छोटा बच्चा पैदा हुआ, अभी तो इसने कभी स्वाद नहीं लिया, कभी देखा नहीं
दूध, कभी मां के स्तन जाने नहीं। अभी नौ महीने तो मां के पेट में सब मिलता
था चुपचाप; पता ही नहीं चलता था कैसे, कहां से! जीवन-रस इसमें चुपचाप बहता
था। इसे ओंठ भी नहीं चलाने पड़ते थे। जीवन-ऊर्जा इसे मिलती थी मुफ्त। इसने
कभी दूध पिया भी नहीं है। बड़ा चमत्कार है।
मनोवैज्ञानिक, वैज्ञानिक, सभी के सामने यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है कि बच्चा जब पहली दफा रोता है तो किसलिए? दूध के लिए? स्तन के लिए? यह तो संभव नहीं है। फिर किसलिए? भूख है। भूख का उसे पता है। भीतर भूख कुलबुला रही है। पुकारता है, रोता है, चिल्लाता है। किसके लिए रोता है, पुकारता है, यह भी अभी पता नहीं है। यह भी कैसे पता हो सकता है! सिर्फ रोता है।
इसलिए परम भक्त तो वही है जो सिर्फ रोता है; जो यह भी नहीं कह सकता कि मैं राम को बुला रहा हूं, कि कृष्ण को बुला रहा हूं–जो सिर्फ कहता है कि मैं किसको बुला रहा हूं, यह भी मुझे पता नहीं है; लेकिन एक बुलाहट मेरे भीतर रोएं-रोएं में है; एक पुकार उठी है; एक प्यास उठी है; एक भूख जगी है। नाम कुछ भी रख लेता है। बिना नाम के भी भक्त बुलाता है। आकाश में देखता है और खोजता है। चांदत्तारों में खोजता है। लोगों की आंखों में खोजता है। अपने चारों तरफ देखता है। बाहर-भीतर खोजता है। उसे एक बात का पता है कि भीतर कोई चीज उठी है बड़े जोर से; एक अंधड उठा है; एक तूफान आया है; एक भूख जगी है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चे को जैसे ही स्तन मिलता है, वह तत्काल स्तन से दूध पीना शुरू कर देता है। इसने पहले कभी अभ्यास भी नहीं किया, कोई रिहर्सल भी नहीं किया है। इसको कोई मौका ही नहीं मिला रिहर्सल का। यह कैसे एकदम से दूध पीने लगता है?
भूख पर्याप्त है। अभ्यास की जरूरत नहीं है। वह भूख ही दूध को खींचने लगती है। दूध पीछे आता है, भूख पहले। पानी पीछे आता है, प्यास पहले। प्रेम पहले आता है, परमात्मा बाद में।
तुम पूछते हो कि अज्ञात परमात्मा को हम कैसे प्रेम करें। प्रेम तुम्हारे भीतर है ही। तुम इसे वस्तुगत मत बनाओ–आत्मगत है। प्रेम तुम्हारे भीतर है ही। असल में तुमने जब भी प्रेम किया है तो तुमने परमात्मा की ही तलाश की है। इसे मैं दोहरा दूं। तुमने जब भी किसी को प्रेम किया है तो तुमने परमात्मा की ही तलाश की है–अनजाने। बच्चा अकसर करता है; उसके हाथ में कुछ भी दो, जल्दी से मुंह में ले लेता है। क्यों? उसे तो भूख लगी है। वह स्तन की तलाश कर रहा है। हाथ में घुनघुना दिया, घुनघुने को मुंह में ले लता है। कुछ न मिले, तो अपने अंगूठे को मुंह में ले लेता है; अपने पैर के अंगूठे को मुंह में ले लेता है। जो मिलता है उसी को मुंह में ले लेता है। उसे तो भूख लगी है। सोचता है शायद यही स्तन है। स्तन का तो उसे कुछ पता नहीं।
ऐसी हमारी दशा है। तुम्हें जो दिखाई पड़ जाता है उसी के तुम प्रेम में पड़ जाते हो। मगर यह प्रेम है परमात्मा की ही तलाश। और इसलिए इस जगत् का कोई भी प्रेम तृप्त नहीं कर पाता। बच्चे ने घुनघुना मुंह में ले लिया, मगर इससे कुछ भूख तो मिटेगी नहीं। घुनघुने को चूसता रहे, घुनघुने को पीता रहे, इससे तृप्ति तो होगी नहीं; जल्दी ही देर-अबेर घुनघुने को फेंक देगा। फिर तलाश शुरू हो जाएगी।
ऐसे ही हमारे जगत् के प्रेम हैं–घुनघुने हैं। उनमें हम खोजते परमात्मा को हैं; हम फिर परमात्मा को नहीं पाते, इसलिए ऊब पैदा हो जाती है, विषाद पैदा होता है। फिर हम एक घुनघुना छोड़ते हैं, फिर दूसरा घुनघुना पकड़ लेते हैं। धन खोजा, धन में कुछ रस न पाया। पद खोजा, पद में कुछ रस न पाया। पत्नी खोजी, पति खोजे, मित्र खोजे–कुछ रस न पाया। ऐसी ही दौड़ चलती रहती है, चलती ही रहती है। क्यों रस नहीं मिलता? रस इसीलिए नहीं मिलता कि जब तक वास्तविक स्तन न मिल जाए, रस मिले कैसे? घुनघुने ने कहा कब था कि मैं तुम्हें रस दूंगा? तुमने मान लिया था।
और अज्ञात है परमात्मा, इसीलिए यह भ्रांति भी होती है। मनुष्य कुछ भी खोजता हो, परमात्मा को ही खोजता है। नरक में खोजता हो तो भी परमात्मा को ही खोजता है। शराब में खोजता हो तो भी परमात्मा को ही खोजता है। पद में खोजता हो तो भी परमात्मा को ही खोजता है। धन में खोजता हो तो भी परमात्मा को ही खोजता है। समझने की कोशिश करना।
तुम्हारी धन की इतनी आकांक्षा क्यों है? कभी तुमने इस पर विचार किया? तुम्हारे महात्मा भी इसके खिलाफ तो बोलते हैं, लेकिन इस पर कभी विचार करने का मौका नहीं देते। इस पर तुमने कभी ध्यान किया कि आदमी धन की तलाश में क्या खोजता है? आदमी धन की तलाश में यही खोज रहा है कि एसी स्थिति आ जाए कि मेरी सब जरूरतें पूरी हो जाएं, कि मुझे कुछ चाहिए हो तो मेरे पास धन हो; ऐसा न हो कि चाहत तो हो और धन न हो, तो तड़प हो। धन के द्वारा आदमी एक एसी दशा पाना चाहता है जहां कोई भी आकांक्षा अतृप्त न रह जाए। और क्या खोज है? इतना धन हो कि मेरी आकांक्षाओं से ज्यादा हो, यही तो धन की खोज है। अगर तुम इसका सार-अर्थ समझो तो इसका मतलब हुआ कि धन के द्वारा भी आदमी वासनारहित चित्त की दशा खोजता है। एक ऐसी दशा आ जाए जहां कोई आकांक्षा नहीं बची। क्योंकि आकांक्षा यानी भिखमंगापन–मांगो, गिड़गिड़ाओ, तड़पो!
तुम जो धन के पीछे इतने पड़े हो तो तुम कोई रुपए-सिक्के के पीछे थोड़े ही दीवाने हो। कौन पागल रुपए के पीछे दीवाना है! रुपए में एक आशा है, एक भरोसा है कि अगर रुपया पास होगा तो तुम्हें भिखमंगा नहीं होना पड़ेगा; जब जरूरत पड़ेगी, तुम्हारे पास संपत्ति होगी, सुविधा होगी, तुम अपनी जरूरत पूरी कर लोगे; जरूरत से तड़पोगे नहीं।
वासना से ज्यादा धन हो जाए, यह हमारी दौड़ है। यह कभी हो नहीं पाता, यह दूसरी बात है; इसलिए हम तकलीफ में पड़ते हैं। मगर हमारी आकांक्षा तो यही है।
तुम पद पर पहुंचना चाहते हो–क्यों? ताकि तुम किसी से नीचे न रह जाओ, इससे ग्लानि होती है; तुम किसी से पीछे न रह जाओ। पीछे रहने में मन को कष्ट होता है। ऐसी जगह पहुंच जाओ जिसके ऊपर और कोई जगह नहीं हैः चलो राष्ट्रपति हो जाओ कि प्रधानमंत्री हो जाओ। ऐसी जगह पहुंच जाओ जिसके ऊपर और कोई जगह नहीं; वहां निश्चित होकर फिर बैठोगे। अब कहीं जाने को नहीं रहा.
पद की तलाश भी इसीलिए है कि एक ऐसी जगह आ जाए जहां विश्राम कर सको; जहां से फिर और जाने की, और धक्के खाने की जरूरत न रहे; आखिरी पड़ाव आ गया, मंजिल आ गई। मगर यह आती नहीं मंजिल। दिल्ली पहुंच जाते हो, मगर मंजिल नहीं आती। मगर तलाश परमात्मा की हो रही है।
परमात्मा को भक्तों ने परमपद कहा है। और परमात्मा को भक्तों ने परमधन कहा है। क्यों? क्योंकि परमात्मा के मिलते ही सब वासनाएं शून्य हो जाती हैं। परमात्मा के मिलते ही सब दौड़ शांत हो गई। अब कहीं और नहीं जाना है; विश्राम आ गया, अपना घर आ गया; मंजिल आ गई। अब इसमें ही डुबकी लगानी है; गोते खाने हैं; इस रस में ही डूबना-उबरना है, डूबना है। अब मौज के क्षण आ गए। अब लीला होगी। अब कोई तनाव, कोई चिंता न रही.
औम सिद्धा.
मनोवैज्ञानिक, वैज्ञानिक, सभी के सामने यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है कि बच्चा जब पहली दफा रोता है तो किसलिए? दूध के लिए? स्तन के लिए? यह तो संभव नहीं है। फिर किसलिए? भूख है। भूख का उसे पता है। भीतर भूख कुलबुला रही है। पुकारता है, रोता है, चिल्लाता है। किसके लिए रोता है, पुकारता है, यह भी अभी पता नहीं है। यह भी कैसे पता हो सकता है! सिर्फ रोता है।
इसलिए परम भक्त तो वही है जो सिर्फ रोता है; जो यह भी नहीं कह सकता कि मैं राम को बुला रहा हूं, कि कृष्ण को बुला रहा हूं–जो सिर्फ कहता है कि मैं किसको बुला रहा हूं, यह भी मुझे पता नहीं है; लेकिन एक बुलाहट मेरे भीतर रोएं-रोएं में है; एक पुकार उठी है; एक प्यास उठी है; एक भूख जगी है। नाम कुछ भी रख लेता है। बिना नाम के भी भक्त बुलाता है। आकाश में देखता है और खोजता है। चांदत्तारों में खोजता है। लोगों की आंखों में खोजता है। अपने चारों तरफ देखता है। बाहर-भीतर खोजता है। उसे एक बात का पता है कि भीतर कोई चीज उठी है बड़े जोर से; एक अंधड उठा है; एक तूफान आया है; एक भूख जगी है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चे को जैसे ही स्तन मिलता है, वह तत्काल स्तन से दूध पीना शुरू कर देता है। इसने पहले कभी अभ्यास भी नहीं किया, कोई रिहर्सल भी नहीं किया है। इसको कोई मौका ही नहीं मिला रिहर्सल का। यह कैसे एकदम से दूध पीने लगता है?
भूख पर्याप्त है। अभ्यास की जरूरत नहीं है। वह भूख ही दूध को खींचने लगती है। दूध पीछे आता है, भूख पहले। पानी पीछे आता है, प्यास पहले। प्रेम पहले आता है, परमात्मा बाद में।
तुम पूछते हो कि अज्ञात परमात्मा को हम कैसे प्रेम करें। प्रेम तुम्हारे भीतर है ही। तुम इसे वस्तुगत मत बनाओ–आत्मगत है। प्रेम तुम्हारे भीतर है ही। असल में तुमने जब भी प्रेम किया है तो तुमने परमात्मा की ही तलाश की है। इसे मैं दोहरा दूं। तुमने जब भी किसी को प्रेम किया है तो तुमने परमात्मा की ही तलाश की है–अनजाने। बच्चा अकसर करता है; उसके हाथ में कुछ भी दो, जल्दी से मुंह में ले लेता है। क्यों? उसे तो भूख लगी है। वह स्तन की तलाश कर रहा है। हाथ में घुनघुना दिया, घुनघुने को मुंह में ले लता है। कुछ न मिले, तो अपने अंगूठे को मुंह में ले लेता है; अपने पैर के अंगूठे को मुंह में ले लेता है। जो मिलता है उसी को मुंह में ले लेता है। उसे तो भूख लगी है। सोचता है शायद यही स्तन है। स्तन का तो उसे कुछ पता नहीं।
ऐसी हमारी दशा है। तुम्हें जो दिखाई पड़ जाता है उसी के तुम प्रेम में पड़ जाते हो। मगर यह प्रेम है परमात्मा की ही तलाश। और इसलिए इस जगत् का कोई भी प्रेम तृप्त नहीं कर पाता। बच्चे ने घुनघुना मुंह में ले लिया, मगर इससे कुछ भूख तो मिटेगी नहीं। घुनघुने को चूसता रहे, घुनघुने को पीता रहे, इससे तृप्ति तो होगी नहीं; जल्दी ही देर-अबेर घुनघुने को फेंक देगा। फिर तलाश शुरू हो जाएगी।
ऐसे ही हमारे जगत् के प्रेम हैं–घुनघुने हैं। उनमें हम खोजते परमात्मा को हैं; हम फिर परमात्मा को नहीं पाते, इसलिए ऊब पैदा हो जाती है, विषाद पैदा होता है। फिर हम एक घुनघुना छोड़ते हैं, फिर दूसरा घुनघुना पकड़ लेते हैं। धन खोजा, धन में कुछ रस न पाया। पद खोजा, पद में कुछ रस न पाया। पत्नी खोजी, पति खोजे, मित्र खोजे–कुछ रस न पाया। ऐसी ही दौड़ चलती रहती है, चलती ही रहती है। क्यों रस नहीं मिलता? रस इसीलिए नहीं मिलता कि जब तक वास्तविक स्तन न मिल जाए, रस मिले कैसे? घुनघुने ने कहा कब था कि मैं तुम्हें रस दूंगा? तुमने मान लिया था।
और अज्ञात है परमात्मा, इसीलिए यह भ्रांति भी होती है। मनुष्य कुछ भी खोजता हो, परमात्मा को ही खोजता है। नरक में खोजता हो तो भी परमात्मा को ही खोजता है। शराब में खोजता हो तो भी परमात्मा को ही खोजता है। पद में खोजता हो तो भी परमात्मा को ही खोजता है। धन में खोजता हो तो भी परमात्मा को ही खोजता है। समझने की कोशिश करना।
तुम्हारी धन की इतनी आकांक्षा क्यों है? कभी तुमने इस पर विचार किया? तुम्हारे महात्मा भी इसके खिलाफ तो बोलते हैं, लेकिन इस पर कभी विचार करने का मौका नहीं देते। इस पर तुमने कभी ध्यान किया कि आदमी धन की तलाश में क्या खोजता है? आदमी धन की तलाश में यही खोज रहा है कि एसी स्थिति आ जाए कि मेरी सब जरूरतें पूरी हो जाएं, कि मुझे कुछ चाहिए हो तो मेरे पास धन हो; ऐसा न हो कि चाहत तो हो और धन न हो, तो तड़प हो। धन के द्वारा आदमी एक एसी दशा पाना चाहता है जहां कोई भी आकांक्षा अतृप्त न रह जाए। और क्या खोज है? इतना धन हो कि मेरी आकांक्षाओं से ज्यादा हो, यही तो धन की खोज है। अगर तुम इसका सार-अर्थ समझो तो इसका मतलब हुआ कि धन के द्वारा भी आदमी वासनारहित चित्त की दशा खोजता है। एक ऐसी दशा आ जाए जहां कोई आकांक्षा नहीं बची। क्योंकि आकांक्षा यानी भिखमंगापन–मांगो, गिड़गिड़ाओ, तड़पो!
तुम जो धन के पीछे इतने पड़े हो तो तुम कोई रुपए-सिक्के के पीछे थोड़े ही दीवाने हो। कौन पागल रुपए के पीछे दीवाना है! रुपए में एक आशा है, एक भरोसा है कि अगर रुपया पास होगा तो तुम्हें भिखमंगा नहीं होना पड़ेगा; जब जरूरत पड़ेगी, तुम्हारे पास संपत्ति होगी, सुविधा होगी, तुम अपनी जरूरत पूरी कर लोगे; जरूरत से तड़पोगे नहीं।
वासना से ज्यादा धन हो जाए, यह हमारी दौड़ है। यह कभी हो नहीं पाता, यह दूसरी बात है; इसलिए हम तकलीफ में पड़ते हैं। मगर हमारी आकांक्षा तो यही है।
तुम पद पर पहुंचना चाहते हो–क्यों? ताकि तुम किसी से नीचे न रह जाओ, इससे ग्लानि होती है; तुम किसी से पीछे न रह जाओ। पीछे रहने में मन को कष्ट होता है। ऐसी जगह पहुंच जाओ जिसके ऊपर और कोई जगह नहीं हैः चलो राष्ट्रपति हो जाओ कि प्रधानमंत्री हो जाओ। ऐसी जगह पहुंच जाओ जिसके ऊपर और कोई जगह नहीं; वहां निश्चित होकर फिर बैठोगे। अब कहीं जाने को नहीं रहा.
पद की तलाश भी इसीलिए है कि एक ऐसी जगह आ जाए जहां विश्राम कर सको; जहां से फिर और जाने की, और धक्के खाने की जरूरत न रहे; आखिरी पड़ाव आ गया, मंजिल आ गई। मगर यह आती नहीं मंजिल। दिल्ली पहुंच जाते हो, मगर मंजिल नहीं आती। मगर तलाश परमात्मा की हो रही है।
परमात्मा को भक्तों ने परमपद कहा है। और परमात्मा को भक्तों ने परमधन कहा है। क्यों? क्योंकि परमात्मा के मिलते ही सब वासनाएं शून्य हो जाती हैं। परमात्मा के मिलते ही सब दौड़ शांत हो गई। अब कहीं और नहीं जाना है; विश्राम आ गया, अपना घर आ गया; मंजिल आ गई। अब इसमें ही डुबकी लगानी है; गोते खाने हैं; इस रस में ही डूबना-उबरना है, डूबना है। अब मौज के क्षण आ गए। अब लीला होगी। अब कोई तनाव, कोई चिंता न रही.
औम सिद्धा.

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