जे इक गुरु की सिख सुणी.
तीरथि नावा जे तिसु भावा, विणु भाणे कि नाइ करी।
जेती सिरठि उपाई वेखा, विणु करमा कि मिलै लई।
मति बिच रतन जवाहर माणिक, जे इक गुरु की सिख सुणी।
गुरा इक देहि बुझाई–
सभना जीआ का इकु दाता, सो मैं बिसरि न जाई।।
जे जुग चारे आरजा। होर दसूणी होई।।
नवा खंडा विचि जाणीऐ। नालि चलै सभु कोई।।
चंगा नाउ रखाइकै। जसु कीरति जगि लेइ।।
जे तिसु नदर न आवई। त बात न पुछै केइ।।
कीटा अंदरि कीटु करि। दोसी दोसु धरे।।
‘नानक’ निरगुणि गुणु करे। गुणुवंतिआ गुणु दे।।
तेहा कोई न सुझई। जि तिसु गुणु कोई करे।।
एक रात नानक अचानक घर छोड़कर चले गए। किसी को पता नहीं, कहां हैं। खोजा गया साधुओं की संगत में, मंदिरों में–जहां संभावना थी–पर कहीं भी वे मिले नहीं। और तब किसी ने कहा, मरघट की तरफ जाते देखा है। भरोसा किसी को न आया। मरघट अपनी मर्जी से कोई जाता ही कैसे है? मरघट ले जाने के लिए तो चार आदमियों की जरूरत पड़ती है। बामुश्किल कोई जाता है। मरा हुआ आदमी भी जाना नहीं चाहता, तो जिंदा आदमी के तो जाने का कोई सवाल नहीं। लेकिन जब नानक को कहीं नहीं पाया, तो लोग मरघट पहुंचे।
मरघट में उन्होंने धूनी जमा रखी थी। बैठे थे ध्यान में। घर के लोगों ने कहा, पागल हो गए हो? घर-द्वार छोड़ कर, बच्चे-पत्नी छोड़ कर यहां क्या कर रहे हो? यह मरघट है, यह पता है?
नानक ने कहा, यहां जो आ गया वह फिर कभी मरता नहीं। और जिसे तुम घर कहते हो, वहां जो भी है वह आज नहीं कल मरेगा। फिर मरघट कौन सी जगह है? जहां लोग मरते हैं वह मरघट? या जहां लोग कभी नहीं मरते वह मरघट? और फिर जब एक दिन यहां आ ही जाना है, तो चार आदमियों के कंधे पर चढ़ कर क्या आना? शोभा नहीं देता। मैं खुद ही चला आया हूं।
यह घटना बड़ी महत्वपूर्ण है। जो होना ही है, उससे नानक का संघर्ष नहीं है। जो होना ही है उसका स्वीकार है। मृत्यु भी होनी है, उसका भी स्वीकार है। और क्या कष्ट देना दूसरों को वहां तक ले जाने के लिए? खुद उठकर ही चले जाना बेहतर है।
जो होगा, उससे हमारा विरोध बना रहता है। हमारी अपनी चाह है, ऐसा न हो। नानक की अपनी कोई चाह नहीं। जो उसकी चाह है; अगर मृत्यु भी उसकी चाह है, तो वह भी नानक को स्वीकार है।
उस रात नानक को लोग समझा-बुझा कर घर ले आए। लेकिन नानक फिर वैसे ही आदमी न रहे जैसे थे। कुछ उनके भीतर मर ही गया। और किसी नए का जन्म हो गया। जब कोई मरता है भीतर पूरी तरह, तभी नए का जन्म होता है। जन्म की वही प्रक्रिया है। मरघट से गुजरना ही होगा। और जो जान कर गुजर जाए, होश से गुजर जाए, उसे नया जन्म मिलता है। वह नया जन्म नया शरीर का जन्म नहीं। वह नया जन्म नयी चेतना का आविर्भाव है।
तुम डरे हो। और जहां भय है वहां भगवान से कोई संबंध न हो सकेगा। तुम जितने पूजा-पाठ कर रहे हो, वे भय के कारण हैं, भगवान के प्रेम में नहीं। तुम तीर्थ जा रहे हो, स्नान कर रहे हो, धूप-दीप जला रहे हो, वे सब भय के कारण हैं, भगवान के प्रेम में नहीं। तुम्हारा धर्म तुम्हारे भय की औषधि है, तुम्हारे आनंद का उत्सव नहीं। तुम करते हो सब सुरक्षा के लिए, तुम इंतजाम सब जुटाते हो; जैसे तुम धन जुटाते हो, मकान बनाते हो, बैंक बैलेंस बनाते हो, बीमा करवाते हो, ऐसा ही भगवान भी तुम्हारा बीमा है। तुम्हारे तीर्थ, तुम्हारे स्नान, तुम्हारे पूजा-पाठ, सब तुम्हारी सुरक्षाएं हैं भय की।
और भय से कभी कोई उस तक पहुंचा? भय कोई पहुंचने का ढंग है? भय तो टूटने का ढंग है। प्रेम जुड़ने का ढंग है। भय से तो दूरी होती है, प्रेम से निकटता होती है। और प्रेम और भय कहीं भी नहीं मिलते। जब भय पूरा छूट जाता है तब प्रेम का उदय होता है। जब तक भय बना रहता है तब तक तुम घृणा कर सकते हो, घृणा को साज-संवार सकते हो, लेकिन प्रेम नहीं कर सकते।
कैसे तुम प्रेम करोगे जिससे तुम भयभीत हो? जिससे भय है उससे तुम संघर्ष करोगे; समर्पण कैसे करोगे। और अगर समर्पण भी करोगे, तो वह भी संघर्ष की ही एक नयी तरकीब होगी, कि चलो, शायद इससे ही भय से छुटकारा हो जाए।
लोग तीर्थ जा रहे हैं, स्नान कर रहे हैं, इस स्नान में कोई उत्सव नहीं है। केवल पापों से छुटकारे की आकांक्षा है। जो बुरा किया है, सोचते हैं, गंगा में स्नान से बह जाएगा। लेकिन बुरा तुमने किया है, और गंगा में स्नान से कैसे बह जाएगा? गंगा का दोष क्या है तुम्हारी बुराई में? बुरा तुम करोगे, गंगा किस लिए धोने को बहती रहेगी? और बुराई तुमने जो की है, वह शरीर की तो नहीं है, चेतना की है। गंगा का पानी उस चेतना को छू भी कैसे पाएगा? हां, तुम गंदे हो, गंगा में स्नान से स्वच्छ हो जाओगे। धूल लगी है शरीर पर, गंगा धो देगी। लेकिन धूल लगी है तुम में, वह शरीर पर लगी नहीं है, तो गंगा क्या करेगी?
शरीर को धोने के लिए तो गंगा ठीक, आत्मा को धोने का वह उपाय नहीं। कोई और गंगा खोजनी पड़ेगी। पुरानी कथा है कि एक गंगा तो जमीन पर बहती है और एक गंगा स्वर्ग में। तुम्हें स्वर्ग की गंगा खोजनी पड़ेगी। क्योंकि पृथ्वी की गंगा शरीर को छुएगी, पृथ्वी की है, शरीर तक उसकी पहुंच है। स्वर्ग की गंगा तुम्हें छुएगी, तुम्हें धो देगी। लेकिन स्वर्ग की गंगा तुम कैसे खोजोगे? कहां खोजोगे? ये सूत्र स्वर्ग की गंगा की खोज के लिए कहे गए हैं।
यदि मैं उसको भा गया, तो मैंने तीर्थों में स्नान कर लिया।’
औम सिद्धा.
तीरथि नावा जे तिसु भावा, विणु भाणे कि नाइ करी।
जेती सिरठि उपाई वेखा, विणु करमा कि मिलै लई।
मति बिच रतन जवाहर माणिक, जे इक गुरु की सिख सुणी।
गुरा इक देहि बुझाई–
सभना जीआ का इकु दाता, सो मैं बिसरि न जाई।।
जे जुग चारे आरजा। होर दसूणी होई।।
नवा खंडा विचि जाणीऐ। नालि चलै सभु कोई।।
चंगा नाउ रखाइकै। जसु कीरति जगि लेइ।।
जे तिसु नदर न आवई। त बात न पुछै केइ।।
कीटा अंदरि कीटु करि। दोसी दोसु धरे।।
‘नानक’ निरगुणि गुणु करे। गुणुवंतिआ गुणु दे।।
तेहा कोई न सुझई। जि तिसु गुणु कोई करे।।
एक रात नानक अचानक घर छोड़कर चले गए। किसी को पता नहीं, कहां हैं। खोजा गया साधुओं की संगत में, मंदिरों में–जहां संभावना थी–पर कहीं भी वे मिले नहीं। और तब किसी ने कहा, मरघट की तरफ जाते देखा है। भरोसा किसी को न आया। मरघट अपनी मर्जी से कोई जाता ही कैसे है? मरघट ले जाने के लिए तो चार आदमियों की जरूरत पड़ती है। बामुश्किल कोई जाता है। मरा हुआ आदमी भी जाना नहीं चाहता, तो जिंदा आदमी के तो जाने का कोई सवाल नहीं। लेकिन जब नानक को कहीं नहीं पाया, तो लोग मरघट पहुंचे।
मरघट में उन्होंने धूनी जमा रखी थी। बैठे थे ध्यान में। घर के लोगों ने कहा, पागल हो गए हो? घर-द्वार छोड़ कर, बच्चे-पत्नी छोड़ कर यहां क्या कर रहे हो? यह मरघट है, यह पता है?
नानक ने कहा, यहां जो आ गया वह फिर कभी मरता नहीं। और जिसे तुम घर कहते हो, वहां जो भी है वह आज नहीं कल मरेगा। फिर मरघट कौन सी जगह है? जहां लोग मरते हैं वह मरघट? या जहां लोग कभी नहीं मरते वह मरघट? और फिर जब एक दिन यहां आ ही जाना है, तो चार आदमियों के कंधे पर चढ़ कर क्या आना? शोभा नहीं देता। मैं खुद ही चला आया हूं।
यह घटना बड़ी महत्वपूर्ण है। जो होना ही है, उससे नानक का संघर्ष नहीं है। जो होना ही है उसका स्वीकार है। मृत्यु भी होनी है, उसका भी स्वीकार है। और क्या कष्ट देना दूसरों को वहां तक ले जाने के लिए? खुद उठकर ही चले जाना बेहतर है।
जो होगा, उससे हमारा विरोध बना रहता है। हमारी अपनी चाह है, ऐसा न हो। नानक की अपनी कोई चाह नहीं। जो उसकी चाह है; अगर मृत्यु भी उसकी चाह है, तो वह भी नानक को स्वीकार है।
उस रात नानक को लोग समझा-बुझा कर घर ले आए। लेकिन नानक फिर वैसे ही आदमी न रहे जैसे थे। कुछ उनके भीतर मर ही गया। और किसी नए का जन्म हो गया। जब कोई मरता है भीतर पूरी तरह, तभी नए का जन्म होता है। जन्म की वही प्रक्रिया है। मरघट से गुजरना ही होगा। और जो जान कर गुजर जाए, होश से गुजर जाए, उसे नया जन्म मिलता है। वह नया जन्म नया शरीर का जन्म नहीं। वह नया जन्म नयी चेतना का आविर्भाव है।
तुम डरे हो। और जहां भय है वहां भगवान से कोई संबंध न हो सकेगा। तुम जितने पूजा-पाठ कर रहे हो, वे भय के कारण हैं, भगवान के प्रेम में नहीं। तुम तीर्थ जा रहे हो, स्नान कर रहे हो, धूप-दीप जला रहे हो, वे सब भय के कारण हैं, भगवान के प्रेम में नहीं। तुम्हारा धर्म तुम्हारे भय की औषधि है, तुम्हारे आनंद का उत्सव नहीं। तुम करते हो सब सुरक्षा के लिए, तुम इंतजाम सब जुटाते हो; जैसे तुम धन जुटाते हो, मकान बनाते हो, बैंक बैलेंस बनाते हो, बीमा करवाते हो, ऐसा ही भगवान भी तुम्हारा बीमा है। तुम्हारे तीर्थ, तुम्हारे स्नान, तुम्हारे पूजा-पाठ, सब तुम्हारी सुरक्षाएं हैं भय की।
और भय से कभी कोई उस तक पहुंचा? भय कोई पहुंचने का ढंग है? भय तो टूटने का ढंग है। प्रेम जुड़ने का ढंग है। भय से तो दूरी होती है, प्रेम से निकटता होती है। और प्रेम और भय कहीं भी नहीं मिलते। जब भय पूरा छूट जाता है तब प्रेम का उदय होता है। जब तक भय बना रहता है तब तक तुम घृणा कर सकते हो, घृणा को साज-संवार सकते हो, लेकिन प्रेम नहीं कर सकते।
कैसे तुम प्रेम करोगे जिससे तुम भयभीत हो? जिससे भय है उससे तुम संघर्ष करोगे; समर्पण कैसे करोगे। और अगर समर्पण भी करोगे, तो वह भी संघर्ष की ही एक नयी तरकीब होगी, कि चलो, शायद इससे ही भय से छुटकारा हो जाए।
लोग तीर्थ जा रहे हैं, स्नान कर रहे हैं, इस स्नान में कोई उत्सव नहीं है। केवल पापों से छुटकारे की आकांक्षा है। जो बुरा किया है, सोचते हैं, गंगा में स्नान से बह जाएगा। लेकिन बुरा तुमने किया है, और गंगा में स्नान से कैसे बह जाएगा? गंगा का दोष क्या है तुम्हारी बुराई में? बुरा तुम करोगे, गंगा किस लिए धोने को बहती रहेगी? और बुराई तुमने जो की है, वह शरीर की तो नहीं है, चेतना की है। गंगा का पानी उस चेतना को छू भी कैसे पाएगा? हां, तुम गंदे हो, गंगा में स्नान से स्वच्छ हो जाओगे। धूल लगी है शरीर पर, गंगा धो देगी। लेकिन धूल लगी है तुम में, वह शरीर पर लगी नहीं है, तो गंगा क्या करेगी?
शरीर को धोने के लिए तो गंगा ठीक, आत्मा को धोने का वह उपाय नहीं। कोई और गंगा खोजनी पड़ेगी। पुरानी कथा है कि एक गंगा तो जमीन पर बहती है और एक गंगा स्वर्ग में। तुम्हें स्वर्ग की गंगा खोजनी पड़ेगी। क्योंकि पृथ्वी की गंगा शरीर को छुएगी, पृथ्वी की है, शरीर तक उसकी पहुंच है। स्वर्ग की गंगा तुम्हें छुएगी, तुम्हें धो देगी। लेकिन स्वर्ग की गंगा तुम कैसे खोजोगे? कहां खोजोगे? ये सूत्र स्वर्ग की गंगा की खोज के लिए कहे गए हैं।
यदि मैं उसको भा गया, तो मैंने तीर्थों में स्नान कर लिया।’
औम सिद्धा.

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