गावै को ताणु होवै किसे ताणु। गावै को दाति जाणै निसाणु।।
गावै को गुण वड़िआइया चारु।
गावै को साजि करे तनु खेह। गावै को जीअ लै फिरि देह।।
गावै को जापै दिसे दूरि। गावै को वेखै हादरा हदूरि।।
कथना कथी न आवै तोटि। कथि कथि कथी कोटि कोटि कोटि।।
देदा दे लैदे थकि पाहि। जुगा जुगंतरि खाहा खाहि।।
हुकमी हुकमु चलाए राह। ‘नानक’ विगसै बेपरवाह।।
जीवन को जीने के दो ढंग हैं। एक ढंग है संघर्ष का, एक ढंग है समर्पण का। संघर्ष का अर्थ है, मेरी मर्जी समग्र की मर्जी से अलग। समर्पण का अर्थ है, मैं समग्र का एक अंग हूं। मेरी मर्जी के अलग होने का कोई सवाल नहीं। मैं अगर अलग हूं, संघर्ष स्वाभाविक है। मैं अगर इस विराट के साथ एक हूं, समर्पण स्वाभाविक है। संघर्ष लाएगा तनाव, अशांति, चिंता। समर्पण: शून्यता, शांति, आनंद और अंततः परम ज्ञान। संघर्ष से बढ़ेगा अहंकार, समर्पण से मिटेगा। संसारी वही है जो संघर्ष कर रहा है। धार्मिक वही है जिसने संघर्ष छोड़ा और समर्पण किया। मंदिर, गुरुद्वारे, मस्जिद जाने से धर्म का कोई संबंध नहीं। अगर तुम्हारी वृत्ति संघर्ष की है, अगर तुम लड़ रहे हो परमात्मा से, अगर तुम अपनी इच्छा पूरी कराना चाहते हो–चाहे प्रार्थना से ही सही, पूजा से ही सही–अगर तुम्हारी अपनी कोई इच्छा है, तो तुम अधार्मिक हो।
जब तुम्हारी अपनी कोई चाह नहीं, जब उसकी चाह ही तुम्हारी चाह है। जहां वह ले जाए वही तुम्हारी मंजिल है, तुम्हारी अलग कोई मंजिल नहीं। जैसा वह चलाए वही तुम्हारी गति है, तुम्हारी अपनी कोई आकांक्षा नहीं। तुम निर्णय लेते ही नहीं। तुम तैरते भी नहीं, तुम तिरते हो…।
आकाश में कभी देखें! चील बहुत ऊंचाई पर उठ जाती है। फिर पंख भी नहीं हिलाती। फिर पंखों को फैला देती है और हवा में तिरती है। वैसी ही तिरने की दशा जब तुम्हारी चेतना में आ जाती है, तब समर्पण। तब तुम पंख भी नहीं हिलाते। तब तुम उसकी हवाओं पर तिर जाते हो। तब तुम निर्भार हो जाते हो। क्योंकि भार संघर्ष से पैदा होता है। भार प्रतिरोध से पैदा होता है। जितना तुम लड़ते हो उतना तुम भारी हो जाते हो, जितने भारी होते हो उतने नीचे गिर जाते हो। जितना तुम लड़ते नहीं उतने हल्के हो जाते हो, जितने हल्के होते हो उतने ऊंचे उठ जाते हो।
और अगर तुम पूरी तरह संघर्ष छोड़ दो तो तुम्हारी वही ऊंचाई है, जो परमात्मा की। ऊंचाई का एक ही अर्थ है–निर्भार हो जाना। और अहंकार पत्थर की तरह लटका है तुम्हारे गले में। जितना तुम लड़ोगे उतना ही अहंकार बढ़ेगा।
ऐसा हुआ कि नानक एक गांव के बाहर आ कर ठहरे। वह गांव सूफियों का गांव था। उनका बड़ा केंद्र था। वहां बड़े सूफी थे, गुरु थे। पूरी बस्ती ही सूफियों की थी। खबर मिली सूफियों के गुरु को, तो उसने सुबह ही सुबह नानक के लिए एक कप में भर कर दूध भेजा। दूध लबालब था। एक बूंद भी और न समा सकती थी। नानक गांव के बाहर ठहरे थे एक कुएं के तट पर। उन्होंने पास की झाड़ी से एक फूल तोड़ कर उस दूध की प्याली में डाल दिया। फूल तिर गया। फूल का वजन क्या! उसने जगह न मांगी। वह सतह पर तिर गया। और प्याली वापस भेज दी। नानक का शिष्य मरदाना बहुत हैरान हुआ कि मामला क्या है? उसने पूछा कि मैं कुछ समझा नहीं। क्या रहस्य है? यह हुआ क्या?
तो नानक ने कहा कि सूफियों के गुरु ने खबर भेजी थी कि गांव में बहुत ज्ञानी हैं, अब और जगह नहीं। मैंने खबर वापस भेज दी है कि मेरा कोई भार नहीं है। मैं जगह मांगूंगा ही नहीं, फूल की तरह तिर जाऊंगा।
जो निर्भार है वही ज्ञानी है। जिसमें वजन है, अभी अज्ञान है। और जब तुममें वजन होता है तब तुमसे दूसरे को चोट पहुंचती है। जब तुम निर्भार हो जाते हो, तब तुम्हारे जीवन का ढंग ऐसा होता है कि उस ढंग से चोट पहुंचनी असंभव हो जाती है। अहिंसा अपने आप फलती है। प्रेम अपने आप लगता है। कोई प्रेम को लगा नहीं सकता। और न कोई करुणा को आरोपित कर सकता है। अगर तुम निर्भार हो जाओ, तो ये सब घटनाएं अपने से घटती हैं। जैसे आदमी के पीछे छाया चलती है, ऐसे भारी आदमी के पीछे घृणा, हिंसा, वैमनस्य, क्रोध, हत्या चलती है। हलके मनुष्य के पीछे प्रेम, करुणा, दया, प्रार्थना अपने आप चलती है। इसलिए मौलिक सवाल भीतर से अहंकार को गिरा देने का है।
कैसे तुम गिराओगे अहंकार को? एक ही उपाय है। वेदों ने उस उपाय को ऋत कहा है। लाओत्से ने उस उपाय को ताओ कहा है। बुद्ध ने धम्म, महावीर ने धर्म, नानक का शब्द है हुकुम, उसकी आज्ञा। उसकी आज्ञा से जो चलने लगा, जो अपनी तरफ से हिलता-डुलता भी नहीं है, जिसका अपना कोई भाव नहीं, कोई चाह नहीं, जो अपने को आरोपित नहीं करना चाहता, वह उसके हुक्म में आ गया। यही धार्मिक आदमी है।
और जो उसके हुक्म में आ गया, वह सब पा गया। कुछ पाने को बचता नहीं। क्योंकि उसके हुक्म को मानना, उसके हृदय तक पहुंच जाने का द्वार है। अपने को ही मानना, उससे दूर हटते जाना है। अपने को मानना है कि तुमने परमात्मा की तरफ पीठ कर ली। उसकी आज्ञा को माना कि तुम्हारा मुख परमात्मा की तरफ हो गया। तुम सूरज की तरफ पीठ कर के जीवन भर भागते रहो तो भी अंधेरे में रहोगे। और तुम सूरज की तरफ मुंह इसी क्षण कर लो तो जन्मों-जन्मों का अंधेरा कट जाएगा।
परमात्मा के सन्मुख होने का एक ही उपाय है और वह यह है कि तुम अपनी मर्जी छोड़ दो। तुम तैरो मत, बहो। तुम तिरो; वह काफी है। तुम अकारण ही बोझ ले रहे हो।
और तुम्हारी सफलताएं-असफलताएं तुम्हारे अहंकार के ही रोग हैं। और तुम्हारी हालत वैसी है, जैसा मैंने सुना है कि एक रथ गुजर रहा था। और एक मक्खी उसके पहिए की कील पर बैठी थी। बड़ी धूल उठती थी। रथ बड़ा था। बारह घोड़े जुते थे। बड़ी भयंकर आवाज, बड़ी धूल उठती थी। उस मक्खी ने आसपास देखा और कहा कि आज मैं बड़ी धूल उड़ा रही हूं। रथ से उड़ रही है धूल। मक्खी कील पर बैठी है, पर सोच रही है, आज मैं बड़ी धूल उड़ा रही हूं। और जब इतनी धूल उड़ा रही हूं तो इतनी ही बड़ी हूं।
तुम सफल भी होते हो उसके ही कारण। जो भी तुम पाते हो उसके ही कारण। तुम रथ पर बैठी एक मक्खी से ज्यादा नहीं हो। भूल कर यह मत सोचना कि इतनी धूल मैं उड़ा रहा हूं। धूल है तो उसके रथ की है। यात्रा है तो उसके रथ की है। लेकिन तुम अपने को बीच में मत ले लेना।
तुमने सुनी होगी बात उस छिपकली की, कि मित्रों ने उसे निमंत्रित किया था और कहा कि आओ आज थोड़ा जंगल में घूम आएं। उस छिपकली ने कहा कि जाना मुश्किल है। क्योंकि इस छप्पर को कौन सम्हालेगा? छप्पर गिर जाएगा तो जिम्मेवारी मेरे ऊपर होगी। छिपकली सोचती है कि छप्पर को महल के वही सम्हाले हुए है। छिपकली को लगता भी होगा।
तुमने सुनी होगी कहानी कि एक बूढ़ी औरत के पास एक मुर्गा था। वह सुबह बांग देता था तभी सूरज उगता था। बूढ़ी अकड़ गई। और उसने गांव में लोगों को खबर कर दी कि मुझसे जरा सोच-समझ कर व्यवहार करना। ढंग और इज्जत से। क्योंकि अगर मैं चली गई अपने मुर्गे को ले कर दूसरे गांव तो याद रखना, सूरज इस गांव में कभी उगेगा ही नहीं। मेरा मुर्गा जब बांग देता है तभी सूरज उगता है।
और बात सच ही थी कि रोज ही मुर्गा बांग देता था तभी सूरज उगता था। गांव के लोग हंसे। लोगों ने मजाक उड़ाई कि तू पागल हो गई। तो बूढ़ी नाराजगी में दूसरे गांव चली गई। मुर्गे ने बांग दी और दूसरे गांव में सूरज उगा। तो बूढ़ी ने कहा, अब रोएंगे। अब बैठे होंगे छाती पीटेंगे। न रहा मुर्गा, न उगेगा सूरज।
तुम्हारे तर्क भी…बूढ़ी का तर्क भी है तो बहुत साफ। क्योंकि ऐसा कभी नहीं हुआ कि मुर्गे के बांग दिए बिना सूरज उगा हो। लेकिन बात बिलकुल उलटी है। सूरज उगता है इसलिए मुर्गा बांग देता है। बांग देने के कारण सूरज नहीं उगते। लेकिन बूढ़ी को कौन समझाए? तुमको कौन समझाए? बूढ़ी दूसरे गांव चली गई और उसने देखा कि सूरज अब यहां उग रहा है। और जब यहां उग रहा है तो हर गांव में कैसे उगेगा?
तुम अपनी छोटी बुद्धि से छोटे दायरे में सोचते हो। तुम्हारे कारण परमात्मा नहीं है, परमात्मा के कारण तुम हो। यह श्वास तुम्हारे कारण नहीं चल रही है, उसके कारण चल रही है। प्रार्थना भी तुम नहीं करते हो, वही तुम्हारे भीतर प्रार्थना बनता है।
इस भाव को खयाल में ले लें, तो नानक के ये बड़े बहुमूल्य शब्द समझ में आ जाएंगे। एक-एक शब्द कीमती है।
हुकमी होवन आकार हुकमी न कहिया जाए।
हुक्म से आकार की उत्पत्ति हुई। हुक्म को शब्दों में नहीं कहा जा सकता।’
हुक्म का अर्थ ठीक से समझ लेना–दि कास्मिक ला। वह जो सारे जीवन को चलाने वाला महानियम है, हुक्म का वही अर्थ है।
हुक्म से ही जीवों की उत्पत्ति हुई। हुक्म से बड़ाई मिलती है।’
हुकमी होवन आकार हुकमी न कहिया जाए।
हुकमी होवन जीअ हुकमी मिलै बड़िआई।
जब तुम जीतो, तो यह मत सोचना कि मैं जीत रहा हूं। और अगर तुम जीत में ही न सोचोगे कि मैं जीत रहा हूं, तो हार में भी तुम पाओगे कि मैं नहीं हार रहा हूं। वही जीतता है, वही हारता है। उसका ही खेल है। इसलिए हिंदू इस पूरे जगत को लीला कहते हैं। लीला का मतलब है, हारता भी वही, जीतता भी वही। इस हाथ से जीतता है, उस हाथ से हारता है। लेकिन जीतने और हारने वाले बीच में ही सोच लेते हैं; जो उपकरण हैं, जो निमित्त हैं, जो साधन हैं, वे समझ लेते हैं, हम कर्ता हैं।
कृष्ण अर्जुन को गीता में कह रहे हैं कि तू व्यर्थ बीच में अपने को मत ले। वही कर रहा है, वही करवा रहा है। युद्ध उसका आयोजन है। जिनको मारना है वह मारेगा। जिनको बचाना है वह बचाएगा। तू यह मत सोच कि तू मारने वाला है और तू बचाने वाला है। कृष्ण पूरी गीता में जो कहते हैं, वही नानक इन शब्दों में कह रहे हैं।
हुकमी होवन जीअ हुकमी मिलै बड़िआई।
हुकमी उत्तम नीचु…।
‘वही छोटे-बड़े को पैदा कर रहा है।’
यह थोड़ा सोचने जैसा है। अगर वही छोटे-बड़े को पैदा कर रहा है, तो फिर कोई छोटा नहीं कोई बड़ा नहीं। क्योंकि दोनों का बनाने वाला वही है। तुमने एक छोटी सी मूर्ति बनाई, तुमने एक बड़ी मूर्ति बनाई; बनाने वाले तुम ही हो। जब कर्ता एक है, तो कौन छोटा कौन बड़ा? जब दोनों में उसका ही हाथ लगा है–लेकिन हम सोचते हैं मैं छोटा, मैं बड़ा, और जीवन भर हम पीड़ा उठाते हैं। और तुम इतने बड़े कभी भी न हो पाओगे कि तुम तृप्त हो जाओ। अगर तुमने रूप को देखा, अपने आकार को देखा, तो तुम कभी इतने बड़े न हो सकोगे कि तृप्त हो जाओ। आकार तो छोटा ही होगा, कितना ही बड़ा क्यों न हो।
लेकिन अगर तुमने निराकार के हाथ अपने आकार में देखे, तब तुम तत्क्षण बड़े हो गए। बनाने वाला वही है। एक छोटे से घास को भी वही बनाता है। और दूर आकाश को छूते देवदार के वृक्ष को भी वही बनाता है। अगर दोनों के पीछे उसी का हाथ है, फिर कौन बड़ा कौन छोटा? उसी की हार है, उसी की जीत है। फिर हम सब शतरंज के मोहरे हैं। जीते तो वह, हारे तो वह। बड़ाई मिले तो उसे, बुराई मिले तो उसे।
ध्यान रखना, तुमने बहुत बार भक्तों के वचन सुने होंगे, पढ़े होंगे। अनेक भक्त तुमने पाए होंगे; कहते हैं, बड़ाई तेरी, बुराई मेरी। ऊपर से देखने पर बहुत अच्छा लगता है। वे कहते हैं कि जो-जो भला है, तेरा; जो-जो बुरा है, मेरा। लगता है बड़े विनम्र हैं। लेकिन अगर बुराई तुम्हारी तो भलाई उसकी कैसे हो सकेगी? यह विनम्रता झूठी है। यह विनम्रता वास्तविक नहीं है। क्योंकि वास्तविक विनम्रता तो सभी दे देगी, कुछ भी न बचाएगी। तुमने अपने अहंकार के लिए थोड़ा सहारा फिर बचा लिया। और तुम कितना ही ऊपर-ऊपर से कहो कि बड़ाई तेरी और बुराई मेरी, लेकिन जब बुराई मेरी है तो बड़ाई तेरी होगी कैसे? असफलता मेरी और सफलता तेरी? यह बात थोथी है। या तो दोनों मेरे होंगे, या तो दोनों तेरे होंगैं.
औम सिद्धा.
गावै को गुण वड़िआइया चारु।
गावै को साजि करे तनु खेह। गावै को जीअ लै फिरि देह।।
गावै को जापै दिसे दूरि। गावै को वेखै हादरा हदूरि।।
कथना कथी न आवै तोटि। कथि कथि कथी कोटि कोटि कोटि।।
देदा दे लैदे थकि पाहि। जुगा जुगंतरि खाहा खाहि।।
हुकमी हुकमु चलाए राह। ‘नानक’ विगसै बेपरवाह।।
जीवन को जीने के दो ढंग हैं। एक ढंग है संघर्ष का, एक ढंग है समर्पण का। संघर्ष का अर्थ है, मेरी मर्जी समग्र की मर्जी से अलग। समर्पण का अर्थ है, मैं समग्र का एक अंग हूं। मेरी मर्जी के अलग होने का कोई सवाल नहीं। मैं अगर अलग हूं, संघर्ष स्वाभाविक है। मैं अगर इस विराट के साथ एक हूं, समर्पण स्वाभाविक है। संघर्ष लाएगा तनाव, अशांति, चिंता। समर्पण: शून्यता, शांति, आनंद और अंततः परम ज्ञान। संघर्ष से बढ़ेगा अहंकार, समर्पण से मिटेगा। संसारी वही है जो संघर्ष कर रहा है। धार्मिक वही है जिसने संघर्ष छोड़ा और समर्पण किया। मंदिर, गुरुद्वारे, मस्जिद जाने से धर्म का कोई संबंध नहीं। अगर तुम्हारी वृत्ति संघर्ष की है, अगर तुम लड़ रहे हो परमात्मा से, अगर तुम अपनी इच्छा पूरी कराना चाहते हो–चाहे प्रार्थना से ही सही, पूजा से ही सही–अगर तुम्हारी अपनी कोई इच्छा है, तो तुम अधार्मिक हो।
जब तुम्हारी अपनी कोई चाह नहीं, जब उसकी चाह ही तुम्हारी चाह है। जहां वह ले जाए वही तुम्हारी मंजिल है, तुम्हारी अलग कोई मंजिल नहीं। जैसा वह चलाए वही तुम्हारी गति है, तुम्हारी अपनी कोई आकांक्षा नहीं। तुम निर्णय लेते ही नहीं। तुम तैरते भी नहीं, तुम तिरते हो…।
आकाश में कभी देखें! चील बहुत ऊंचाई पर उठ जाती है। फिर पंख भी नहीं हिलाती। फिर पंखों को फैला देती है और हवा में तिरती है। वैसी ही तिरने की दशा जब तुम्हारी चेतना में आ जाती है, तब समर्पण। तब तुम पंख भी नहीं हिलाते। तब तुम उसकी हवाओं पर तिर जाते हो। तब तुम निर्भार हो जाते हो। क्योंकि भार संघर्ष से पैदा होता है। भार प्रतिरोध से पैदा होता है। जितना तुम लड़ते हो उतना तुम भारी हो जाते हो, जितने भारी होते हो उतने नीचे गिर जाते हो। जितना तुम लड़ते नहीं उतने हल्के हो जाते हो, जितने हल्के होते हो उतने ऊंचे उठ जाते हो।
और अगर तुम पूरी तरह संघर्ष छोड़ दो तो तुम्हारी वही ऊंचाई है, जो परमात्मा की। ऊंचाई का एक ही अर्थ है–निर्भार हो जाना। और अहंकार पत्थर की तरह लटका है तुम्हारे गले में। जितना तुम लड़ोगे उतना ही अहंकार बढ़ेगा।
ऐसा हुआ कि नानक एक गांव के बाहर आ कर ठहरे। वह गांव सूफियों का गांव था। उनका बड़ा केंद्र था। वहां बड़े सूफी थे, गुरु थे। पूरी बस्ती ही सूफियों की थी। खबर मिली सूफियों के गुरु को, तो उसने सुबह ही सुबह नानक के लिए एक कप में भर कर दूध भेजा। दूध लबालब था। एक बूंद भी और न समा सकती थी। नानक गांव के बाहर ठहरे थे एक कुएं के तट पर। उन्होंने पास की झाड़ी से एक फूल तोड़ कर उस दूध की प्याली में डाल दिया। फूल तिर गया। फूल का वजन क्या! उसने जगह न मांगी। वह सतह पर तिर गया। और प्याली वापस भेज दी। नानक का शिष्य मरदाना बहुत हैरान हुआ कि मामला क्या है? उसने पूछा कि मैं कुछ समझा नहीं। क्या रहस्य है? यह हुआ क्या?
तो नानक ने कहा कि सूफियों के गुरु ने खबर भेजी थी कि गांव में बहुत ज्ञानी हैं, अब और जगह नहीं। मैंने खबर वापस भेज दी है कि मेरा कोई भार नहीं है। मैं जगह मांगूंगा ही नहीं, फूल की तरह तिर जाऊंगा।
जो निर्भार है वही ज्ञानी है। जिसमें वजन है, अभी अज्ञान है। और जब तुममें वजन होता है तब तुमसे दूसरे को चोट पहुंचती है। जब तुम निर्भार हो जाते हो, तब तुम्हारे जीवन का ढंग ऐसा होता है कि उस ढंग से चोट पहुंचनी असंभव हो जाती है। अहिंसा अपने आप फलती है। प्रेम अपने आप लगता है। कोई प्रेम को लगा नहीं सकता। और न कोई करुणा को आरोपित कर सकता है। अगर तुम निर्भार हो जाओ, तो ये सब घटनाएं अपने से घटती हैं। जैसे आदमी के पीछे छाया चलती है, ऐसे भारी आदमी के पीछे घृणा, हिंसा, वैमनस्य, क्रोध, हत्या चलती है। हलके मनुष्य के पीछे प्रेम, करुणा, दया, प्रार्थना अपने आप चलती है। इसलिए मौलिक सवाल भीतर से अहंकार को गिरा देने का है।
कैसे तुम गिराओगे अहंकार को? एक ही उपाय है। वेदों ने उस उपाय को ऋत कहा है। लाओत्से ने उस उपाय को ताओ कहा है। बुद्ध ने धम्म, महावीर ने धर्म, नानक का शब्द है हुकुम, उसकी आज्ञा। उसकी आज्ञा से जो चलने लगा, जो अपनी तरफ से हिलता-डुलता भी नहीं है, जिसका अपना कोई भाव नहीं, कोई चाह नहीं, जो अपने को आरोपित नहीं करना चाहता, वह उसके हुक्म में आ गया। यही धार्मिक आदमी है।
और जो उसके हुक्म में आ गया, वह सब पा गया। कुछ पाने को बचता नहीं। क्योंकि उसके हुक्म को मानना, उसके हृदय तक पहुंच जाने का द्वार है। अपने को ही मानना, उससे दूर हटते जाना है। अपने को मानना है कि तुमने परमात्मा की तरफ पीठ कर ली। उसकी आज्ञा को माना कि तुम्हारा मुख परमात्मा की तरफ हो गया। तुम सूरज की तरफ पीठ कर के जीवन भर भागते रहो तो भी अंधेरे में रहोगे। और तुम सूरज की तरफ मुंह इसी क्षण कर लो तो जन्मों-जन्मों का अंधेरा कट जाएगा।
परमात्मा के सन्मुख होने का एक ही उपाय है और वह यह है कि तुम अपनी मर्जी छोड़ दो। तुम तैरो मत, बहो। तुम तिरो; वह काफी है। तुम अकारण ही बोझ ले रहे हो।
और तुम्हारी सफलताएं-असफलताएं तुम्हारे अहंकार के ही रोग हैं। और तुम्हारी हालत वैसी है, जैसा मैंने सुना है कि एक रथ गुजर रहा था। और एक मक्खी उसके पहिए की कील पर बैठी थी। बड़ी धूल उठती थी। रथ बड़ा था। बारह घोड़े जुते थे। बड़ी भयंकर आवाज, बड़ी धूल उठती थी। उस मक्खी ने आसपास देखा और कहा कि आज मैं बड़ी धूल उड़ा रही हूं। रथ से उड़ रही है धूल। मक्खी कील पर बैठी है, पर सोच रही है, आज मैं बड़ी धूल उड़ा रही हूं। और जब इतनी धूल उड़ा रही हूं तो इतनी ही बड़ी हूं।
तुम सफल भी होते हो उसके ही कारण। जो भी तुम पाते हो उसके ही कारण। तुम रथ पर बैठी एक मक्खी से ज्यादा नहीं हो। भूल कर यह मत सोचना कि इतनी धूल मैं उड़ा रहा हूं। धूल है तो उसके रथ की है। यात्रा है तो उसके रथ की है। लेकिन तुम अपने को बीच में मत ले लेना।
तुमने सुनी होगी बात उस छिपकली की, कि मित्रों ने उसे निमंत्रित किया था और कहा कि आओ आज थोड़ा जंगल में घूम आएं। उस छिपकली ने कहा कि जाना मुश्किल है। क्योंकि इस छप्पर को कौन सम्हालेगा? छप्पर गिर जाएगा तो जिम्मेवारी मेरे ऊपर होगी। छिपकली सोचती है कि छप्पर को महल के वही सम्हाले हुए है। छिपकली को लगता भी होगा।
तुमने सुनी होगी कहानी कि एक बूढ़ी औरत के पास एक मुर्गा था। वह सुबह बांग देता था तभी सूरज उगता था। बूढ़ी अकड़ गई। और उसने गांव में लोगों को खबर कर दी कि मुझसे जरा सोच-समझ कर व्यवहार करना। ढंग और इज्जत से। क्योंकि अगर मैं चली गई अपने मुर्गे को ले कर दूसरे गांव तो याद रखना, सूरज इस गांव में कभी उगेगा ही नहीं। मेरा मुर्गा जब बांग देता है तभी सूरज उगता है।
और बात सच ही थी कि रोज ही मुर्गा बांग देता था तभी सूरज उगता था। गांव के लोग हंसे। लोगों ने मजाक उड़ाई कि तू पागल हो गई। तो बूढ़ी नाराजगी में दूसरे गांव चली गई। मुर्गे ने बांग दी और दूसरे गांव में सूरज उगा। तो बूढ़ी ने कहा, अब रोएंगे। अब बैठे होंगे छाती पीटेंगे। न रहा मुर्गा, न उगेगा सूरज।
तुम्हारे तर्क भी…बूढ़ी का तर्क भी है तो बहुत साफ। क्योंकि ऐसा कभी नहीं हुआ कि मुर्गे के बांग दिए बिना सूरज उगा हो। लेकिन बात बिलकुल उलटी है। सूरज उगता है इसलिए मुर्गा बांग देता है। बांग देने के कारण सूरज नहीं उगते। लेकिन बूढ़ी को कौन समझाए? तुमको कौन समझाए? बूढ़ी दूसरे गांव चली गई और उसने देखा कि सूरज अब यहां उग रहा है। और जब यहां उग रहा है तो हर गांव में कैसे उगेगा?
तुम अपनी छोटी बुद्धि से छोटे दायरे में सोचते हो। तुम्हारे कारण परमात्मा नहीं है, परमात्मा के कारण तुम हो। यह श्वास तुम्हारे कारण नहीं चल रही है, उसके कारण चल रही है। प्रार्थना भी तुम नहीं करते हो, वही तुम्हारे भीतर प्रार्थना बनता है।
इस भाव को खयाल में ले लें, तो नानक के ये बड़े बहुमूल्य शब्द समझ में आ जाएंगे। एक-एक शब्द कीमती है।
हुकमी होवन आकार हुकमी न कहिया जाए।
हुक्म से आकार की उत्पत्ति हुई। हुक्म को शब्दों में नहीं कहा जा सकता।’
हुक्म का अर्थ ठीक से समझ लेना–दि कास्मिक ला। वह जो सारे जीवन को चलाने वाला महानियम है, हुक्म का वही अर्थ है।
हुक्म से ही जीवों की उत्पत्ति हुई। हुक्म से बड़ाई मिलती है।’
हुकमी होवन आकार हुकमी न कहिया जाए।
हुकमी होवन जीअ हुकमी मिलै बड़िआई।
जब तुम जीतो, तो यह मत सोचना कि मैं जीत रहा हूं। और अगर तुम जीत में ही न सोचोगे कि मैं जीत रहा हूं, तो हार में भी तुम पाओगे कि मैं नहीं हार रहा हूं। वही जीतता है, वही हारता है। उसका ही खेल है। इसलिए हिंदू इस पूरे जगत को लीला कहते हैं। लीला का मतलब है, हारता भी वही, जीतता भी वही। इस हाथ से जीतता है, उस हाथ से हारता है। लेकिन जीतने और हारने वाले बीच में ही सोच लेते हैं; जो उपकरण हैं, जो निमित्त हैं, जो साधन हैं, वे समझ लेते हैं, हम कर्ता हैं।
कृष्ण अर्जुन को गीता में कह रहे हैं कि तू व्यर्थ बीच में अपने को मत ले। वही कर रहा है, वही करवा रहा है। युद्ध उसका आयोजन है। जिनको मारना है वह मारेगा। जिनको बचाना है वह बचाएगा। तू यह मत सोच कि तू मारने वाला है और तू बचाने वाला है। कृष्ण पूरी गीता में जो कहते हैं, वही नानक इन शब्दों में कह रहे हैं।
हुकमी होवन जीअ हुकमी मिलै बड़िआई।
हुकमी उत्तम नीचु…।
‘वही छोटे-बड़े को पैदा कर रहा है।’
यह थोड़ा सोचने जैसा है। अगर वही छोटे-बड़े को पैदा कर रहा है, तो फिर कोई छोटा नहीं कोई बड़ा नहीं। क्योंकि दोनों का बनाने वाला वही है। तुमने एक छोटी सी मूर्ति बनाई, तुमने एक बड़ी मूर्ति बनाई; बनाने वाले तुम ही हो। जब कर्ता एक है, तो कौन छोटा कौन बड़ा? जब दोनों में उसका ही हाथ लगा है–लेकिन हम सोचते हैं मैं छोटा, मैं बड़ा, और जीवन भर हम पीड़ा उठाते हैं। और तुम इतने बड़े कभी भी न हो पाओगे कि तुम तृप्त हो जाओ। अगर तुमने रूप को देखा, अपने आकार को देखा, तो तुम कभी इतने बड़े न हो सकोगे कि तृप्त हो जाओ। आकार तो छोटा ही होगा, कितना ही बड़ा क्यों न हो।
लेकिन अगर तुमने निराकार के हाथ अपने आकार में देखे, तब तुम तत्क्षण बड़े हो गए। बनाने वाला वही है। एक छोटे से घास को भी वही बनाता है। और दूर आकाश को छूते देवदार के वृक्ष को भी वही बनाता है। अगर दोनों के पीछे उसी का हाथ है, फिर कौन बड़ा कौन छोटा? उसी की हार है, उसी की जीत है। फिर हम सब शतरंज के मोहरे हैं। जीते तो वह, हारे तो वह। बड़ाई मिले तो उसे, बुराई मिले तो उसे।
ध्यान रखना, तुमने बहुत बार भक्तों के वचन सुने होंगे, पढ़े होंगे। अनेक भक्त तुमने पाए होंगे; कहते हैं, बड़ाई तेरी, बुराई मेरी। ऊपर से देखने पर बहुत अच्छा लगता है। वे कहते हैं कि जो-जो भला है, तेरा; जो-जो बुरा है, मेरा। लगता है बड़े विनम्र हैं। लेकिन अगर बुराई तुम्हारी तो भलाई उसकी कैसे हो सकेगी? यह विनम्रता झूठी है। यह विनम्रता वास्तविक नहीं है। क्योंकि वास्तविक विनम्रता तो सभी दे देगी, कुछ भी न बचाएगी। तुमने अपने अहंकार के लिए थोड़ा सहारा फिर बचा लिया। और तुम कितना ही ऊपर-ऊपर से कहो कि बड़ाई तेरी और बुराई मेरी, लेकिन जब बुराई मेरी है तो बड़ाई तेरी होगी कैसे? असफलता मेरी और सफलता तेरी? यह बात थोथी है। या तो दोनों मेरे होंगे, या तो दोनों तेरे होंगैं.
औम सिद्धा.

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