मैंने तो छोड़ ही दिया अपनी तरफ से तन। उस प्यारे को पाना है तो अब क्या
पकड़ूं तन को! यह जीवन तो मेरी तरफ से गया; मेरे हाथ में अब इस जीवन की कोई
पकड़ नहीं है। अब तो सारी ऊर्जा उसी की तरफ जा रही है। और एक लपट उठी है
विरह की। अब उसके बिना एक पल नहीं कटता।
दोउ नैन बने गिरि के झरना
उठी विरह की आगि है, जी।’
साहिब के दास कहाय यारो,
जगत् की आस न राखिए, जी।’
कहते हैं कि मित्रो, साहिब के दास कहाय! कहते तो हो कि प्रभु के चरणों की आशा लगाए हैं; और फिर भी संसार में भी तुम्हारी आशा उलझी हुई है! कहते हो प्रभु को पाना है; और संसार को भी पाने में लगे रहते हो! कहते हो प्रभु की तरफ ही सारा जीवन बह रहा है; फिर भी संसार पर पकड़ बनी रहती है, पकड़ नहीं छूटती!
साहिब के दास कहाय यारो,
जगत् की आस न राखिए, जी।’
अब तो आशा जगत् से छोड़ो। सारी आशा उसी पर आरोपित करो। जब सारी इच्छाएं और सारी आशाएं और सारी तृष्णाएं और सारी चाहत एक प्रबल धार बन जाती है वेगवान और परमात्मा की तरफ बहने लगती है, तभी मिलन है। ऐसे खंड-खंड रहोगे, एक हाथ यहां जा रहा है, एक हाथ वहां जा रहा है, एक धार यहां बह रही है, एक धार पूरब, एक धार पश्चिम; एक उत्तर, एक दक्षिण–तो तुम पहुंच न पाओगे सागर तक। सागर तक जाना हो तो एकजुट हो जाओ, एकाग्र हो जाओ। सारी आशाओं को उसी पर टिका दो। सारी आशाएं, जैसे किरणों को इकट्ठा एक जगह डाल दो तो आग पैदा हो जाती है, ऐसे ही जब सारी आशाएं समग्रीभूत रूप से परमात्मा पर आरोपित हो जाती हैं तो अग्नि पैदा होती है। अग्नि–जिस में तुम जल जाओगे।
तुम, जो कि झूठे हो।
तुम, जो कि मिथ्या हो।
तुम, जो कि माया हो।
और फिर जो तुम्हारी राख में पड़ा हुआ जो शेष रह जाएगा–वही परम धन है, वही परमात्मा है, या कहो कि वही तुम्हारा असली रूप है। वही तुम असली हो।
एक नकली मैं है तुम्हारा और एक असली मैं। नकली मैं संसार में आशा रखता है; असली मैं परमात्मा में आशा रखता है।
साहिब के दास कहाय यारो
जगत् की आस न राखिए, जी।
समरथ स्वामी को जब पाया,
जगत् से दीन न भाखिए, जी।।’
जब प्रभु की तरफ चल पड़े, जब सम्राटों का सम्राट् तुम्हारी आंखों में आ गया, तो अब तुम संसार के सामने भीख मांगते हो! अभी भी संसार से आशा रखते हो कि कुछ मिल जाए! अभी भी कौड़ियां बटोरने का मन है! अभी भी सपने देख रहे हो!
समरथ स्वामी को जब पाया
जगत् से दीन न भाखिए, जी।’
अब छोड़ो यह दीनता। अब यह भिखमंगापन छोड़ो। यहां मांग तो लिया जन्मों-जन्मों तक, क्या पाया? भिक्षापात्र खाली का खाली है; ज़रा भी भरा नहीं। जितना मांगा, उतनी ही मांग बढ़ती गयी। जितना चाहा, उतनी ही चाह प्रगाढ़ होती गयी। यहां कोई भी चीज तो कभी तृप्त नहीं हुई। कभी कोई संतुष्ट नहीं हुआ।
साहिब के घर में कौन कमी,
किस बात को अंते आखिए, जी।’
क्या तुम सोचते हो कि साहिब के घर में कुछ कमी है, कि तुम्हें इधर-उधर भी मांगना पड़ेगा? संसार के सामने भिक्षापात्र फैलाना पड़ेगा? तो तुम्हारा भरोसा ही नहीं है। तो तुम्हारे भीतर अभी श्रद्धा की परम घटना नहीं घटी। जब श्रद्धा की परम घटना घटती है तो साहब काफी है। वह देनेवाला–आखिरी देनेवाला–मिल गया। जिसने जीवन दिया, वही मिल गया। जिसने तुम्हें प्राण दिए, वही मिल गया उसके घर में सब है।
साहिब के घर में कौन कमी
किस बात को अंते आखिए, जी।
चैतन्य जो दुःख सुख लाख परै
वही नाम-सुधा-रस चाखिए, जी।।’
और अगर सुख आएं, दुःख आएं, तो डांवाडोल मत होना। तुम तो उसके नाम-रस को ही चखते जाना। तुम तो उसके नाम-रस में ही डुबकी मारते जाना। तुम तो पीए जाना प्याले पर प्याले उसके ही नाम-रस के। सुख आए तो भी रुकना मत। यह मत कहना कि अभी सुख आया, थोड़ा सुख भोग लूं, फिर राम को याद कर लूंगा। और दुःख आए तो भी रुकना मत, कि ज़रा इस दुःख से लड़ लूं, फिर राम को याद कर लूंगा। सुख आएं, आने दो; दुःख आएं, आने दो। आने दो, जाने दो। तुम डूबे रहो–अपने रस में विमुग्ध.
औम सिद्धा.
दोउ नैन बने गिरि के झरना
उठी विरह की आगि है, जी।’
साहिब के दास कहाय यारो,
जगत् की आस न राखिए, जी।’
कहते हैं कि मित्रो, साहिब के दास कहाय! कहते तो हो कि प्रभु के चरणों की आशा लगाए हैं; और फिर भी संसार में भी तुम्हारी आशा उलझी हुई है! कहते हो प्रभु को पाना है; और संसार को भी पाने में लगे रहते हो! कहते हो प्रभु की तरफ ही सारा जीवन बह रहा है; फिर भी संसार पर पकड़ बनी रहती है, पकड़ नहीं छूटती!
साहिब के दास कहाय यारो,
जगत् की आस न राखिए, जी।’
अब तो आशा जगत् से छोड़ो। सारी आशा उसी पर आरोपित करो। जब सारी इच्छाएं और सारी आशाएं और सारी तृष्णाएं और सारी चाहत एक प्रबल धार बन जाती है वेगवान और परमात्मा की तरफ बहने लगती है, तभी मिलन है। ऐसे खंड-खंड रहोगे, एक हाथ यहां जा रहा है, एक हाथ वहां जा रहा है, एक धार यहां बह रही है, एक धार पूरब, एक धार पश्चिम; एक उत्तर, एक दक्षिण–तो तुम पहुंच न पाओगे सागर तक। सागर तक जाना हो तो एकजुट हो जाओ, एकाग्र हो जाओ। सारी आशाओं को उसी पर टिका दो। सारी आशाएं, जैसे किरणों को इकट्ठा एक जगह डाल दो तो आग पैदा हो जाती है, ऐसे ही जब सारी आशाएं समग्रीभूत रूप से परमात्मा पर आरोपित हो जाती हैं तो अग्नि पैदा होती है। अग्नि–जिस में तुम जल जाओगे।
तुम, जो कि झूठे हो।
तुम, जो कि मिथ्या हो।
तुम, जो कि माया हो।
और फिर जो तुम्हारी राख में पड़ा हुआ जो शेष रह जाएगा–वही परम धन है, वही परमात्मा है, या कहो कि वही तुम्हारा असली रूप है। वही तुम असली हो।
एक नकली मैं है तुम्हारा और एक असली मैं। नकली मैं संसार में आशा रखता है; असली मैं परमात्मा में आशा रखता है।
साहिब के दास कहाय यारो
जगत् की आस न राखिए, जी।
समरथ स्वामी को जब पाया,
जगत् से दीन न भाखिए, जी।।’
जब प्रभु की तरफ चल पड़े, जब सम्राटों का सम्राट् तुम्हारी आंखों में आ गया, तो अब तुम संसार के सामने भीख मांगते हो! अभी भी संसार से आशा रखते हो कि कुछ मिल जाए! अभी भी कौड़ियां बटोरने का मन है! अभी भी सपने देख रहे हो!
समरथ स्वामी को जब पाया
जगत् से दीन न भाखिए, जी।’
अब छोड़ो यह दीनता। अब यह भिखमंगापन छोड़ो। यहां मांग तो लिया जन्मों-जन्मों तक, क्या पाया? भिक्षापात्र खाली का खाली है; ज़रा भी भरा नहीं। जितना मांगा, उतनी ही मांग बढ़ती गयी। जितना चाहा, उतनी ही चाह प्रगाढ़ होती गयी। यहां कोई भी चीज तो कभी तृप्त नहीं हुई। कभी कोई संतुष्ट नहीं हुआ।
साहिब के घर में कौन कमी,
किस बात को अंते आखिए, जी।’
क्या तुम सोचते हो कि साहिब के घर में कुछ कमी है, कि तुम्हें इधर-उधर भी मांगना पड़ेगा? संसार के सामने भिक्षापात्र फैलाना पड़ेगा? तो तुम्हारा भरोसा ही नहीं है। तो तुम्हारे भीतर अभी श्रद्धा की परम घटना नहीं घटी। जब श्रद्धा की परम घटना घटती है तो साहब काफी है। वह देनेवाला–आखिरी देनेवाला–मिल गया। जिसने जीवन दिया, वही मिल गया। जिसने तुम्हें प्राण दिए, वही मिल गया उसके घर में सब है।
साहिब के घर में कौन कमी
किस बात को अंते आखिए, जी।
चैतन्य जो दुःख सुख लाख परै
वही नाम-सुधा-रस चाखिए, जी।।’
और अगर सुख आएं, दुःख आएं, तो डांवाडोल मत होना। तुम तो उसके नाम-रस को ही चखते जाना। तुम तो उसके नाम-रस में ही डुबकी मारते जाना। तुम तो पीए जाना प्याले पर प्याले उसके ही नाम-रस के। सुख आए तो भी रुकना मत। यह मत कहना कि अभी सुख आया, थोड़ा सुख भोग लूं, फिर राम को याद कर लूंगा। और दुःख आए तो भी रुकना मत, कि ज़रा इस दुःख से लड़ लूं, फिर राम को याद कर लूंगा। सुख आएं, आने दो; दुःख आएं, आने दो। आने दो, जाने दो। तुम डूबे रहो–अपने रस में विमुग्ध.
औम सिद्धा.

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