सृष्टि उस विराट चेतना शक्ति की अभिव्यक्ति मात्र है । धर्म उस चेतना को
उपलब्ध होने का विग्यान है । संयास और वैराग्य इसका आरम्भ है तथा मुक्ति
अन्त । यही जीव की अंतिम स्थिति है । आत्म ग्यान के लिए वैराग्य का होना
आवश्यक है । वैराग्य का अर्थ संसार को छोडना अथवा उससे भागना नहीँ है,
अपितु उसके प्रति आसक्ति का त्याग है । संसार बंधन नहीँ है अपितु उसके
प्रति जो आसक्ति है लगाव है यही बंधन है । इस आसक्ति का कारण है अहंकार ।
जब तक अहंकार है आसक्ति होगी ही तथा यही आसक्ति बंधन है । संसार
और आत्मा दो छोर हैँ । बाहर है संसार भीतर है आत्मा (परमात्मा) दोनोँ
मार्ग भिन्न भिन्न दिशाओँ मेँ जा रहे हैँ । मनुष्य दोनो के मध्य खडा है
।यदि वह संसार की ओर जाता है तो परमात्मा से दूर हो जाता है यदि वह
परमात्मा की और जाना चाहता है तो उसे संसार से विमुख होना पडेगा । संसार से
विमुख होना ही वैराग्य है । यह केवल दृष्टि परिवर्तन से होगा । शहर छोड कर
जंगल मेँ भागने से नहीँ होगा । यदि व्यक्ति संसार के प्रति आसक्ति का
त्याग मात्र कर देता है तो वह ग्यान प्राप्ति का अधिकारी बन जाता है ।

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