कहते हैं गोरख : करना हो तो एक ही बात करना, वह जो भीतर छिपा है उसका विचार करना। मैं कौन हूं इस विचार में उतरना।
ज्यों जल दीसै चंदा!
और अगर तुम उस तक पहुंच गये, तो जैसे जल में चंद्रमा दिखायी पड़ता है, ऐसे ही अपने भीतर परमात्मा की झलक मिल जायेगी।
आकाश बनो। निर्विचार बनो। मौन बनो। भीतर गऐ; भीतर जाग कर देखो। एक ही प्रश्न है सार्थक पूछने जैसा—मैं कौन हूं? पूछे जाओ, पूछे जाओ, पूछे जाओ… तीर की तरह चुभने दो इस प्रश्न
को—मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? और बहुत उत्तर राह में आयेंगे, कोई उत्तर स्वीकार न करना। एक किनारे से बोलेगें कि तुम कौन हो। कह देना कि चुप! एक तरफ से गीता बोलेगी कि तुम कौन हो। कह देना कि चुप। एक तरफ से वेद बोलेंगे, धम्मपद बोलेगा। कह देना, चुप। सुनना ही मत शास्त्रों की। और ऐसा नहीं कि शास्त्र गलत कहते हैं। शास्त्र बिलकुल सही कहते हैं। मगर तुम शास्त्र की सुनना मत; अन्यथा तुम अपनी सुनने से वंचित रह जाओगे। तुम तो चले जाना भीतर और भीतर… और इंकार करते जाना थोथे ज्ञान को, जो तुमने सीख लिया बाहर से। कह देना नहीं, मुझे जानना है। मुझे स्वयं ही जानना है। मैं अपना ही जानूंगा तो मानूंगा, अन्यथा कुछ न मानूंगा।
हटा देना सब शास्त्र। चले जाना भीतर। हो जाना बिना शास्त्र के, बिना विचार के। एक ऐसी घड़ी आयेगी, प्रश्न ही गूंजता रह जायेगा, कोई उत्तर न उठेगा। मैं कौन हूं?… और कोई उत्तर न आयेगा। समझना, आधी यात्रा पूरी हो गयी, अब सब उत्तर गिर गए। बासे, सिखाए गए पढ़ाए गए, तोतों की तरह रटे गये… सीडी रिकार्ड सब छूट गए पीछे। अब सिर्फ तुम्हारा प्रश्न बचा है—मैं कौन हूं? यह आधी यात्रा। एक कदम पूरा हो गया—और बड़ा कदम पूरा हो गया! असली कदम पूरा हो गया। दूसरा कदम तो बहुत आसान है।
अब पूछते जाना. मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? और तुम चकित हो जाओगे, एक घड़ी आयेगी, प्रश्न भी छूट जायेगा। ऐसा सन्नाटा खिचेगा कि प्रश्न भी बनाये न बनेगा। चाहोगे भी पूछना, तो न पूछ सकोगे। पहले उत्तर गिर जायेगे—बासे, सिखाये, शास्त्रों से पढे। फिर प्रश्न गिर जायेगा। और जहां न प्रश्न है न उत्तर है, वहीं उत्तर है! अब प्रश्न भी नहीं कि मैं कौन हूं! लेकिन तुम जागोगे और देखोगे। तीर जगा गया। तीर छिद गया हृदय में। उसकी पीड़ा तुम्हें चौंका गयी, उठा गयी, तोड़ गई तंद्रा, छूट गयी नींद, हो गयी सुबह। और तब तुम आंख खोल कर देखना। तब तुम चकित हो जाओगे; यह जगत उसी का जगत है! इसके पत्ते—पत्ते पर उसी की छाप है! इसके कण—कण पर उसी का हस्ताक्षर है! और फिर गीता पढ़ना। फिरऔर कई धर्म के शास्त्र गुनगुनाना। और तुम हैरान हो जाओगे, जो तुमने जाना है, वही शास्त्र है। जो तुमने जाना है वही ज्ञान है। और मैं यह कह रहा हूं कि तुम असली ज्ञान कैसे पाओ, तुम्हारे भीतर असली ज्ञान है
मैं तुम्हें असली ज्ञान खोजने की कुंजी दे रहा हूं। मगर जो शास्त्र रटकर बैठा है उसे तो अड़चन लगेगी। वह तो कहेगा कि मैंने कहा शास्त्रौं की आवाज आये तो मत सुनना; कह देना चुप रहो। यह तो अपमान हो गया शास्त्र का। समझोगे या नहीं समझोगे? लेकिन फिर भी मैं तुम से कहता हूं : राह पर जब तुम्हें कई सिद्ध मिलें तो, हटा देना, कहना, हट जाओ मार्ग से; रास्ता दो। मुझे जाने दो। मुझे रोको मत, मुझे अटकाओ मत। मुझे मेरे गंतव्य तक पहुंच जाने दो। मैं तुम्हें भी तभी जान पाऊंगा जब मैं अपने पर पहुंच गया हूं। उसके पहले तुम बासे हो, उधार हो। उसके पहले मैं तुम्हें खाक समझूंगा! तुम कुछ कहोगे, मैं कुछ और समझूंगा। तुम सत्य कहोगे, मैं शब्द पकड लूंगा। जब तक तुम्हारी जैसी ही भाव—दशा मेरी न हो जाये।
जैसे गीता को जानना हो, तो कृष्ण जैसा चित्त चाहिए। अर्जुन भी हो गये, तो भी न जान पाओगे। अर्जुन, देखो कितना विवाद कर रहा है कृष्ण से; नहीं समझ पा रहा है। अर्जुन इतने निकट है, इतना मित्र, संगी—साथी है बचपन का। एक—दूसरे के साथ खेले हैं। एक—दूसरे के साथ मिले—जुले हैं, मैत्री है; मगर फिर भी अर्जुन नहीं समझ पा रहा है। कृष्ण कुछ कहते हैं, अर्जुन कुछ पूछे चला जाता है।
तुम कैसे समझोगे—तुम जो इतने दूर हो? हजारों सालों का फासला है तुम्हारे और कृष्ण के बीच—भाषा का, भाव का, विचार का, संस्कार का, संस्कृति का, समाज का, इतना लंबा फासला..। अर्जुन नहीं समझ पा रहा है, तुम कैसे समझ पाओगे? नहीं, तुम कुछ का कुछ समझ लोगे।
कृष्ण—चेैतन्य तुम्हारे भीतर पैदा हो, तो ही तुम गीता समझ पाओगे। जैसा भाव तुम्हारे भीतर हो, तो तुम्हारे भीतर भी गीता उतरेगी। कोई अर्जुन पर ही परमात्मा की विशेष कृपा थोड़े ही है। परमात्मा किसी पर विशेष कृपा नहीं करता; उसकी अनुकंपा समान है। सब पर एक जैसी बरस रही है। जो खाली हैं वे भर जाते हैं, जो भरे हैं वे खाली रह जाते हैं—बस इतना ही खयाल रखना। वर्षा होती है पहाड़ों पर भी, लेकिन पहाड़ —खाली रह जाते हैं, क्योंकि भरे हैं। झीलों में भी वर्षा होती है, लेकिन झीलें भर जाती हैं, क्योंकि खाली हैं।
शून्य हो जाओ पहले तो भर जाओगे। मगर तुम्हारा कुरान, तुम्हारी गीता तुम्हारे वेद भरे हैं। तुम पहाड़ बने बैठे हो—ज्ञान के पहाड़! उसी से तुम अज्ञानी हो। हटाओ इन पहाड़ों को। इन पहाड़ों की ओट में अपने अज्ञान को छिपाओ मत। अपने अज्ञान को नग्न करो, निर्वस्त्र करो। खोल दो उसके सामने अपने सारे घावों को। खाली हो तो खाली सही; जैसे भी हो उसके हो। सूने हो, शून्य हो, शून्य सही; जैसे भी हो उसके हो। अपने शून्य पात्र को उसके सामने कर दो। और तुम तत्क्षण भर जाओगे उसकी रोशनी से। और वही रोशनी प्रमाण बन जायेगी सारे शास्त्रों का। उसी रोशनी में तुम्हारे भीतर शास्त्र का जन्म शुरू हो जायेगा।
शास्त्र तो रोज पैदा होते हैं; जब भी कोई ध्यान को उपलब्ध होता है तभी शास्त्र पैदा हो जाते हैं। जैसे गंगोत्री से गंगा निकलती है, ऐसे समाधि से शास्त्र निकलते हैं।
केता आवै केता जाइ केता मांगै केता खाइ।
केता रुष— बिरष तलि रहै गोरख अनभै कासौं कहै।।
गोरख कहते हैं. कई आते हैं और कई जाते हैं। मगर मुश्किल से कोई एक—आध ऐसा आता है जो टिक रहे। यहां भी कई आते हैं कई जाते हैं। केता आवै केता जाइ। और जो आ कर चला जाता है वह सोचता है वहां कुछ भी नहीं था, इसलिए चले आये…। लेने की क्षमता न थी। खुलने की हिम्मत न थी। अज्ञान को स्वीकार करने की तत्परता न थी। नग्न होने, उघडने का साहस न जुटा सके, इसलिए पलायन कर गये। मगर सोच कर यही जाता है जाने वाला कि यहां क्या है? यहां कुछ नहीं, कहीं और चलें।
केता आवै केता जाइ।
ऐसा गोरख ने भी देखा होगा। न मालूम कितने लोग आये, न मालूम कितने लोग गये।
केता मांगै केता खाइ।
बहुत से मांगते हैं ज्ञान की भीख, मगर बहुत कम हैं जो उसे खाते हैं और पचाते हैं। और जब तक ज्ञान पचाया न जाये, जब तक खून—मांस—मज्जा न बने, तब तक कुछ भी न होगा। लोग ज्ञान को ऐसे ही भर लेते हैं खोपड़ी में, जैसे कोई बिना पचाये भोजन को अपने पेट में डालता जाये। इससे तो रोग पैदा होगा, उपाधि लगेगी, व्याधि लगेगी। इससे निरोगता न आयेगी।
जैसे भोजन बे—पचा पेट में पड़ा रहे तो जहर है, ऐसे ही ज्ञान बे—पचा मस्तिष्क में पड़ा रहे तो जहर है। ऐसे ही जहर से पंडित और मौलवी पैदा होते हैं। ज्ञानी बनना हो तो खयाल रखना : पाचन की शक्ति जगानी होगी। परमात्मा को पचाने की क्षमता चाहिए। ध्यान में ही यह हो सकेगा। भीतर ध्यान का आकाश होगा; तो ही तुम परमात्मा को अपने में समाविष्ट करने में सफल हो पाओगे।
केता आवै केता जाइ केता मांगै केता खाइ।
कितने मांगते हैं, मगर पचा कौन पाता है कितने पूछते हैं, लेकिन उत्तर को ग्रहण कौन करता है! केता रुष— विरष तलि रहै
गोरख के पास लोग आते होंगे। कुछ रुक भी जाते होंगे। बैठ गये वृक्षों के नीचे, जैसे इस देश में चलते थे पुराने दिनों में योगी; अब भी.. बैठ गये वृक्ष के नीचे। कुछ दिन रहे। धूनी तापी, चिलम पी। कुछ उल्टा—सीधा, इरछा—तिरछा योग सीधा। कुछ मान—सम्मान पाया। आगे बढ़ गये।
गौरख अनभै कासौं कहै।
गोरख कहते हैं कि कहना चाहता हूं। मिल गया मुझे। मगर किससे कहूं? लोग टिकते नहीं, आते हैं चले जाते हैं। कोई पूछता भी है, तो थोथा प्रश्न होता है जिज्ञासु का, कुतूहल से भरा हुआ; मुमुक्षा का नहीं। किसको उत्तर दूं? कुछ आते हैं, जो अपनी मान—मर्यादा पाने के चक्कर में हैं। वृक्ष के नीचे बैठे। आसन जमाया। धूनी रमायी। दो दिन रहे, आगे बढ़े। कुछ हैं जो धंधे में लगे हैं।
गौरख अनभै कासौं कहै?
यह पीड़ा सभी ज्ञानियों की रही। मिल गया है, देना चाहते हैं, बाटना चाहते हैं। सत्य बंटना चाहता है। मगर किसको दो? पात्र नहीं मिलते। किसको दो, कोई लेने को तैयार नहीं है। लोग व्यर्थ को लेने को आतुर हैं, कचरा—कूड़ा लेने को आतुर हैं। लेकिन सत्य को लेने को कोई आतुर नहीं है। क्योंकि महंगा सौदा है, सत्य को लेने का अर्थ होता है : मरना पड़ेगा। तुम मरोगे तो सत्य ले सकोगे।
मरौ हे जोगी मरौ मरौ मरण है मीठा।
तिस मरणी मरौ जिस मरणी मरि गोरख दीठा।।
ले तो सकेगा सत्य को वही जो मिटने को तैयार है; जो कहता है कि मैं अपनी कीमत जीवन से भी देने के लिए तैयार हूं यह मेरा जीवन जाये तो जाये, सत्य लेकिन मुझे चाहिए। ऐसी जिसकी त्वरा है, ऐसी ज्वलंत जिसकी अभीप्सा है, ऐसी जिसकी प्यास है—बस वही पा सकेगा।
तो अनभै कासौं कहै। मुझ मिल गया, गोरख कहते हैं, अभय ज्ञान। मुझे मिल गया वह ज्ञान जहां मृत्यु नहीं घटती, इसलिए जहां कोई भय नहीं। मैंने जान लिया वह, जो अमृत है। बांटना चाहता हूं। यह भरा हुआ कलश लेकर घूम रहा हूं कि कोई ले ले। मगर लेने वाले नहीं मिलते हैं।
बिरला जाणति भेदांनिमेद बिरला जाणंति दोड़ पष छेद।
बिरला जाणंति अकथ कहाणी बिरला जाणति सुधि बुधि की वाणी।।
बहुत बिरले हैं—गोरख कहते हैं—जिनको भेद है कि क्या व्यर्थ है और क्या सार्थक है। सार और असार में जिन्हें भेद है, ऐसे बहुत विरले हैं। वे ही ले सकेंगे। जो धन के पीछे दीवाने हैं, वे ध्यान न ले सकेंगे। उन्हें अभी पता ही नहीं कि कौन—सी बात सार्थक है, कौन—सी व्यर्थ है। जो पद के पीछे दीवाने हैं, वे प्रार्थना न ले सकेंगे। अभी तो कचरा जोड़ने में लगे हैं। अभी तो राह के किनारे कंकड़ बीन रहे हैं। अभी तुम उनको कहोगे भी कि आओ हमारे साथ, हीरे की खदानों पर ले चलें; वे जाने को राजी नहीं होंगे। उन्हें हीरों का कुछ पता ही नहीं है। हीरे होते भी हैं, इसका पता नहीं है। उन्होंने तो कंकड़—पत्थर को ही हीरा मान लिया है।
बिरला जाणति भेदांनिभेद बिरला जाणति दोड़ पष छेद।
ये जो पक्ष—विपक्ष हैं, ये दोनों छेदवाले हैं—ऐसा विरलों को ही पता है। जीवन का सत्य पक्ष—विपक्ष में बंटने से नहीं मिलता, कि तुमने यह वाद मान लिया या वह वाद मान लिया,
इस पक्ष में उस पक्ष में, सब तरफ छेद ही छेद हैं। पक्ष मात्र में छेद है। निष्पक्ष हो जाओ, तो तुम निच्छिद्र हो जाओ। और जो निष्ठिद्र है, वही सत्य को झेल सकेगा। उसमें वर्षा होगी अमृत की, तो उसका पात्र भर जायेगा।
बिरला जाणति अकथ कहाणी।
और बहुत कम हैं जो उसको जान पाते हैं, जो नहीं कहा जा सकता। अब जो कहा नहीं जा सकता, वह लिखा भी नहीं जा सकता। जो बोला नहीं जा सकता, बताया नहीं जा सकता, उसे कैसे जानोगे शास्त्र से? उसे कैसे समझोगे पंडित से? उसे जानने के लिए तो उसके पास बैठना होगा जिसने जान लिया हो। उसके पास बैठते—बैठते चमत्कार घटता है। सत्संग में जानना होगा उसे।
सत्संग इस जगत का सब से बडा चमत्कार है। सत्संगअच्छी बीमारी है—संक्रामक है। जिसने जान लिया है, उसके पास बैठते—बैठते रोग उसको भी लग जाता है, जिसने नहीं जाना। जानने का रोग, ध्यान का रोग, मस्ती का रोग—अगर रोग कहना चाहो; कहना तो नहीं चाहिए। कहना चाहिए संक्रामक स्वास्थ्य। उसका स्वास्थ्य लग जाता है। उसकी स्व—स्थिति तुम्हें भी लग जाती है। तुम्हारे भीतर भी भनक होने लगती है।
गुरु के पास बैठ कर उसके तार में तार मिलाना। गुरु के पास बैठ कर उसके छंद में लीन होना। गुरु के पास बैठ कर उसके शून्य को पीना। गुरु के पास बैठ कर उसकी उपस्थिति में डूबना। अगर होगा, तो बस इसी तरह होता है, और किसी तरह नहीं होता। बुझे दीये को हम जले दीये के पास ले जाते हैं—पास और पास और पास,..।
एक ऐसी घड़ी आती है जहां तत्क्षण जले दयिए से बुझे दीये पर ज्योति छलांग लगा जाती है। मगर पास लाना पड़ता है। तुम मील भर दूर रखो बुझे दीये को जले दीये से, तो घटना नहीं घटेगी। आधा मील दूर रखो तो भी नहीं घटेगी। एक गज दूर रखो तो भी नहीं घटेगी। एक फीट दूर रखो तो नहीं घटेगी। सरकाते जाओ, सरकाते जाओ, सरकाते जाओ?.. छह इंच पर भी नहीं घटेगी, चार इंच पर भी नहीं घटेगी। लेकिन एक घड़ी आती है, इंच या आधा इंच की दूरी और पाव इंच की दूरी.. और बस.. जो होना था हो गया। एक क्षण में छलांग लग जाती है। सत्संग का यही अर्थ है : ज्योति से ज्योति जले!
यह अकथ है सत्य, कहा नहीं जा सकता। लेकिन ज्योति से ज्योति जलाई जा सकती है।
बिरला जाणति सुधि बुधि की वाणी।
इसीलिए जो सिद्ध हो गये, जो बुद्ध हो गये, उनकी वाणी को बहुत विरले समझ पाते हैं, क्योंकि वे बोलते क्या हैं? जो नहीं बोला जा सकता, उसको कैसे बोलेंगे? फिर बुद्ध क्यों बोलते हैं? सारे बुद्ध बोलते रहे हैं। बोलते हैं तुम्हें पुकारने को कि पास आ जाओ। बोलने से सत्य नहीं मिल सकता। लेकिन बोलने के कारण तुम पास आते जाओगे। यह पुकार है कि और सरक आओ, और थोड़ा, और थोड़ा, और थोड़ा..। सरकते—सरकते एक क्षण ज्योति छलांग लगा जाती है।
संन्यासी सोइ करै सब नास गगन मंडल महि मांडै आस।
अनहद सूं मन उनमन रहै सो संन्यासी अगम की कहै।।
सत्संग में संन्यास का जन्म होता है। संन्यास का अर्थ होता है : सम्यक न्यास। जो व्यर्थ है, उसे परिपूर्ण रूप से छोड़ देना।
संन्यास का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं है; संन्यास का अर्थ व्यर्थ पर पकड़ छोड़ देना है और सार्थक के लिए उगख हो जाना है, सार्थक के लिए तत्पर हो जाना है, ग्राहक हो जाना है।
संन्यासी सोइ करै सब नास।
जो सर्वन्यास कर दे—जो सब भांति व्यर्थ को छोड़ दे, वही संन्यासी। जो सत्संग में सब छोड़ने को राजी हो जाये, वही संन्यासी।
गगन मंडल महि मांडै आस।
वह कोई ऐसी छोटी—मोटी आसन लगाने में नहीं पड़ता—शीर्षासन और सर्वांगासन और पद्यासन और सिद्धासन, और इस सब के उपद्रव में नहीं पड़ता है। वह तो एक ही आसन लगाता है—शून्य में आसन लगाता है। गगन मंडल महि मांडै आस। गगन मंडल का अर्थ होता है : भीतर का आकाश। भीतर के शून्य में आसन जमाता है। वहा निर्विचार हो कर बैठ रहता है।
अनहद सूं मन उनमन रहै।
वहीं बैठकर शून्य में डूबता है।
शून्य में डूबना उनमन होना है। उनमन यानी मन के पार होना है—अमन होना है। और तब अनहद का नाद सुनायी पड़ता है। तब परम संगीत—ओंकार, अनहद बजने लगता है। वहीं से उठे वेद, वहीं से उठे उपनिषद, वहीं से वहीं से सर्व सिद्धौं के वचन। वे सब अनहद से उठे हैं। अनहद सूं मन उनमन रहै। सो संन्यासी अगम की कहै।
और फिर जो वहां पहुंच गया है, वह अगम की कहने लगता है, जिसकी कोई सीमा नहीं है; जिसको पार पाने का कोई उपाय नहीं है; जिसकी कोई थाह नहीं है—अथाह और अगम है; जिसमें डूबो तो डूबते ही चले जाओ और कभी थाह न मिले।
लेकिन जो अपने भीतर के अनहद को सुन लिया है, वह उस अगम की खबर ले आता है। वह अपने व्यक्तित्व से अगम की तरंगें विकीर्णित करने लगता है। वह जिसे छू दे, उसे अगम का स्वाद मिले। वह जिसे अपनी छाती से लगा ले, उसे अगम ने छाती से लगा लिया। मगर ऐसे व्यक्ति की छाती से लगने के लिए तुम्हारे पास बड़ी छाती चाहिए, बड़ा खुला हृदय चाहिए। संकीर्णताएं होंगी तो यह अपूर्व घटना नहीं घट पायेगी।
आज के लिऐ यह बहुत है शैष कल......
ज्यों जल दीसै चंदा!
और अगर तुम उस तक पहुंच गये, तो जैसे जल में चंद्रमा दिखायी पड़ता है, ऐसे ही अपने भीतर परमात्मा की झलक मिल जायेगी।
आकाश बनो। निर्विचार बनो। मौन बनो। भीतर गऐ; भीतर जाग कर देखो। एक ही प्रश्न है सार्थक पूछने जैसा—मैं कौन हूं? पूछे जाओ, पूछे जाओ, पूछे जाओ… तीर की तरह चुभने दो इस प्रश्न
को—मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? और बहुत उत्तर राह में आयेंगे, कोई उत्तर स्वीकार न करना। एक किनारे से बोलेगें कि तुम कौन हो। कह देना कि चुप! एक तरफ से गीता बोलेगी कि तुम कौन हो। कह देना कि चुप। एक तरफ से वेद बोलेंगे, धम्मपद बोलेगा। कह देना, चुप। सुनना ही मत शास्त्रों की। और ऐसा नहीं कि शास्त्र गलत कहते हैं। शास्त्र बिलकुल सही कहते हैं। मगर तुम शास्त्र की सुनना मत; अन्यथा तुम अपनी सुनने से वंचित रह जाओगे। तुम तो चले जाना भीतर और भीतर… और इंकार करते जाना थोथे ज्ञान को, जो तुमने सीख लिया बाहर से। कह देना नहीं, मुझे जानना है। मुझे स्वयं ही जानना है। मैं अपना ही जानूंगा तो मानूंगा, अन्यथा कुछ न मानूंगा।
हटा देना सब शास्त्र। चले जाना भीतर। हो जाना बिना शास्त्र के, बिना विचार के। एक ऐसी घड़ी आयेगी, प्रश्न ही गूंजता रह जायेगा, कोई उत्तर न उठेगा। मैं कौन हूं?… और कोई उत्तर न आयेगा। समझना, आधी यात्रा पूरी हो गयी, अब सब उत्तर गिर गए। बासे, सिखाए गए पढ़ाए गए, तोतों की तरह रटे गये… सीडी रिकार्ड सब छूट गए पीछे। अब सिर्फ तुम्हारा प्रश्न बचा है—मैं कौन हूं? यह आधी यात्रा। एक कदम पूरा हो गया—और बड़ा कदम पूरा हो गया! असली कदम पूरा हो गया। दूसरा कदम तो बहुत आसान है।
अब पूछते जाना. मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? और तुम चकित हो जाओगे, एक घड़ी आयेगी, प्रश्न भी छूट जायेगा। ऐसा सन्नाटा खिचेगा कि प्रश्न भी बनाये न बनेगा। चाहोगे भी पूछना, तो न पूछ सकोगे। पहले उत्तर गिर जायेगे—बासे, सिखाये, शास्त्रों से पढे। फिर प्रश्न गिर जायेगा। और जहां न प्रश्न है न उत्तर है, वहीं उत्तर है! अब प्रश्न भी नहीं कि मैं कौन हूं! लेकिन तुम जागोगे और देखोगे। तीर जगा गया। तीर छिद गया हृदय में। उसकी पीड़ा तुम्हें चौंका गयी, उठा गयी, तोड़ गई तंद्रा, छूट गयी नींद, हो गयी सुबह। और तब तुम आंख खोल कर देखना। तब तुम चकित हो जाओगे; यह जगत उसी का जगत है! इसके पत्ते—पत्ते पर उसी की छाप है! इसके कण—कण पर उसी का हस्ताक्षर है! और फिर गीता पढ़ना। फिरऔर कई धर्म के शास्त्र गुनगुनाना। और तुम हैरान हो जाओगे, जो तुमने जाना है, वही शास्त्र है। जो तुमने जाना है वही ज्ञान है। और मैं यह कह रहा हूं कि तुम असली ज्ञान कैसे पाओ, तुम्हारे भीतर असली ज्ञान है
मैं तुम्हें असली ज्ञान खोजने की कुंजी दे रहा हूं। मगर जो शास्त्र रटकर बैठा है उसे तो अड़चन लगेगी। वह तो कहेगा कि मैंने कहा शास्त्रौं की आवाज आये तो मत सुनना; कह देना चुप रहो। यह तो अपमान हो गया शास्त्र का। समझोगे या नहीं समझोगे? लेकिन फिर भी मैं तुम से कहता हूं : राह पर जब तुम्हें कई सिद्ध मिलें तो, हटा देना, कहना, हट जाओ मार्ग से; रास्ता दो। मुझे जाने दो। मुझे रोको मत, मुझे अटकाओ मत। मुझे मेरे गंतव्य तक पहुंच जाने दो। मैं तुम्हें भी तभी जान पाऊंगा जब मैं अपने पर पहुंच गया हूं। उसके पहले तुम बासे हो, उधार हो। उसके पहले मैं तुम्हें खाक समझूंगा! तुम कुछ कहोगे, मैं कुछ और समझूंगा। तुम सत्य कहोगे, मैं शब्द पकड लूंगा। जब तक तुम्हारी जैसी ही भाव—दशा मेरी न हो जाये।
जैसे गीता को जानना हो, तो कृष्ण जैसा चित्त चाहिए। अर्जुन भी हो गये, तो भी न जान पाओगे। अर्जुन, देखो कितना विवाद कर रहा है कृष्ण से; नहीं समझ पा रहा है। अर्जुन इतने निकट है, इतना मित्र, संगी—साथी है बचपन का। एक—दूसरे के साथ खेले हैं। एक—दूसरे के साथ मिले—जुले हैं, मैत्री है; मगर फिर भी अर्जुन नहीं समझ पा रहा है। कृष्ण कुछ कहते हैं, अर्जुन कुछ पूछे चला जाता है।
तुम कैसे समझोगे—तुम जो इतने दूर हो? हजारों सालों का फासला है तुम्हारे और कृष्ण के बीच—भाषा का, भाव का, विचार का, संस्कार का, संस्कृति का, समाज का, इतना लंबा फासला..। अर्जुन नहीं समझ पा रहा है, तुम कैसे समझ पाओगे? नहीं, तुम कुछ का कुछ समझ लोगे।
कृष्ण—चेैतन्य तुम्हारे भीतर पैदा हो, तो ही तुम गीता समझ पाओगे। जैसा भाव तुम्हारे भीतर हो, तो तुम्हारे भीतर भी गीता उतरेगी। कोई अर्जुन पर ही परमात्मा की विशेष कृपा थोड़े ही है। परमात्मा किसी पर विशेष कृपा नहीं करता; उसकी अनुकंपा समान है। सब पर एक जैसी बरस रही है। जो खाली हैं वे भर जाते हैं, जो भरे हैं वे खाली रह जाते हैं—बस इतना ही खयाल रखना। वर्षा होती है पहाड़ों पर भी, लेकिन पहाड़ —खाली रह जाते हैं, क्योंकि भरे हैं। झीलों में भी वर्षा होती है, लेकिन झीलें भर जाती हैं, क्योंकि खाली हैं।
शून्य हो जाओ पहले तो भर जाओगे। मगर तुम्हारा कुरान, तुम्हारी गीता तुम्हारे वेद भरे हैं। तुम पहाड़ बने बैठे हो—ज्ञान के पहाड़! उसी से तुम अज्ञानी हो। हटाओ इन पहाड़ों को। इन पहाड़ों की ओट में अपने अज्ञान को छिपाओ मत। अपने अज्ञान को नग्न करो, निर्वस्त्र करो। खोल दो उसके सामने अपने सारे घावों को। खाली हो तो खाली सही; जैसे भी हो उसके हो। सूने हो, शून्य हो, शून्य सही; जैसे भी हो उसके हो। अपने शून्य पात्र को उसके सामने कर दो। और तुम तत्क्षण भर जाओगे उसकी रोशनी से। और वही रोशनी प्रमाण बन जायेगी सारे शास्त्रों का। उसी रोशनी में तुम्हारे भीतर शास्त्र का जन्म शुरू हो जायेगा।
शास्त्र तो रोज पैदा होते हैं; जब भी कोई ध्यान को उपलब्ध होता है तभी शास्त्र पैदा हो जाते हैं। जैसे गंगोत्री से गंगा निकलती है, ऐसे समाधि से शास्त्र निकलते हैं।
केता आवै केता जाइ केता मांगै केता खाइ।
केता रुष— बिरष तलि रहै गोरख अनभै कासौं कहै।।
गोरख कहते हैं. कई आते हैं और कई जाते हैं। मगर मुश्किल से कोई एक—आध ऐसा आता है जो टिक रहे। यहां भी कई आते हैं कई जाते हैं। केता आवै केता जाइ। और जो आ कर चला जाता है वह सोचता है वहां कुछ भी नहीं था, इसलिए चले आये…। लेने की क्षमता न थी। खुलने की हिम्मत न थी। अज्ञान को स्वीकार करने की तत्परता न थी। नग्न होने, उघडने का साहस न जुटा सके, इसलिए पलायन कर गये। मगर सोच कर यही जाता है जाने वाला कि यहां क्या है? यहां कुछ नहीं, कहीं और चलें।
केता आवै केता जाइ।
ऐसा गोरख ने भी देखा होगा। न मालूम कितने लोग आये, न मालूम कितने लोग गये।
केता मांगै केता खाइ।
बहुत से मांगते हैं ज्ञान की भीख, मगर बहुत कम हैं जो उसे खाते हैं और पचाते हैं। और जब तक ज्ञान पचाया न जाये, जब तक खून—मांस—मज्जा न बने, तब तक कुछ भी न होगा। लोग ज्ञान को ऐसे ही भर लेते हैं खोपड़ी में, जैसे कोई बिना पचाये भोजन को अपने पेट में डालता जाये। इससे तो रोग पैदा होगा, उपाधि लगेगी, व्याधि लगेगी। इससे निरोगता न आयेगी।
जैसे भोजन बे—पचा पेट में पड़ा रहे तो जहर है, ऐसे ही ज्ञान बे—पचा मस्तिष्क में पड़ा रहे तो जहर है। ऐसे ही जहर से पंडित और मौलवी पैदा होते हैं। ज्ञानी बनना हो तो खयाल रखना : पाचन की शक्ति जगानी होगी। परमात्मा को पचाने की क्षमता चाहिए। ध्यान में ही यह हो सकेगा। भीतर ध्यान का आकाश होगा; तो ही तुम परमात्मा को अपने में समाविष्ट करने में सफल हो पाओगे।
केता आवै केता जाइ केता मांगै केता खाइ।
कितने मांगते हैं, मगर पचा कौन पाता है कितने पूछते हैं, लेकिन उत्तर को ग्रहण कौन करता है! केता रुष— विरष तलि रहै
गोरख के पास लोग आते होंगे। कुछ रुक भी जाते होंगे। बैठ गये वृक्षों के नीचे, जैसे इस देश में चलते थे पुराने दिनों में योगी; अब भी.. बैठ गये वृक्ष के नीचे। कुछ दिन रहे। धूनी तापी, चिलम पी। कुछ उल्टा—सीधा, इरछा—तिरछा योग सीधा। कुछ मान—सम्मान पाया। आगे बढ़ गये।
गौरख अनभै कासौं कहै।
गोरख कहते हैं कि कहना चाहता हूं। मिल गया मुझे। मगर किससे कहूं? लोग टिकते नहीं, आते हैं चले जाते हैं। कोई पूछता भी है, तो थोथा प्रश्न होता है जिज्ञासु का, कुतूहल से भरा हुआ; मुमुक्षा का नहीं। किसको उत्तर दूं? कुछ आते हैं, जो अपनी मान—मर्यादा पाने के चक्कर में हैं। वृक्ष के नीचे बैठे। आसन जमाया। धूनी रमायी। दो दिन रहे, आगे बढ़े। कुछ हैं जो धंधे में लगे हैं।
गौरख अनभै कासौं कहै?
यह पीड़ा सभी ज्ञानियों की रही। मिल गया है, देना चाहते हैं, बाटना चाहते हैं। सत्य बंटना चाहता है। मगर किसको दो? पात्र नहीं मिलते। किसको दो, कोई लेने को तैयार नहीं है। लोग व्यर्थ को लेने को आतुर हैं, कचरा—कूड़ा लेने को आतुर हैं। लेकिन सत्य को लेने को कोई आतुर नहीं है। क्योंकि महंगा सौदा है, सत्य को लेने का अर्थ होता है : मरना पड़ेगा। तुम मरोगे तो सत्य ले सकोगे।
मरौ हे जोगी मरौ मरौ मरण है मीठा।
तिस मरणी मरौ जिस मरणी मरि गोरख दीठा।।
ले तो सकेगा सत्य को वही जो मिटने को तैयार है; जो कहता है कि मैं अपनी कीमत जीवन से भी देने के लिए तैयार हूं यह मेरा जीवन जाये तो जाये, सत्य लेकिन मुझे चाहिए। ऐसी जिसकी त्वरा है, ऐसी ज्वलंत जिसकी अभीप्सा है, ऐसी जिसकी प्यास है—बस वही पा सकेगा।
तो अनभै कासौं कहै। मुझ मिल गया, गोरख कहते हैं, अभय ज्ञान। मुझे मिल गया वह ज्ञान जहां मृत्यु नहीं घटती, इसलिए जहां कोई भय नहीं। मैंने जान लिया वह, जो अमृत है। बांटना चाहता हूं। यह भरा हुआ कलश लेकर घूम रहा हूं कि कोई ले ले। मगर लेने वाले नहीं मिलते हैं।
बिरला जाणति भेदांनिमेद बिरला जाणंति दोड़ पष छेद।
बिरला जाणंति अकथ कहाणी बिरला जाणति सुधि बुधि की वाणी।।
बहुत बिरले हैं—गोरख कहते हैं—जिनको भेद है कि क्या व्यर्थ है और क्या सार्थक है। सार और असार में जिन्हें भेद है, ऐसे बहुत विरले हैं। वे ही ले सकेंगे। जो धन के पीछे दीवाने हैं, वे ध्यान न ले सकेंगे। उन्हें अभी पता ही नहीं कि कौन—सी बात सार्थक है, कौन—सी व्यर्थ है। जो पद के पीछे दीवाने हैं, वे प्रार्थना न ले सकेंगे। अभी तो कचरा जोड़ने में लगे हैं। अभी तो राह के किनारे कंकड़ बीन रहे हैं। अभी तुम उनको कहोगे भी कि आओ हमारे साथ, हीरे की खदानों पर ले चलें; वे जाने को राजी नहीं होंगे। उन्हें हीरों का कुछ पता ही नहीं है। हीरे होते भी हैं, इसका पता नहीं है। उन्होंने तो कंकड़—पत्थर को ही हीरा मान लिया है।
बिरला जाणति भेदांनिभेद बिरला जाणति दोड़ पष छेद।
ये जो पक्ष—विपक्ष हैं, ये दोनों छेदवाले हैं—ऐसा विरलों को ही पता है। जीवन का सत्य पक्ष—विपक्ष में बंटने से नहीं मिलता, कि तुमने यह वाद मान लिया या वह वाद मान लिया,
इस पक्ष में उस पक्ष में, सब तरफ छेद ही छेद हैं। पक्ष मात्र में छेद है। निष्पक्ष हो जाओ, तो तुम निच्छिद्र हो जाओ। और जो निष्ठिद्र है, वही सत्य को झेल सकेगा। उसमें वर्षा होगी अमृत की, तो उसका पात्र भर जायेगा।
बिरला जाणति अकथ कहाणी।
और बहुत कम हैं जो उसको जान पाते हैं, जो नहीं कहा जा सकता। अब जो कहा नहीं जा सकता, वह लिखा भी नहीं जा सकता। जो बोला नहीं जा सकता, बताया नहीं जा सकता, उसे कैसे जानोगे शास्त्र से? उसे कैसे समझोगे पंडित से? उसे जानने के लिए तो उसके पास बैठना होगा जिसने जान लिया हो। उसके पास बैठते—बैठते चमत्कार घटता है। सत्संग में जानना होगा उसे।
सत्संग इस जगत का सब से बडा चमत्कार है। सत्संगअच्छी बीमारी है—संक्रामक है। जिसने जान लिया है, उसके पास बैठते—बैठते रोग उसको भी लग जाता है, जिसने नहीं जाना। जानने का रोग, ध्यान का रोग, मस्ती का रोग—अगर रोग कहना चाहो; कहना तो नहीं चाहिए। कहना चाहिए संक्रामक स्वास्थ्य। उसका स्वास्थ्य लग जाता है। उसकी स्व—स्थिति तुम्हें भी लग जाती है। तुम्हारे भीतर भी भनक होने लगती है।
गुरु के पास बैठ कर उसके तार में तार मिलाना। गुरु के पास बैठ कर उसके छंद में लीन होना। गुरु के पास बैठ कर उसके शून्य को पीना। गुरु के पास बैठ कर उसकी उपस्थिति में डूबना। अगर होगा, तो बस इसी तरह होता है, और किसी तरह नहीं होता। बुझे दीये को हम जले दीये के पास ले जाते हैं—पास और पास और पास,..।
एक ऐसी घड़ी आती है जहां तत्क्षण जले दयिए से बुझे दीये पर ज्योति छलांग लगा जाती है। मगर पास लाना पड़ता है। तुम मील भर दूर रखो बुझे दीये को जले दीये से, तो घटना नहीं घटेगी। आधा मील दूर रखो तो भी नहीं घटेगी। एक गज दूर रखो तो भी नहीं घटेगी। एक फीट दूर रखो तो नहीं घटेगी। सरकाते जाओ, सरकाते जाओ, सरकाते जाओ?.. छह इंच पर भी नहीं घटेगी, चार इंच पर भी नहीं घटेगी। लेकिन एक घड़ी आती है, इंच या आधा इंच की दूरी और पाव इंच की दूरी.. और बस.. जो होना था हो गया। एक क्षण में छलांग लग जाती है। सत्संग का यही अर्थ है : ज्योति से ज्योति जले!
यह अकथ है सत्य, कहा नहीं जा सकता। लेकिन ज्योति से ज्योति जलाई जा सकती है।
बिरला जाणति सुधि बुधि की वाणी।
इसीलिए जो सिद्ध हो गये, जो बुद्ध हो गये, उनकी वाणी को बहुत विरले समझ पाते हैं, क्योंकि वे बोलते क्या हैं? जो नहीं बोला जा सकता, उसको कैसे बोलेंगे? फिर बुद्ध क्यों बोलते हैं? सारे बुद्ध बोलते रहे हैं। बोलते हैं तुम्हें पुकारने को कि पास आ जाओ। बोलने से सत्य नहीं मिल सकता। लेकिन बोलने के कारण तुम पास आते जाओगे। यह पुकार है कि और सरक आओ, और थोड़ा, और थोड़ा, और थोड़ा..। सरकते—सरकते एक क्षण ज्योति छलांग लगा जाती है।
संन्यासी सोइ करै सब नास गगन मंडल महि मांडै आस।
अनहद सूं मन उनमन रहै सो संन्यासी अगम की कहै।।
सत्संग में संन्यास का जन्म होता है। संन्यास का अर्थ होता है : सम्यक न्यास। जो व्यर्थ है, उसे परिपूर्ण रूप से छोड़ देना।
संन्यास का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं है; संन्यास का अर्थ व्यर्थ पर पकड़ छोड़ देना है और सार्थक के लिए उगख हो जाना है, सार्थक के लिए तत्पर हो जाना है, ग्राहक हो जाना है।
संन्यासी सोइ करै सब नास।
जो सर्वन्यास कर दे—जो सब भांति व्यर्थ को छोड़ दे, वही संन्यासी। जो सत्संग में सब छोड़ने को राजी हो जाये, वही संन्यासी।
गगन मंडल महि मांडै आस।
वह कोई ऐसी छोटी—मोटी आसन लगाने में नहीं पड़ता—शीर्षासन और सर्वांगासन और पद्यासन और सिद्धासन, और इस सब के उपद्रव में नहीं पड़ता है। वह तो एक ही आसन लगाता है—शून्य में आसन लगाता है। गगन मंडल महि मांडै आस। गगन मंडल का अर्थ होता है : भीतर का आकाश। भीतर के शून्य में आसन जमाता है। वहा निर्विचार हो कर बैठ रहता है।
अनहद सूं मन उनमन रहै।
वहीं बैठकर शून्य में डूबता है।
शून्य में डूबना उनमन होना है। उनमन यानी मन के पार होना है—अमन होना है। और तब अनहद का नाद सुनायी पड़ता है। तब परम संगीत—ओंकार, अनहद बजने लगता है। वहीं से उठे वेद, वहीं से उठे उपनिषद, वहीं से वहीं से सर्व सिद्धौं के वचन। वे सब अनहद से उठे हैं। अनहद सूं मन उनमन रहै। सो संन्यासी अगम की कहै।
और फिर जो वहां पहुंच गया है, वह अगम की कहने लगता है, जिसकी कोई सीमा नहीं है; जिसको पार पाने का कोई उपाय नहीं है; जिसकी कोई थाह नहीं है—अथाह और अगम है; जिसमें डूबो तो डूबते ही चले जाओ और कभी थाह न मिले।
लेकिन जो अपने भीतर के अनहद को सुन लिया है, वह उस अगम की खबर ले आता है। वह अपने व्यक्तित्व से अगम की तरंगें विकीर्णित करने लगता है। वह जिसे छू दे, उसे अगम का स्वाद मिले। वह जिसे अपनी छाती से लगा ले, उसे अगम ने छाती से लगा लिया। मगर ऐसे व्यक्ति की छाती से लगने के लिए तुम्हारे पास बड़ी छाती चाहिए, बड़ा खुला हृदय चाहिए। संकीर्णताएं होंगी तो यह अपूर्व घटना नहीं घट पायेगी।
आज के लिऐ यह बहुत है शैष कल......

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