शाम्भवी मुद्रा- शरीर मेँ जो मूलाधार आदि षट् चक्र हैँ उनमेँ से जो
अभिष्ट हो, उस चक्र मेँ लक्ष्य बनाकर अंतःकरण की वृत्ति और विषयोँ वाली
दृष्टि जो निमेष उन्मेष से रहित हो ऐसी यह मुद्रा ऋग्वेदादि और योग
दर्शनादि मेँ छिपी है ।इससे शम्भु की प्रत्यक्षता प्राप्त होती है इसिलिए
इसका नाम शाम्भवी मुद्रा है । जीवात्मा परमात्मा के अभेद रुप लक्ष्य मेँ
मन और प्राण का लय होने पर निश्चल दृष्टि खुली रहकर भी बाहर के विषयोँ को
देख नहीँ पाता । कयोँकि मन का लय होने पर इंद्रियां अपने विषयोँ को ग्रहण
नहीँ कर सकती । इस प्रकार ब्रह्म मेँ लय को प्राप्त हुए मन और प्राण जब इस
अवस्था मेँ पहुँच जाते हैँ, तब शाम्भवी मुद्रा होती है ।

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