जिसने इतना दिया है, अगर उसने कुछ बचा रखा है, तो उस बचाने में कुछ राज
होगा। अगर उसने कुछ बचा रखा है, तो उस बचाने में कोई कारण होगा। शायद मैं
अभी तैयार नहीं। शायद अभी योग्यता चाहिए। शायद अभी मैं पात्र नहीं।
और समय के पहले कुछ ऊपर आ जाए तो सुख नहीं लाता, दुख लाता है। हर चीज का समय है। हर चीज की परिपक्वता है। जब मैं पकूंगा तब वह देगा। क्योंकि उसके देने का इतना अपरंपार है मार्ग। उसके हाथ हजारों फैले हुए हैं।
हिंदू परमात्मा की हजारों हाथों से कल्पना करते हैं। उस कल्पना में बड़ा प्यार है। वे यह कहते हैं कि वह हजार हाथों से देता है, दो हाथ नहीं हैं उसके। तुम ले न पाओगे, तुम्हारे दो हाथ हैं। तुम कितना संभालोगे? वह हजार हाथों से दे रहा है। लेकिन ठीक समय, समय की ठीक प्र्रतीक्षा, शिकायत का अभाव–और वर्षा होनी शुरू हो जाती है।
नानक कहते हैं, गुणगान भी करते हैं लोग, तो दो-दो कर मांगते चले जाते हैं। और दाता देता ही चला जाता है। और अंधों को दिखाई ही नहीं पड़ता। वे मांगते ही रहते हैं कि दो, और दो। चारों तरफ वर्षा हो रही है और लोग चिल्लाते रहते हैं कि हम प्यासे हैं। जैसे शिकायत से मोह बन गया है। जैसे दुख से लगाव बन गया है।
‘फिर उसके आगे क्या रखा जाए कि उसके दरबार का दर्शन हो?’
यह बड़ी महत्वपूर्ण बात है। नानक कह रहे हैं कि उसने इतना दिया है, मांगने को कुछ छोड़ा नहीं। जब शिकायत हट जाती है और अहोभाव पैदा होता है और हम धन्यवाद देने जाते हैं, तो क्या रखें उसके चरणों में? क्या भेंट ले जाएं उसके द्वार पर?
फेरि कि अगै रखीऐ। जितु दिसै दरबारु।।
उसके दरबार में हम क्या रखें? धन्यवाद देने के लिए क्या भेंट ले जाएं? क्या चढ़ाएं उसके चरणों में? कैसे करें पूजा? कैसे करें अर्चना? तुम फूल ले जाते हो तोड़ कर–उसके ही फूल। बेहतर थे वृक्ष पर; जीवित थे। तुमने तोड़ कर मार डाले। उसके ही फूल मार कर तुम उसी के ही चरणों में चढ़ा आते हो। और तुम्हें शर्म भी नहीं आती! तुम उसे दोगे क्या? सब उसका ही दिया हुआ है।
तुम धन लगा कर मंदिर खड़ा कर दो, नया गुरुद्वारा बना दो, मस्जिद निर्मित कर दो, पर तुम कर क्या रहे हो? उसकी ही दी हुई चीजों को उसे वापस लौटा रहे हो। फिर भी तुम अकड़े नहीं समाते हो। तुम कहते हो, मैंने मंदिर बनाया। मैंने इतने गुरुद्वारे बनाए। मैंने इतना भोजन बांटा, इतने वस्त्र बांटे। तुम अकड़ते हो। तुम थोड़ा सा दे क्या देते हो, तुम्हारे अहंकार का अंत नहीं होता।
इससे क्या खबर मिलती है? इससे खबर मिलती है कि तुम समझ ही न पाए कि जीवन ने जो तुम्हें दिया है उसे वापस लौटाने में तुम्हारा क्या है? तुम यह भेंट उसे देने जा रहे हो और शघमदा भी नहीं हो।
उसके चरणों में क्या रखें? नानक पूछते हैं, उसके आगे क्या रखें कि उसके दरबार का दर्शन हो? कि हम उसके निकट आ जाएं, कि हमारी भेंट स्वीकार हो जाए। क्या रखें? केसर में रंगे हुए चावल? खरीदे गए फूल? तोड़े हुए पत्ते? धन, दौलत, क्या रखें?
नहीं, कुछ भी रखने से न चलेगा। अगर तुम यह समझ जाओ कि सभी उसका है, बस! भेंट स्वीकार हो गयी। जब तक तुम यह समझ रहे हो कि कुछ मेरा है, तभी तुम रखने की बात सोच रहे हो। जब तक तुम समझते हो मैं खुद मालिक हूं, चाहूं तो भेंट कर सकता हूं, तभी तक तुम भूल से भरे हो। तुम कुछ भी रख दो, सारा साम्राज्य रख दो अपना, तो भी कुछ तुमने रखा नहीं। क्योंकि सभी उसका था। तुम उसके हो। तुमने जो कमा लिया, तुमने जो इकट्ठा कर लिया, वह भी उसी का खेल है।
तो नानक कहते हैं, क्या रखें कि तेरे दरबार का दर्शन हो? कि तेरी प्रतीति मिले? कि तेरा साक्षात हो? कि तेरी आंख से आंख मिले? क्या लाएं तुझे चढ़ाने को?
अगर तुम्हें यह समझ में आ जाए कि सभी उसका है, कुछ ले जाने की जरूरत न रही। फूल वृक्षों पर ही उसी को चढ़े हुए हैं। सब उसी को चढ़ा हुआ है। चांदत्तारे उसको चढ़े हुए हैं। तुम्हारे घी के दीए क्या करेंगे और अब? चांद-सूरज उसको चढ़े हुए हैं। तुम थोड़े से घी के दीए जला कर चढ़ा दोगे तो क्या होगा? व्यक्ति अगर ठीक से आंख खोल कर देखे तो सारा अस्तित्व उसकी अर्चना में है। यही तो अर्थ है साहब का। वह सब का मालिक है, सब उसको चढ़ा हुआ है।
इसलिए नानक कहते हैं, क्या लाएं? यह प्रश्न है नानक का, क्या चढ़ाएं?
‘मुंह से कौन सी बोली बोलें जिसे सुन कर वह प्यार करे?’
क्या कहें उससे? कौन से शब्दों का उपयोग करें? कैसे उसे रिझाएं? कैसे उसे राजी करें? कैसे हम करें कुछ कि उसका प्यार बरसे?
उत्तर नानक नहीं देते मालूम पड़ते हैं। प्रश्न उठा कर छोड़ दिए हैं। वही कला है। क्योंकि वे यह कह रहे हैं कि हम कुछ भी बोलें, वही हम से बोल रहा है। उसके ही शब्द उसी को चढ़ाएं इसमें क्या कुशलता है? उसका ही बासा कर के उसी को लौटा दें? यह सिर्फ अज्ञानी कर सकता है। ज्ञानी तो पाता है कि चढ़ाने को कुछ भी न बचा, क्योंकि मैं खुद भी चढ़ा हुआ हूं। और ज्ञानी पाता है कि कोई शब्द उसकी प्रार्थना न बन सकेंगे, क्योंकि सभी शब्द उसके हैं। वही बोल रहा है। वही धड़क रहा है हृदय में। वही श्वासों की श्वास है। तो फिर ज्ञानी क्या करे?
नानक कहते हैं, ‘अमृत वेला में सत्य नाम की महिमा का ध्यान करो।’
कुछ करने को नहीं है और। समझदार क्या करे?
‘अमृत वेला में सत्य नाम की महिमा का ध्यान करो।’
यह थोड़ा समझ लेना जरूरी है। जिसे हम संध्या कहते हैं, उसे नानक ने अमृत वेला कहा है। संध्या से भी कीमती शब्द अमृत वेला है। हम तो हजारों साल से श्रम कर रहे हैं–जीवन के सत्य की खोज, चैतन्य की खोज, और कहां-कहां से मार्ग हो सकते हैं। ऐसा कुछ भी हिंदुओं ने छोड़ा नहीं है, जो छूट गया हो; जो उनकी जानकारी में न आ गया हो। हजारों साल के बाद हमको पता चला धीरे-धीरे–उपनिषद उसकी चर्चा करते हैं–कि चौबीस घंटे में दो संध्या क्षण हैं।
रात जब तुम सोने जाते हो तो सोने और जागने के बीच एक क्षण ऐसा है जब न तो तुम सोए होते हो, न जागे होते हो। उस समय जैसे तुम्हारी चेतना गेयर बदलती है। अगर तुम कार चलाते हो तो तुम्हें पता है कि एक गेयर से दूसरे गेयर में गाड़ी डालते वक्त बीच को क्षण-भर को गाड़ी न्यूट्रल गेयर से गुजरती है। एक गेयर से दूसरे गेयर में जाते वक्त क्षण भर को गाड़ी किसी गेयर में नहीं होती.
नींद और जागरण दो अवस्थाएं हैं; बिलकुल अलग, एकदम अलग, जागे में तुम कुछ और थे नींद में तुम बिलकुल कुछ और हो जाते हो। जागते तुम दुखी थे, रो रहे थे, दीन थे, दरिद्र थे; नींद में तुम सम्राट हो जाते हो। और संदेह भी नहीं आता कि मैं भिखारी कैसे सम्राट होने का सपना देख रहा हूं! तुम बिलकुल दूसरे गेयर में हो। चेतना का बिलकुल दूसरा तल है, जिसका पहले तल से कोई संबंध न रह गया। नहीं तो थोड़ी तो याद आती। थोड़ा तो स्मरण होता कि मैं भिखमंगा और यह क्या देख रहा हूं कि मैं सम्राट हो गया? नहीं, जब तुम सपना देखते हो, सपने पर पूरा भरोसा आता है। ऐसा लगता है कि बारह घंटे जाग कर तुमने जो जीवन जीया था, वह जीवन अलग प्रकोष्ठ है। और रात तुम सो कर जो जीवन देख रहे हो, वह अलग प्रकोष्ठ है। तुम दूसरी ही दुनिया में चले आए। दिन में तुम साधु थे, रात तुम असाधु हो। कि दिन में असाधु थे, रात साधु हो गए। संदेह भी पैदा नहीं होता। कभी तुम्हें सपने में संदेह पैदा हुआ है? अगर सपने में संदेह पैदा हो जाए तो सपना उसी वक्त टूट जाएगा। क्योंकि संदेह, जागरण चेतना का हिस्सा है। सपने में संदेह भी पैदा नहीं होता। यह भी खयाल नहीं आता कि मैं सपना देख रहा हूं। अगर यह खयाल आ जाए कि यह सपना है तो सपना तत्क्षण टूट जाएगा.
औम सिद्धा.
और समय के पहले कुछ ऊपर आ जाए तो सुख नहीं लाता, दुख लाता है। हर चीज का समय है। हर चीज की परिपक्वता है। जब मैं पकूंगा तब वह देगा। क्योंकि उसके देने का इतना अपरंपार है मार्ग। उसके हाथ हजारों फैले हुए हैं।
हिंदू परमात्मा की हजारों हाथों से कल्पना करते हैं। उस कल्पना में बड़ा प्यार है। वे यह कहते हैं कि वह हजार हाथों से देता है, दो हाथ नहीं हैं उसके। तुम ले न पाओगे, तुम्हारे दो हाथ हैं। तुम कितना संभालोगे? वह हजार हाथों से दे रहा है। लेकिन ठीक समय, समय की ठीक प्र्रतीक्षा, शिकायत का अभाव–और वर्षा होनी शुरू हो जाती है।
नानक कहते हैं, गुणगान भी करते हैं लोग, तो दो-दो कर मांगते चले जाते हैं। और दाता देता ही चला जाता है। और अंधों को दिखाई ही नहीं पड़ता। वे मांगते ही रहते हैं कि दो, और दो। चारों तरफ वर्षा हो रही है और लोग चिल्लाते रहते हैं कि हम प्यासे हैं। जैसे शिकायत से मोह बन गया है। जैसे दुख से लगाव बन गया है।
‘फिर उसके आगे क्या रखा जाए कि उसके दरबार का दर्शन हो?’
यह बड़ी महत्वपूर्ण बात है। नानक कह रहे हैं कि उसने इतना दिया है, मांगने को कुछ छोड़ा नहीं। जब शिकायत हट जाती है और अहोभाव पैदा होता है और हम धन्यवाद देने जाते हैं, तो क्या रखें उसके चरणों में? क्या भेंट ले जाएं उसके द्वार पर?
फेरि कि अगै रखीऐ। जितु दिसै दरबारु।।
उसके दरबार में हम क्या रखें? धन्यवाद देने के लिए क्या भेंट ले जाएं? क्या चढ़ाएं उसके चरणों में? कैसे करें पूजा? कैसे करें अर्चना? तुम फूल ले जाते हो तोड़ कर–उसके ही फूल। बेहतर थे वृक्ष पर; जीवित थे। तुमने तोड़ कर मार डाले। उसके ही फूल मार कर तुम उसी के ही चरणों में चढ़ा आते हो। और तुम्हें शर्म भी नहीं आती! तुम उसे दोगे क्या? सब उसका ही दिया हुआ है।
तुम धन लगा कर मंदिर खड़ा कर दो, नया गुरुद्वारा बना दो, मस्जिद निर्मित कर दो, पर तुम कर क्या रहे हो? उसकी ही दी हुई चीजों को उसे वापस लौटा रहे हो। फिर भी तुम अकड़े नहीं समाते हो। तुम कहते हो, मैंने मंदिर बनाया। मैंने इतने गुरुद्वारे बनाए। मैंने इतना भोजन बांटा, इतने वस्त्र बांटे। तुम अकड़ते हो। तुम थोड़ा सा दे क्या देते हो, तुम्हारे अहंकार का अंत नहीं होता।
इससे क्या खबर मिलती है? इससे खबर मिलती है कि तुम समझ ही न पाए कि जीवन ने जो तुम्हें दिया है उसे वापस लौटाने में तुम्हारा क्या है? तुम यह भेंट उसे देने जा रहे हो और शघमदा भी नहीं हो।
उसके चरणों में क्या रखें? नानक पूछते हैं, उसके आगे क्या रखें कि उसके दरबार का दर्शन हो? कि हम उसके निकट आ जाएं, कि हमारी भेंट स्वीकार हो जाए। क्या रखें? केसर में रंगे हुए चावल? खरीदे गए फूल? तोड़े हुए पत्ते? धन, दौलत, क्या रखें?
नहीं, कुछ भी रखने से न चलेगा। अगर तुम यह समझ जाओ कि सभी उसका है, बस! भेंट स्वीकार हो गयी। जब तक तुम यह समझ रहे हो कि कुछ मेरा है, तभी तुम रखने की बात सोच रहे हो। जब तक तुम समझते हो मैं खुद मालिक हूं, चाहूं तो भेंट कर सकता हूं, तभी तक तुम भूल से भरे हो। तुम कुछ भी रख दो, सारा साम्राज्य रख दो अपना, तो भी कुछ तुमने रखा नहीं। क्योंकि सभी उसका था। तुम उसके हो। तुमने जो कमा लिया, तुमने जो इकट्ठा कर लिया, वह भी उसी का खेल है।
तो नानक कहते हैं, क्या रखें कि तेरे दरबार का दर्शन हो? कि तेरी प्रतीति मिले? कि तेरा साक्षात हो? कि तेरी आंख से आंख मिले? क्या लाएं तुझे चढ़ाने को?
अगर तुम्हें यह समझ में आ जाए कि सभी उसका है, कुछ ले जाने की जरूरत न रही। फूल वृक्षों पर ही उसी को चढ़े हुए हैं। सब उसी को चढ़ा हुआ है। चांदत्तारे उसको चढ़े हुए हैं। तुम्हारे घी के दीए क्या करेंगे और अब? चांद-सूरज उसको चढ़े हुए हैं। तुम थोड़े से घी के दीए जला कर चढ़ा दोगे तो क्या होगा? व्यक्ति अगर ठीक से आंख खोल कर देखे तो सारा अस्तित्व उसकी अर्चना में है। यही तो अर्थ है साहब का। वह सब का मालिक है, सब उसको चढ़ा हुआ है।
इसलिए नानक कहते हैं, क्या लाएं? यह प्रश्न है नानक का, क्या चढ़ाएं?
‘मुंह से कौन सी बोली बोलें जिसे सुन कर वह प्यार करे?’
क्या कहें उससे? कौन से शब्दों का उपयोग करें? कैसे उसे रिझाएं? कैसे उसे राजी करें? कैसे हम करें कुछ कि उसका प्यार बरसे?
उत्तर नानक नहीं देते मालूम पड़ते हैं। प्रश्न उठा कर छोड़ दिए हैं। वही कला है। क्योंकि वे यह कह रहे हैं कि हम कुछ भी बोलें, वही हम से बोल रहा है। उसके ही शब्द उसी को चढ़ाएं इसमें क्या कुशलता है? उसका ही बासा कर के उसी को लौटा दें? यह सिर्फ अज्ञानी कर सकता है। ज्ञानी तो पाता है कि चढ़ाने को कुछ भी न बचा, क्योंकि मैं खुद भी चढ़ा हुआ हूं। और ज्ञानी पाता है कि कोई शब्द उसकी प्रार्थना न बन सकेंगे, क्योंकि सभी शब्द उसके हैं। वही बोल रहा है। वही धड़क रहा है हृदय में। वही श्वासों की श्वास है। तो फिर ज्ञानी क्या करे?
नानक कहते हैं, ‘अमृत वेला में सत्य नाम की महिमा का ध्यान करो।’
कुछ करने को नहीं है और। समझदार क्या करे?
‘अमृत वेला में सत्य नाम की महिमा का ध्यान करो।’
यह थोड़ा समझ लेना जरूरी है। जिसे हम संध्या कहते हैं, उसे नानक ने अमृत वेला कहा है। संध्या से भी कीमती शब्द अमृत वेला है। हम तो हजारों साल से श्रम कर रहे हैं–जीवन के सत्य की खोज, चैतन्य की खोज, और कहां-कहां से मार्ग हो सकते हैं। ऐसा कुछ भी हिंदुओं ने छोड़ा नहीं है, जो छूट गया हो; जो उनकी जानकारी में न आ गया हो। हजारों साल के बाद हमको पता चला धीरे-धीरे–उपनिषद उसकी चर्चा करते हैं–कि चौबीस घंटे में दो संध्या क्षण हैं।
रात जब तुम सोने जाते हो तो सोने और जागने के बीच एक क्षण ऐसा है जब न तो तुम सोए होते हो, न जागे होते हो। उस समय जैसे तुम्हारी चेतना गेयर बदलती है। अगर तुम कार चलाते हो तो तुम्हें पता है कि एक गेयर से दूसरे गेयर में गाड़ी डालते वक्त बीच को क्षण-भर को गाड़ी न्यूट्रल गेयर से गुजरती है। एक गेयर से दूसरे गेयर में जाते वक्त क्षण भर को गाड़ी किसी गेयर में नहीं होती.
नींद और जागरण दो अवस्थाएं हैं; बिलकुल अलग, एकदम अलग, जागे में तुम कुछ और थे नींद में तुम बिलकुल कुछ और हो जाते हो। जागते तुम दुखी थे, रो रहे थे, दीन थे, दरिद्र थे; नींद में तुम सम्राट हो जाते हो। और संदेह भी नहीं आता कि मैं भिखारी कैसे सम्राट होने का सपना देख रहा हूं! तुम बिलकुल दूसरे गेयर में हो। चेतना का बिलकुल दूसरा तल है, जिसका पहले तल से कोई संबंध न रह गया। नहीं तो थोड़ी तो याद आती। थोड़ा तो स्मरण होता कि मैं भिखमंगा और यह क्या देख रहा हूं कि मैं सम्राट हो गया? नहीं, जब तुम सपना देखते हो, सपने पर पूरा भरोसा आता है। ऐसा लगता है कि बारह घंटे जाग कर तुमने जो जीवन जीया था, वह जीवन अलग प्रकोष्ठ है। और रात तुम सो कर जो जीवन देख रहे हो, वह अलग प्रकोष्ठ है। तुम दूसरी ही दुनिया में चले आए। दिन में तुम साधु थे, रात तुम असाधु हो। कि दिन में असाधु थे, रात साधु हो गए। संदेह भी पैदा नहीं होता। कभी तुम्हें सपने में संदेह पैदा हुआ है? अगर सपने में संदेह पैदा हो जाए तो सपना उसी वक्त टूट जाएगा। क्योंकि संदेह, जागरण चेतना का हिस्सा है। सपने में संदेह भी पैदा नहीं होता। यह भी खयाल नहीं आता कि मैं सपना देख रहा हूं। अगर यह खयाल आ जाए कि यह सपना है तो सपना तत्क्षण टूट जाएगा.
औम सिद्धा.

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