर यन्त्र बनाना चाहिए । उसी परमहामृत्युञ्जय भगवान् का पूजन करना चाहिए । सर्वप्रथम (१६. १९ में वर्णित)भगवान् मृत्युञ्जय के स्वरुप का ध्यान कर, मानसोपचार से पूजन कर, उनके लिएविधिवत् अर्घ्य स्थापित कर पीठदेवतओं का पीठ के मध्य में इस प्रकार पूजनकरना चाहिए – ॐ आधारशक्तयै नमः, ॐ प्रकृत्यै नमः, ॐ कूंर्माय नमः, ॐ शेषाय नमः, ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ क्षीरसमुद्राय नमः, ॐ श्वेतद्वीपाय नमः, ॐ मणिमण्डपाय नमः, ॐ कल्पवृक्षाय नमः, ॐ मणिवेदिकायै नमः ॐ रत्नसिंहासनाय नमः, फिर आग्नेयादि कोणों में धर्म आदि का तथ पूर्वादि दिशाओम में अधर्म आदि का पूजन करना चाहिए । यथा -ॐ धर्माय नमः, आग्नेये, ॐ ज्ञानाय नमः नैऋत्ये, ॐ वैराग्याय नमः वायव्ये, ॐ ऐश्वर्याय नमः ऐशान्ये, ॐ अधर्माय नमः पूर्वे, ॐ अज्ञानाय नमः दक्षिणे, ॐ अवैराग्याय नमः पश्चिमे, ॐ अनैश्वर्याय नमः उत्तरे ।पुनः पीठ के मध्य में अनन्त आदि का इस प्रकार पूजन करना चाहिए -ॐ अनन्ताय नमः, ॐ पदम्नाभाय नमः, ॐ अं द्वादशकलात्मने सूर्यमण्डलाय नमः, ॐ उं षोडशकलात्मने सोममण्डलाय नमः, ॐ रं दशकलात्मने वहिनण्डलाय नमः, ॐ सं सत्त्वाय नमः, ॐ रं रजसे नमः, ॐ तं तमसे नमः, ॐ आं आत्मने नमः, ॐ पं परमात्मने नमःॐ ह्रीं ज्ञानात्मने नमः ।तत्पश्चात् केशरों में पूर्वादि ८ दिशाओं में तथा मध्य मे वामादि शक्तियोम की पूजा करनी चाहिए.

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