Saturday, May 23, 2015

गायत्री मंत्र

कौन ब्राह्मण गायत्री जप करता हैं.पुरे विश्वास के साथ कहें>>>>>>>>><<
गायत्रीं न उपासते तस्य जन्म निरर्थकम/////////>>>>>>>>>>>>>>>>>>
।।सरल सन्ध्या प्रयोग त्रिकालिक ।।
दायें हाथका अंगुठा और कनिष्ठिका अंगुलीको फैलाकर गायके कान समान मुद्रा बनाकर उस अंजलीमें कमसेकम ६ ग्राम जल किसीभी तरह आयें उतना जल लेकर बायें हाथका स्पर्श करके ऐसे तीन बार बिना शब्द (सिसकारी) से मंत्र बोलकर जल पीएँ(आचमनम्) ॐ १ऋग्वेदाय नमः
२ ॐयजुर्वेदाय नमः
३ ॐसामवेदाय नमः

चौथी बार दायाँ हाथ धोकर फिर बायाँ हाथ धो लें ॐ अथर्ववेदाय नमः
प्राणायामः- दायें हाथके अंगुठे अनामिका और कनिष्ठिका के संयोगसे नाक पकड़कर अंगुठेसे दांयी नासिका दबाकर बायीं नासिकासे गायत्रीमंत्र बिना होठ खोले मनमें बोलकर श्वास लें ठीक ऐसे गायत्री मंत्र बोलकर श्वास रोंके. बाँयी नासिका दबाकर दायीं नासिका से गायत्रीमंत्र मनमें बोलकर श्वास मंद गतिसे छोडें.
ऐसी समस्त प्राणायाम प्रक्रिया तीन बार करैं.
शिखाबन्धनम्- ॐचिद्रूपिणि महामाये दिव्यतेजः समन्वितः| तिष्ठ देवी शिखा मध्ये तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे||
संकल्पः - ॐतत् सत् श्री मम उपात्त दुरितक्षय द्वारा श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं आत्मज्ञाने मोक्षज्ञाने च सन्ध्योपासनं करिष्ये...
बायें हाथ में जल लेकर दायें हाथकी अँगुलीओंसे पैरसे शिरतक मंत्र पढतें हुए जल छिड़कतें रहैं.
ॐ आपोहिष्ठामयो भुवस्तान
ऊर्जे दधातन | महेरणाय चक्षसे| जो वः शिवतमो रस स्तस्य भाजयते हनः| उशतीरिव मातरः|| तस्मा अरंग मामवो जस्य क्षयाय जिन्वथ| आपो जन यथा चनः||
अर्घ्यपात्र या आचमनीमें जल लेकर गायत्री मंत्र पढकर सूर्यनारायणको अर्घ्य दैं
ॐसूर्य नारायणाय नमः इदं अर्घ्यं समर्पयामि
दूसरी बार गायत्री मंत्र पढकर अर्घ्य दैंॐ सूर्यनारायणाय नमः इदं अर्घ्यं समर्पयामि
तीसरीबार गायत्री मंत्र पढकर अर्घ्य दैंॐ सूर्यनारायणाय नमः इदं अर्घ्यं समर्पयामि
सूर्योदयके बाद संध्या कर रहै हो तो चौथी बार गायत्री मंत्र पढकर अर्घ्य दैंॐ सूर्यनारायणाय नमः इदं अर्घ्यं समर्पयामि
दूपहर १ सायंकालमें तीन अर्घ्य दैं.
उपस्थानम्- हथेली सूर्यनारायणकी और रहैं ऐसे 🙅 हाथ करकें उप+स्थानम्(परमात्मा सूर्य का सान्निध्यका अनुभव करतें हुए) ॐ उदुत्यं जातवेद सन् देवं वहन्ति केतवः| द्रेशे विश्वाय सूर्ज्जम्|
संकल्प- तत्स वितुर् इत्यस्य विश्वामित्रो सविता गायत्री सकलपाप उपशमनार्थं गायत्री मंत्र जपे विनियोगः
प्रतिष्ठित मालासे गोमुखीमें रखकर गायत्रीमंत्रका मनमें जप करैं(कहीं भी गायत्री मंत्र उच्च स्वरसे नहीं बोलना चाहिये... स्त्रीयोंको गायत्री मंत्र जपना नहीं चाहिये. सदैव गायत्रीमंत्र मनमें ही जप करैं) मंत्रका भावार्थ को ध्यानमें रखकर जप करना चाहिये
भावार्थ- तत्(वह) सवितुर्देवस्य(सूर्य नारायणका) वरेण्यम्(वरण करतें हैं) भर्गो (उनके दिव्य तेजकी) प्रचोदयात् ( उपासना करतें हैं)
यजुर्वेदियो के लिए जो नः( यो नः) जो तेज हमारी धीमहि( बुद्धिको प्रशस्त करैं.
१०८ कमसे कम जप करैं.
ज्यादा करैं तो कोई आपत्ति नहीं.
संकल्प- यथा शक्ति संध्या अंगत्वेन गायत्री मंत्र जप कृतेन कर्मणा सविता सूर्यनारायणः प्रीयताम्
संकल्प:- सन्ध्योपासनेन तत् सत् श्री सूर्यनारायणः प्रीयताम्
।।इति संक्षिप्त संध्या विधानम्।।
।। अस्तु ।।
।।अज्ञानी आत्रेय।।
।।श्री जानकी वल्लभो: विजयते।।

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प्रभु को दर्सन को लागि तल कीलिक गरि हेर्नु होला